28 साल पुराने शिक्षाकर्मी भर्ती मामले में बड़ा खुलासा,22 आरोपियों ने की 320 पदों की भर्ती में गड़बड़ी,
Arun Tiwari | Oct 26, 2026, 22:45 IST
28 साल पुराना शिक्षाकर्मी घोटाला
रायपुर : छत्तीसगढ़ के पंडरिया में 1998 में हुई शिक्षाकर्मी वर्ग-3 की भर्ती एक बार फिर चर्चा में है। करीब 28 साल पुराने इस मामले में भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने बड़ी कार्रवाई करते हुए छह तत्कालीन लोकसेवकों और 16 चयनित अभ्यर्थियों समेत कुल 22 आरोपियों के खिलाफ लगभग 1,000 पृष्ठों का चालान पेश किया है।
मामला जनपद पंचायत पंडरिया में 320 पदों पर हुई भर्ती में अनियमितताओं से जुड़ा है। जांच में साक्षात्कार के लिए तैयार की गई मेरिट सूची में अध्यापन अनुभव के बोनस अंक जोड़ने, आरक्षण के नियमों का पालन नहीं करने, पात्र अभ्यर्थियों को साक्षात्कार से वंचित रखने और चयन समिति के सदस्यों द्वारा अपने रिश्तेदारों को लाभ पहुंचाने जैसे गंभीर तथ्य सामने आए हैं।
भर्ती में गड़बड़ियों को लेकर 25 दिसंबर 1998 को तत्कालीन जनपद पंचायत अध्यक्ष अर्जुन तिवारी ने शिकायत की थी। इसके बाद वर्ष 2000 में अपराध क्रमांक 48/2000 के तहत भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज कर जांच शुरू की गई। लंबी जांच के बाद ब्यूरो ने अब आरोपियों की भूमिका और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर विशेष न्यायाधीश, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, कवर्धा के न्यायालय में चालान प्रस्तुत किया है।
इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू भर्ती के लिए अभ्यर्थियों की योग्यता सूची तैयार करने की प्रक्रिया है। जांच एजेंसी के अनुसार, उस समय लागू मध्यप्रदेश पंचायत शिक्षाकर्मी (भर्ती तथा सेवा की शर्तें) नियम, 1997 के तहत अभ्यर्थियों की छंटनी के बाद अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और सामान्य वर्ग की
अलग-अलग योग्यता सूची तैयार की जानी थी।इस सूची का आधार अर्हता परीक्षा में प्राप्त अंक होने थे। नियमानुसार प्रत्येक प्रवर्ग में उपलब्ध रिक्त पदों की संख्या से तीन गुना अभ्यर्थियों को योग्यताक्रम के अनुसार परीक्षा अथवा
साक्षात्कार के लिए बुलाया जाना था। इसके अलावा जनपद पंचायत की शालाओं में कम से कम एक शिक्षा सत्र तक काम कर चुके अभ्यर्थियों को भी नियमानुसार साक्षात्कार में बुलाने का प्रावधान था।
लेकिन जांच में सामने आया कि साक्षात्कार के लिए तैयार की गई प्रवर्गवार सूची में अर्हता परीक्षा के अंकों के साथ अध्यापन अनुभव के बोनस अंक भी जोड़ दिए गए। इससे साक्षात्कार के लिए अभ्यर्थियों का योग्यताक्रम प्रभावित हुआ।
जांच एजेंसी का आरोप है कि इस प्रक्रिया के कारण योग्यताक्रम में पात्रता रखने वाले कुछ अभ्यर्थियों को साक्षात्कार में बुलाने से वंचित कर दिया गया, जबकि निर्धारित क्रम के अनुसार पात्र नहीं होने वाले कुछ अभ्यर्थियों को साक्षात्कार का अवसर मिल गया।
