अमित शाह के सामने विरोध टालने रद्द की गई जनसुनवाई, ताकि कोयला खदान पर न हो सरकार की किरकिरी
RAIPUR : छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले के तमनार क्षेत्र में गारे पेलमा सेक्टर-1 कोयला खदान परियोजना को लेकर माहौल लगातार गरमाता जा रहा है। 19 मई को प्रस्तावित जनसुनवाई से पहले इलाके में भारी तनाव की स्थिति बन गई। इस तनावपूर्ण माहौल को देखते हुए एक बार फिर जनसुनवाई को टाल दिया गया। इस समय अमित शाह छत्तीसगढ़ में हैं।
सरकार नहीं चाहती कि उनके सामने विरोध को लेकर किरकिरी हो। आदिवासी समुदाय ने इस परियोजना के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। लोगों का कहना है कि यह सिर्फ जमीन का मामला नहीं, बल्कि उनके अस्तित्व, जंगल और आजीविका की लड़ाई है। स्थिति को देखते हुए प्रशासन ने तमनार चौक से लेकर पेलमा गांव तक पुलिस बल तैनात कर दिया।
ग्रामीणों का विरोध:
ग्रामीणों का आरोप है कि एसईसीएल और अडानी समूह की इस संयुक्त परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए गांवों में लोगों को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है। स्थानीय लोगों का दावा है कि जनसुनवाई से पहले कुछ लोग गांवों में जाकर पेटी, कुर्सी, दरी और छाता जैसे सामान बांट रहे हैं, ताकि विरोध को कमजोर किया जा सके।
लोगों का गुस्सा फूटा:
जैसे ही यह जानकारी गांवों में फैली लोगों का गुस्सा फूट पड़ा। महिलाओं और युवाओं ने विरोध जताते हुए सामान बांटने पहुंचे लोगों को गांव से वापस लौटा दिया। इस घटना के वीडियो भी सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि वे किसी भी तरह के लालच में आने वाले नहीं हैं और अपने जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए आखिरी दम तक संघर्ष करेंगे।
9 लाख पेड़ों पर चलेगी आरी:
इस विरोध की सबसे बड़ी वजह पर्यावरण को होने वाला नुकसान बताया जा रहा है। ग्रामीणों के अनुसार, प्रस्तावित ओपन-कास्ट कोयला खदान के लिए करीब 362 हेक्टेयर जंगल क्षेत्र प्रभावित होगा। स्थानीय लोगों का दावा है कि इस परियोजना के चलते लगभग 9 लाख पेड़ों की कटाई हो सकती है, जिससे पूरे इलाके का पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ जाएगा।
जल,जंगल,ज़मीन की लड़ाई:
आदिवासी समुदाय का कहना है कि जंगल ही उनकी पहचान और जीवन का आधार है। खेती, पशुपालन और वन उपज पर निर्भर हजारों परिवारों को इस परियोजना से सीधा खतरा है। एक बुजुर्ग ग्रामीण ने कहा कि अगर जंगल खत्म हो गया तो आदिवासी समाज के सामने जीवन का संकट खड़ा हो जाएगा।
पहले भी हो चुका है विरोध:
यह पहला मौका नहीं है जब इस परियोजना को लेकर विरोध सामने आया हो। इससे पहले भी जनसुनवाई के दौरान ग्रामीणों और पुलिस के बीच तीखा टकराव हो चुका है। उस समय हालात इतने बिगड़ गए थे कि प्रशासन को जनसुनवाई स्थगित करनी पड़ी थी। अब दोबारा प्रक्रिया शुरू होने से लोगों में पुराना आक्रोश फिर उभर आया है।
इस पूरे मामले ने राजनीतिक रंग भी पकड़ लिया है। कांग्रेस और कई स्थानीय आदिवासी संगठनों ने राज्य सरकार पर सवाल उठाए हैं। विपक्ष का आरोप है कि नियमों और स्थानीय लोगों की सहमति को नजरअंदाज कर परियोजना को आगे बढ़ाया जा रहा है, ताकि निजी कंपनियों को फायदा पहुंचाया जा सके। सरकार को जनसुनवाई टालने की जगह इसकी अनुमति रद्द करनी चाहिए।
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