RKCH में 3 सफाईकर्मियों की मौत पर FIR, एट्रोसिटी एक्ट भी लगा, FIR के बाद हरकत में पुलिस
रायपुर के रामकृष्ण केयर हॉस्पिटल में सैप्टिक टैंक हादसे के बाद आखिरकार पुलिस ने केस दर्ज कर लिया है। टिकरापारा थाना पुलिस ने अस्पताल प्रबंधन के जिम्मेदारों के खिलाफ एट्रोसिटी समेत कई गंभीर धाराओं में FIR दर्ज की है। ठेकेदार किशन सोनी को भी लापरवाही का आरोपी बनाया गया है। अब पूरे मामले की जांच शुरू हो गई है।
एट्रोसिटी एक्ट से बढ़ी गंभीरता
मामले में एट्रोसिटी एक्ट जोड़े जाने से केस और गंभीर हो गया है। यह साफ संकेत है कि मृतक सफाईकर्मियों के साथ कानूनन बड़ा अन्याय हुआ। कानून के मुताबिक ऐसे मामलों में गिरफ्तारी और सख्त कार्रवाई का प्रावधान है। अब देखना है कि कार्रवाई जमीन पर कितनी दिखती है।
‘द सूत्र’ की खबर का असर
इस पूरे मामले को ‘द सूत्र’ ने प्रमुखता से उठाया था। रिपोर्ट में बताया गया था कि कैसे तीन मौतों के बाद भी सांठगांठ का खेल चल रहा है। खबर के बाद ही प्रशासन हरकत में आया। FIR दर्ज होना उसी दबाव का नतीजा माना जा रहा है।
मौत पर क्यों था सन्नाटा
तीन सफाईकर्मियों की मौत के बाद भी प्रशासन का रवैया सवालों में रहा। सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर मजदूरों को जहरीले टैंक में उतारा ही क्यों गया। जबकि मैनुअल स्कैवेंजिंग पूरी तरह प्रतिबंधित है। इसके बावजूद नियमों की खुलेआम अनदेखी हुई।
राष्ट्रीय आयोग की नर्मी पर सवाल
राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग के उपाध्यक्ष हरदीप सिंह गिल भी रायपुर पहुंचे थे। उन्होंने अस्पताल का निरीक्षण किया। अधिकारियों से जवाब लिया। लेकिन कार्रवाई के बजाय सिर्फ चेतावनी देकर लौट गए। इससे पीड़ित परिवारों में नाराजगी थी।
दो मिनट का मौन, फिर खत्म मामला?
निरीक्षण के दौरान मृतकों के लिए दो मिनट का मौन रखा गया। लेकिन उसके बाद कोई ठोस एक्शन नजर नहीं आया। शुरुआत में सख्ती की बात हुई, लेकिन बाद में सुर बदल गए। इससे सिस्टम की नीयत पर सवाल उठ रहे हैं।
हमने बताया, सरकार की बैठक से नाम गायब..
घटना के बाद सरकार ने बैठक की। बड़े-बड़े निर्देश दिए गए। लेकिन जारी बयान में अस्पताल का नाम तक नहीं लिया गया। सिर्फ ‘निजी अस्पताल’ कहकर मामला हल्का करने की कोशिश दिखी। लेकिन द सूत्र ने इसे हाइलाइट कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन का उल्लंघन
सुप्रीम कोर्ट पहले ही मैनुअल स्कैवेंजिंग पर प्रतिबंध लगा चुका है। यह अपराध संज्ञेय और गैर-जमानती है। इसके बावजूद मजदूरों को टैंक में उतारना सीधा कानून का उल्लंघन है। फिर भी कार्रवाई धीमी रही।
मुआवजा देकर मामला शांत?
अस्पताल प्रबंधन ने मृतकों के परिवारों को 30-30 लाख रूपए मुआवजा देने की घोषणा की। प्रशासन भी राहत पर ज्यादा फोकस करता दिखा। लेकिन द सूत्र ने सवाल उठाया कि क्या जान की कीमत सिर्फ मुआवजा है?
अब जांच पर टिकी नजर
टिकरापारा थाना पुलिस पूरे मामले की जांच कर रही है। अब सबकी नजर इस पर है कि जिम्मेदारों पर सख्त कार्रवाई होती है या नहीं। क्योंकि यह सिर्फ हादसा नहीं, सिस्टम की बड़ी लापरवाही है।
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