इस तरह भर्ती की शुरुआती प्रक्रिया में ही नियमों के अनुरूप अभ्यर्थियों की छंटनी नहीं किए जाने का मामला सामने आया। जांच में यह भी देखा गया कि अनुभव के अंकों का लाभ देने की प्रक्रिया ने अंतिम चयन को किस तरह प्रभावित किया।
भर्ती प्रक्रिया में महिला आरक्षण और प्रवर्गवार समायोजन की व्यवस्था भी जांच के दायरे में रही।अभिलेखों के अनुसार, सामान्य महिला वर्ग के 49 रिक्त पदों के लिए कुल 160 महिला अभ्यर्थियों को साक्षात्कार के लिए बुलाया गया था।
इनमें सामान्य वर्ग की 130, अन्य पिछड़ा वर्ग की 26, अनुसूचित जाति की तीन और अनुसूचित जनजाति की एक अभ्यर्थी शामिल थीं। ब्यूरो की जांच में अंतिम चयन के दौरान महिला अभ्यर्थियों के योग्यताक्रम और प्रवर्गवार समायोजन से संबंधित दस्तावेजों की जांच की गई।
इसमें आरक्षण और प्रवर्गवार समायोजन की निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किए जाने के तथ्य सामने आने का दावा किया गया है।आरक्षण का उद्देश्य संबंधित वर्गों के भीतर पात्र महिला और अन्य निर्धारित श्रेणियों के अभ्यर्थियों को नियमों के अनुरूप प्रतिनिधित्व देना है।
ऐसे में चयन प्रक्रिया में इसके पालन का विशेष महत्व होता है।जांच एजेंसी के अनुसार, पंडरिया की भर्ती में अंतिम चयन सूची तैयार करते समय निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। इससे चयन की पारदर्शिता और योग्यताक्रम के अनुरूप नियुक्ति किए जाने पर सवाल खड़े हुए।
भर्ती में दिव्यांग अभ्यर्थियों के पदों और उनके समायोजन की प्रक्रिया की भी जांच की गई।ब्यूरो के अनुसार, सामान्य प्रवर्ग के दिव्यांग पदों पर चयन और दूसरे प्रवर्गों के अभ्यर्थियों के समायोजन से जुड़े अभिलेखों में निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किए जाने के तथ्य मिले।
सामान्य दिव्यांग प्रवर्ग के पर्याप्त अभ्यर्थी उपलब्ध होने के बावजूद चयन और समायोजन के नियमों के अनुसार कार्रवाई नहीं की गई।सबसे महत्वपूर्ण मामला अनुसूचित जाति दिव्यांग प्रवर्ग का है। इस वर्ग के चार रिक्त पदों के लिए नियमानुसार 12 अभ्यर्थियों को साक्षात्कार के लिए बुलाया जाना था।
इसके साथ निर्धारित पात्रता रखने वाले पूर्व शिक्षाकर्मी दिव्यांग अभ्यर्थियों को भी अवसर दिया जाना था।जांच में सामने आया कि आवेदन संबंधी दस्तावेजों में इस प्रवर्ग के 15 दिव्यांग अभ्यर्थी उपलब्ध थे, लेकिन साक्षात्कार के लिए केवल 10 को बुलाया गया।
इस प्रकार उपलब्ध अभ्यर्थियों की संख्या और साक्षात्कार के लिए बुलाए गए अभ्यर्थियों की संख्या में अंतर पाया गया। ब्यूरो ने इसे भर्ती प्रक्रिया में नियमों के पालन से जुड़ी गंभीर अनियमितताओं में शामिल किया है।
इस भर्ती मामले का एक अन्य प्रमुख पहलू चयन समिति के सदस्यों के नजदीकी रिश्तेदारों की उम्मीदवारी से जुड़ा है।ब्यूरो की विवेचना के अनुसार, तत्कालीन शिक्षा स्थायी समिति के अध्यक्ष शंकरलाल चंद्रवंशी तथा समिति के सदस्य बृजबिहारी वैष्णव और अंबिकादत्त शर्मा के नजदीकी रिश्तेदार भर्ती प्रक्रिया में अभ्यर्थी थे।इनमें उग्रसेन चंद्रवंशी, नीरा चंद्रवंशी, विनीता वैष्णव, देवेश वैष्णव, स्वर्णा वैष्णव, कौशल्या वैष्णव और शैल तिवारी के नाम सामने आए हैं।
