हसदेव कटाई प्रस्ताव पर केंद्र की समिति को भेजी आपत्ति, कोल ब्लॉक से तबाह हो जाएगा पूरा इकोसिस्टम’
RAIPUR : छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य क्षेत्र में प्रस्तावित केंटे एक्सटेंशन कोल ब्लॉक को लेकर एक बार फिर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। पर्यावरणविदों और सामाजिक संगठनों ने 1742.60 हेक्टेयर वन भूमि डायवर्जन के प्रस्ताव का कड़ा विरोध करते हुए केंद्र सरकार की एडवाइजरी कमेटी को आपत्ति पत्र भेजा है।
छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के संयोजक आलोक शुक्ला ने पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की सलाहकार समिति को भेजे पत्र में कहा है कि यदि इस परियोजना को मंजूरी दी गई तो इससे हसदेव अरण्य के जंगल, वन्यजीव, जल स्रोत और आदिवासी जीवन तबाह हो जाएगा।
8 मई को दिल्ली में बैठक:
8 मई को केंद्र की एडवाइजरी कमेटी की बैठक में सरगुजा जिले के केंटे एक्सटेंशन कोल ब्लॉक के लिए 1742.60 हेक्टेयर वन भूमि डायवर्ट करने के प्रस्ताव पर चर्चा होनी है। इसी बैठक से पहले यह आपत्ति पत्र भेजा गया है।
पत्र में दावा किया गया है कि प्रस्तावित कोल ब्लॉक का करीब 98 फीसदी हिस्सा घने वन क्षेत्र में आता है। यह इलाका मध्य भारत के सबसे समृद्ध साल वनों में गिना जाता है और यहां 400 से अधिक वनस्पति एवं जीव प्रजातियां पाई जाती हैं। इसमें 9 अनुसूची-1 के वन्यजीव भी शामिल हैं।
हाथियों का आवास:
आंदोलनकारियों ने कहा कि यह क्षेत्र हाथियों का महत्वपूर्ण आवास और तेंदुआ-बाघ कॉरिडोर है। खनन शुरू होने पर हाथियों के रास्ते बाधित होंगे और मानव-वन्यजीव संघर्ष तेजी से बढ़ सकता है।
वन्यजीव की रिपोर्ट का हवाला:
पत्र में भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा गया है कि हसदेव अरण्य में आगे खनन से “अपूरणीय पर्यावरणीय नुकसान” होगा और इसे “नो-गो एरिया” घोषित किया जाना चाहिए।
विधानसभा के प्रस्ताव का भी जिक्र:
आपत्ति पत्र में छत्तीसगढ़ विधानसभा के उस सर्वसम्मत प्रस्ताव का भी उल्लेख किया गया है, जो 26 जुलाई 2022 को पारित हुआ था। इसमें कहा गया था कि हसदेव अरण्य जैसे संवेदनशील क्षेत्र में आगे खनन की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। संगठन ने आरोप लगाया कि राज्य विधानसभा की भावना के बावजूद केंद्र स्तर पर परियोजना को आगे बढ़ाया जा रहा है।
राजस्थान की बिजली जरूरत का तर्क भ्रामक:
पत्र में यह भी कहा गया है कि राजस्थान की बिजली जरूरतों के नाम पर इस परियोजना को उचित ठहराया जा रहा है, जबकि केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) के संशोधित आंकड़ों के अनुसार राज्य की अनुमानित बिजली मांग पहले की तुलना में कम हो गई है।
इसके अलावा राजस्थान में बड़े पैमाने पर सौर ऊर्जा परियोजनाएं स्थापित हो रही हैं, जिससे कोयला आधारित बिजली उत्पादन की जरूरत लगातार घट रही है। ऐसे में परियोजना को “जनहित” के बजाय “अघोषित हितों” से प्रेरित बताया गया है।
रामगढ़ और राजमाड़ा गुफाओं पर खतरा:
आंदोलनकारियों ने ऐतिहासिक और पुरातात्विक विरासत को लेकर भी चिंता जताई है। पत्र में कहा गया कि रामगढ़ क्षेत्र, जिसे दुनिया के सबसे प्राचीन रंगमंच स्थलों में माना जाता है, पहले से चल रही खनन गतिविधियों से प्रभावित हो चुका है। यदि खनन का विस्तार हुआ तो रामगढ़ और राजमाड़ा गुफाओं जैसी ऐतिहासिक धरोहरों को स्थायी नुकसान पहुंच सकता है।
वनाधिकार कानून उल्लंघन:
पत्र में परियोजना के प्रतिपूरक वनीकरण (कंपेन्सेटरी अफॉरेस्टेशन) प्लान पर भी सवाल उठाए गए हैं। आरोप लगाया गया है कि वन क्षति की भरपाई के लिए फिर वन भूमि और स्थानीय समुदायों द्वारा उपयोग की जाने वाली जमीन को चिन्हित किया गया है, जो सुप्रीम कोर्ट के आदेश और वनाधिकार कानून 2006 की भावना के खिलाफ है। संगठन का कहना है कि जिन गांवों की जमीन प्रभावित होगी, वहां अब तक वनाधिकार मान्यता की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है।
आदिवासी संस्कृति और आजीविका पर असर:
पत्र में कहा गया है कि हसदेव अरण्य केवल जंगल नहीं बल्कि हजारों आदिवासी परिवारों की आजीविका और सांस्कृतिक पहचान का आधार है। भारतीय वन्यजीव संस्थान की रिपोर्ट के अनुसार हसदेव क्षेत्र के ग्रामीणों की करीब 70 फीसदी आय जंगलों से मिलने वाली लघु वनोपज पर निर्भर है। आंदोलनकारियों ने चेतावनी दी है कि यदि परियोजना को मंजूरी मिली तो इससे बड़े पैमाने पर विस्थापन, जंगल कटाई और सामाजिक संघर्ष की स्थिति पैदा हो सकती है।
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