साक्षरता अभियान के दावों का सच ; छत्तीसगढ़ में निरक्षरों की फौज, सिस्टम पर उठे सवाल

Aishwarya Dwivedi | Apr 09, 2026, 12:24 IST
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छत्तीसगढ़ में निरक्षरता की संख्या बढ़ रही है, जबकि शिक्षा पर भारी बजट खर्च हो रहा है। बिलासपुर और रायपुर जैसे शहरों में निरक्षरता बढ़ी, जबकि दुर्ग और बालोद में कमी आई। सरकारी नीतियों में गुणवत्ता की कमी और ड्रॉपआउट दर इसके प्रमुख कारण हैं।

छत्तीसगढ़ में विकास के बड़े-बड़े दावों और 'पढ़बो-लिखबो' जैसे साक्षरता अभियानों के बीच एक ऐसी डरावनी तस्वीर उभर रही है, जो सरकार और प्रशासन की नींद उड़ाने के लिए काफी है। नियम यह कहता है कि जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ती है और शिक्षा का प्रसार होता है, साक्षर लोगों का प्रतिशत बढ़ना चाहिए। लेकिन छत्तीसगढ़ में गणित इसके ठीक उलट नजर आ रहा है। राज्य में आबादी के साथ-साथ 'अनपढ़ों' का आंकड़ा भी साल-दर-साल रिकॉर्ड तोड़ रहा है।



स्कूलों की भीड़, फिर भी निरक्षरता की मार

राज्य सरकार दशकों से साक्षरता मिशन चला रही है। बस्तर से लेकर सरगुजा तक छोटे-छोटे गांवों में प्राइमरी स्कूल खोले गए हैं। भारी-भरकम बजट शिक्षा पर खर्च किया जा रहा है, लेकिन आर्थिक एवं सांख्यिकी विभाग के ताज़ा अनुमानित आंकड़े साक्षरता की इस मशाल पर सवालिया निशान लगा रहे हैं।



बड़ा सवाल

अगर गांव-गांव में स्कूल हैं और शिक्षा का अधिकार (RTE) लागू है, तो फिर राज्य में निरक्षरों की संख्या घटने के बजाय बढ़ क्यों रही है? क्या ये अभियान केवल कागजों पर ही 'साक्षर' बना रहे हैं?



15 सालों में 3 लाख का इजाफा

आर्थिक एवं सांख्यिकी विभाग ने वर्ष 2011 की जनगणना को आधार मानकर 1 मार्च 2026 तक की स्थिति का जो 'गणितीय अनुमान' निकाला है, वह चौंकाने वाला है



  • 2011 की स्थिति: छत्तीसगढ़ में कुल निरक्षर 1 करोड़ 1 लाख 65 हजार 276 थे।
  • 2026 का अनुमान: यह संख्या बढ़कर 1 करोड़ 4 लाख 52 हजार 902 होने की संभावना है।

यानी साक्षरता के तमाम प्रयासों के बावजूद 15 सालों में राज्य में निरक्षरों की फौज में तकरीबन तीन लाख का इजाफा होने जा रहा है।



बड़े जिलों का बुरा हाल

हैरानी की बात यह है कि जहाँ संसाधन सबसे ज्यादा हैं, वहीं स्थिति सबसे ज्यादा चिंताजनक है। न्यायधानी बिलासपुर और राजधानी रायपुर जैसे विकसित क्षेत्रों में भी निरक्षरता का ग्राफ ऊपर चढ़ा है।



  • बिलासपुर: यहाँ निरक्षर आबादी 5 लाख 93 हजार से बढ़कर 6 लाख 61 हजार के पार पहुँचने का अनुमान है।
  • कबीरधाम: यहाँ सबसे भयावह स्थिति दिख रही है, जहाँ अनपढ़ों की संख्या 4 लाख 8 हजार से बढ़कर सीधा 5 लाख 12 हजार तक पहुँच रही है।

कहीं सफलता, कहीं विफलता

एक ही राज्य में दो अलग तस्वीरें नजर आती हैं। जहाँ दुर्ग, कोरबा और बालोद जैसे जिलों ने अपनी निरक्षर आबादी को कम करने में 'शानदार' सफलता पाई है।



वहीं राज्य के अन्य हिस्सों में बढ़ती आबादी शिक्षा व्यवस्था को निगल रही है। दुर्ग ने जहाँ अपने यहाँ निरक्षरों की संख्या में 60 हजार की कमी की है, वहीं कबीरधाम जैसे जिलों में 1 लाख से ज्यादा अनपढ़ बढ़ गए हैं।



निष्कर्ष

विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति केवल जनसंख्या वृद्धि का परिणाम नहीं है, बल्कि सरकारी नीतियों में 'क्वालिटी कंट्रोल' की कमी है। स्कूलों से होने वाले 'ड्रॉपआउट', पलायन करने वाले परिवारों के बच्चों की शिक्षा का अभाव हैं। साक्षरता केंद्रों का निष्क्रिय होना इस बढ़ते अंधेरे की मुख्य वजह है।





अगर समय रहते जमीनी स्तर पर शिक्षा के प्रसार को जनसंख्या वृद्धि की रफ्तार से तेज नहीं किया गया, तो 2026 तक छत्तीसगढ़ के माथे पर 'निरक्षरता का कलंक' और गहरा हो जाएगा।



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