जांच एजेंसी का आरोप है कि संबंधित समिति सदस्यों ने अपने नजदीकी रिश्तेदारों के साक्षात्कार के दौरान स्वयं उपस्थित रहकर उन्हें अंक दिए। साक्षात्कार से पहले इन सदस्यों ने अपने रिश्तेदारों के अभ्यर्थी होने की घोषणा भी नहीं की थी।इस घटनाक्रम ने चयन समिति की निष्पक्षता और हितों के टकराव से जुड़े सवाल खड़े किए हैं।
भर्ती प्रक्रिया में चयन समिति के सदस्यों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। ऐसे में अपने रिश्तेदारों के साक्षात्कार में स्वयं शामिल होकर उन्हें अंक देना जांच एजेंसी के अनुसार गंभीर अनियमितता है।ब्यूरो ने इस मामले में मध्यप्रदेश पंचायत राज अधिनियम, 1993 की धारा 40(1) के स्पष्टीकरण के खंड (ग) का भी उल्लेख किया है।
इसमें पंचायत पदाधिकारी द्वारा अपने पद या प्रभाव का प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष उपयोग कर किसी रिश्तेदार को पंचायत में नियोजन दिलाने या आर्थिक लाभ पहुंचाने के लिए कार्रवाई करने को कदाचार की श्रेणी में रखा गया है।
जांच में कुछ चयनित अभ्यर्थियों के अध्यापन अनुभव प्रमाणपत्र भी संदेह के घेरे में आए।ब्यूरो के मुताबिक, कुछ अभ्यर्थियों ने जिस अवधि में अध्यापन कार्य करने का दावा किया था, उसी दौरान वे महाविद्यालयों में नियमित छात्र के रूप में अध्ययनरत थे। संबंधित अवधि में छात्रवृत्ति प्राप्त करने के अभिलेख भी विवेचना के दौरान सामने आए।
इससे उनके अध्यापन अनुभव की वास्तविकता और पात्रता पर सवाल उठे।जांच एजेंसी के अनुसार, संबंधित अभ्यर्थियों के अनुभव प्रमाणपत्रों को लेकर चयन समिति के समक्ष आपत्तियां और शिकायतें उपलब्ध थीं। इसके बावजूद उन्हें अध्यापन अनुभव के बोनस अंक दिए गए।
जांच में इन दस्तावेजों को भर्ती प्रक्रिया में अनियमितताओं से जोड़कर देखा गया। जांच एजेंसी का आरोप है कि अनुभव संबंधी पात्रता पर सवाल होने के बावजूद संबंधित अभ्यर्थियों को लाभ दिया गया, जिससे चयन प्रक्रिया प्रभावित हुई।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि अध्यापन अनुभव के अंकों को साक्षात्कार के लिए तैयार की गई सूची में शामिल किए जाने से योग्यताक्रम प्रभावित होने का आरोप पहले से ही जांच के केंद्र में था।
ब्यूरो के अनुसार, मामले की विवेचना के दौरान कुल नौ लोकसेवकों और 16 चयनित अभ्यर्थियों की भूमिका सामने आई। इनमें से तीन तत्कालीन लोकसेवकों की मृत्यु हो चुकी है। इसके बाद छह जीवित तत्कालीन लोकसेवकों और 16 चयनित अभ्यर्थियों सहित कुल 22 आरोपियों के खिलाफ चालान प्रस्तुत किया गया।
1. एम.एल. भारती — तत्कालीन मुख्य कार्यपालन अधिकारी, जनपद पंचायत पंडरिया।
2. अंबिका प्रसाद शांडिल्य — तत्कालीन मुख्य कार्यपालन अधिकारी, जनपद पंचायत पंडरिया।
3. एन.एल. वस्त्रकार — तत्कालीन विकासखंड शिक्षा अधिकारी, पंडरिया।
4. एन.आर. वर्मा — तत्कालीन उप संचालक, लोक शिक्षण, कवर्धा।
5. शंकरलाल चंद्रवंशी — तत्कालीन अध्यक्ष, शिक्षा स्थायी समिति।
6. हरिराम घृतलहरे — तत्कालीन सदस्य, शिक्षा स्थायी समिति।
