छत्तीसगढ़ में ई-नीलामी के बाद भी रेत सिंडिकेट का कब्जा, नेता भी शामिल
Aishwarya Dwivedi | Jun 18, 2026, 09:17 IST
रेत-सिंडिकेट-ई-नीलामी-घोटाला
छत्तीसगढ़ में ई-नीलामी के बावजूद नेताओं और रसूखदारों के सिंडिकेट का रेत घाटों पर कब्जा है। इस वर्चस्व की लड़ाई में हिंसक झड़पें हो रही हैं और जनता को तीन गुना महंगी रेत मिल रही है।
समझें क्या है पूरा मामला
रेत घाटों पर खूनी संघर्ष
रेत घाटों को अपने कब्जे में लेने के लिए स्थानीय नेता और जनप्रतिनिधि जुटे हैं। यहां तक कि कई विधायक भी वर्चस्व की इस लड़ाई में शामिल हो चुके हैं। यही वजह है कि आए दिन रेत को लेकर प्रदेश के अलग-अलग घाटों में हिंसा हो रही है।
ई-नीलामी के बाद भी सिंडिकेट
एक रेत घाट के लिए न्यूनतम 2000 से ज्यादा आवेदन जमा होते हैं। ये सभी आवेदन रसूखदार लोग अपने समर्थकों के नाम से डलवाते हैं। जिसकी पर्ची निकलती है, फिर वे सभी ठेकेदार मिलकर एक सिंडिकेट बनाते हैं।
तीन गुना महंगी मिल रही रेत
इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि जिनको भी रेत घाट मिलता है, वे अपना सिंडिकेट बनाते हैं। वे लोडिंग की एक ही ऊंची कीमत तय करते हैं। गाड़ी चलाने वाले और लोकल सप्लायरों की मजबूरी रहती है कि वे रेत इन्हीं से खरीदें।
अफसरों और नेताओं का हिस्सा
यही सिंडिकेट तय करता है कि किसको कितना हिस्सा मिलेगा। रेत घाट से मिलने वाला एक हिस्सा गांव वालों का भी होता है। पिछले साल कई पंचायतों में इस तरह के वीडियो वायरल हो रहे थे। इन वीडियो में रेत घाट से मिलने वाला हिस्सा तय किया जा रहा था। इसके अलावा अफसरों, वहां के नेताओं और पंचायत प्रतिनिधियों का हिस्सा भी तय किया जाता है।
कई बार गांवों के रसूखदार अपनी तय शर्तों पर रेत घाट का संचालन करना चाहते हैं। लेकिन सामने वाला गुट इसका कड़ा विरोध करता है। इस वजह से विवाद लगातार बढ़ जाता है।
FAQ
- रेत घाटों के आवंटन के लिए छत्तीसगढ़ सरकार किस आधुनिक व्यवस्था का उपयोग कर रही है?
उत्तर: छत्तीसगढ़ सरकार रेत घाटों के पारदर्शी आवंटन के लिए ई-नीलामी (E-auction) व्यवस्था का उपयोग कर रही है। - रेत परिवहन के लिए सरकार द्वारा जारी किए जाने वाले आधिकारिक परमिट/पास को क्या कहा जाता है?
उत्तर: रेत या अन्य खनिजों के वैध परिवहन के लिए सरकार द्वारा जारी किए जाने वाले परमिट को पिट पास (Pit Pass) कहा जाता है। - खनन के संदर्भ में 'रॉयल्टी' (Royalty) से क्या तात्पर्य है?
उत्तर: रॉयल्टी वह कानूनी शुल्क या कर है जो किसी भी खनिज (जैसे रेत, कोयला) को जमीन से निकालने के बदले ठेकेदार या खनन कंपनी द्वारा राज्य सरकार के राजस्व विभाग को चुकाया जाता है।
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