इन छह लोकसेवकों के साथ भर्ती में चयनित 16 अभ्यर्थियों को भी आरोपी बनाया गया है।
वहीं, प्रकरण से जुड़े तत्कालीन मुख्य कार्यपालन अधिकारी एम.एल. बढ़ई और शिक्षा स्थायी समिति के तत्कालीन सदस्य बृजबिहारी वैष्णव और अंबिकादत्त शर्मा की मृत्यु हो चुकी है। ब्यूरो ने चालान में उनकी मृत्यु की जानकारी भी दी है।
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि 22 आरोपियों के खिलाफ चालान पेश किया गया है, लेकिन चालान में लगाए गए आरोप अपने आप में दोषसिद्धि नहीं हैं। आरोपियों की आपराधिक जिम्मेदारी का अंतिम निर्धारण न्यायालय द्वारा किया जाएगा।
जांच के दौरान संकलित मौखिक, दस्तावेजी और अन्य साक्ष्यों के आधार पर ब्यूरो ने आरोपियों की अलग-अलग भूमिका के अनुसार अभियोजन के लिए पर्याप्त साक्ष्य मिलने का दावा किया है।
मामले में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 13(1)(डी) और 13(2) के साथ भारतीय दंड संहिता की धारा 120बी, 420, 467, 468 और 471 के तहत कार्रवाई की गई है।
इन धाराओं में आपराधिक षड्यंत्र, धोखाधड़ी और कूटरचित दस्तावेज तैयार करने अथवा उनका उपयोग करने जैसे आरोप शामिल हैं। भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की संबंधित धाराएं लोकसेवकों द्वारा पद के दुरुपयोग से जुड़े आरोपों से संबंधित हैं।
ब्यूरो का कहना है कि भर्ती प्रक्रिया में अनियमितताओं के दौरान संबंधित लोकसेवकों और लाभ प्राप्त करने वाले अभ्यर्थियों के बीच आपसी सांठगांठ के साक्ष्य मिले हैं। इन्हीं साक्ष्यों के आधार पर आरोपियों की पृथक-पृथक भूमिका का आकलन कर चालान प्रस्तुत किया गया है।
करीब 28 साल पहले हुई इस भर्ती की जांच अब न्यायिक प्रक्रिया के महत्वपूर्ण चरण में पहुंच गई है। ब्यूरो ने लगभग 1,000 पृष्ठों का चालान विशेष न्यायाधीश, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, कवर्धा के न्यायालय में पेश किया है।
मामले में अब न्यायालय के समक्ष अभियोजन के साक्ष्यों, दस्तावेजों और आरोपियों की कथित भूमिका का परीक्षण होगा। यह तय होना बाकी है कि भर्ती प्रक्रिया में सामने आई अनियमितताएं किन आरोपियों की व्यक्तिगत जिम्मेदारी से जुड़ती हैं और उनके विरुद्ध लगाए गए आरोप न्यायालय में किस हद तक प्रमाणित होते हैं।
इस मामले का व्यापक महत्व इसलिए है कि सरकारी भर्ती में मेरिट, आरक्षण, अनुभव प्रमाणपत्र और चयन समिति की निष्पक्षता जैसे बुनियादी नियमों के उल्लंघन की जांच लगभग तीन दशक बाद भी जारी है। पंडरिया की 320 पदों वाली भर्ती में सामने आए तथ्य इस बात की पड़ताल का आधार बने हैं कि चयन प्रक्रिया में नियमों का पालन हुआ या नहीं और यदि अनियमितताएं हुईं, तो उनके लिए कौन जिम्मेदार था।
भर्ती में हुई गड़बड़ी
मेरिट में अनुभव के अंक जोड़ने से बदला योग्यताक्रम
अलग-अलग योग्यता सूची तैयार की जानी थी।इस सूची का आधार अर्हता परीक्षा में प्राप्त अंक होने थे। नियमानुसार प्रत्येक प्रवर्ग में उपलब्ध रिक्त पदों की संख्या से तीन गुना अभ्यर्थियों को योग्यताक्रम के अनुसार परीक्षा अथवा
साक्षात्कार के लिए बुलाया जाना था। इसके अलावा जनपद पंचायत की शालाओं में कम से कम एक शिक्षा सत्र तक काम कर चुके अभ्यर्थियों को भी नियमानुसार साक्षात्कार में बुलाने का प्रावधान था।
लेकिन जांच में सामने आया कि साक्षात्कार के लिए तैयार की गई प्रवर्गवार सूची में अर्हता परीक्षा के अंकों के साथ अध्यापन अनुभव के बोनस अंक भी जोड़ दिए गए। इससे साक्षात्कार के लिए अभ्यर्थियों का योग्यताक्रम प्रभावित हुआ।
जांच एजेंसी का आरोप है कि इस प्रक्रिया के कारण योग्यताक्रम में पात्रता रखने वाले कुछ अभ्यर्थियों को साक्षात्कार में बुलाने से वंचित कर दिया गया, जबकि निर्धारित क्रम के अनुसार पात्र नहीं होने वाले कुछ अभ्यर्थियों को साक्षात्कार का अवसर मिल गया।
इस तरह भर्ती की शुरुआती प्रक्रिया में ही नियमों के अनुरूप अभ्यर्थियों की छंटनी नहीं किए जाने का मामला सामने आया। जांच में यह भी देखा गया कि अनुभव के अंकों का लाभ देने की प्रक्रिया ने अंतिम चयन को किस तरह प्रभावित किया।
49 महिला पदों के लिए 160 अभ्यर्थियों को बुलाया
इनमें सामान्य वर्ग की 130, अन्य पिछड़ा वर्ग की 26, अनुसूचित जाति की तीन और अनुसूचित जनजाति की एक अभ्यर्थी शामिल थीं। ब्यूरो की जांच में अंतिम चयन के दौरान महिला अभ्यर्थियों के योग्यताक्रम और प्रवर्गवार समायोजन से संबंधित दस्तावेजों की जांच की गई।
इसमें आरक्षण और प्रवर्गवार समायोजन की निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किए जाने के तथ्य सामने आने का दावा किया गया है।आरक्षण का उद्देश्य संबंधित वर्गों के भीतर पात्र महिला और अन्य निर्धारित श्रेणियों के अभ्यर्थियों को नियमों के अनुरूप प्रतिनिधित्व देना है।
ऐसे में चयन प्रक्रिया में इसके पालन का विशेष महत्व होता है।जांच एजेंसी के अनुसार, पंडरिया की भर्ती में अंतिम चयन सूची तैयार करते समय निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। इससे चयन की पारदर्शिता और योग्यताक्रम के अनुरूप नियुक्ति किए जाने पर सवाल खड़े हुए।
दिव्यांग अभ्यर्थियों के चयन में भी नियमों की अनदेखी
सामान्य दिव्यांग प्रवर्ग के पर्याप्त अभ्यर्थी उपलब्ध होने के बावजूद चयन और समायोजन के नियमों के अनुसार कार्रवाई नहीं की गई।सबसे महत्वपूर्ण मामला अनुसूचित जाति दिव्यांग प्रवर्ग का है। इस वर्ग के चार रिक्त पदों के लिए नियमानुसार 12 अभ्यर्थियों को साक्षात्कार के लिए बुलाया जाना था।
इसके साथ निर्धारित पात्रता रखने वाले पूर्व शिक्षाकर्मी दिव्यांग अभ्यर्थियों को भी अवसर दिया जाना था।जांच में सामने आया कि आवेदन संबंधी दस्तावेजों में इस प्रवर्ग के 15 दिव्यांग अभ्यर्थी उपलब्ध थे, लेकिन साक्षात्कार के लिए केवल 10 को बुलाया गया।
इस प्रकार उपलब्ध अभ्यर्थियों की संख्या और साक्षात्कार के लिए बुलाए गए अभ्यर्थियों की संख्या में अंतर पाया गया। ब्यूरो ने इसे भर्ती प्रक्रिया में नियमों के पालन से जुड़ी गंभीर अनियमितताओं में शामिल किया है।
चयन समिति के सदस्यों ने रिश्तेदारों को लाभ पहुंचाया
जांच एजेंसी का आरोप है कि संबंधित समिति सदस्यों ने अपने नजदीकी रिश्तेदारों के साक्षात्कार के दौरान स्वयं उपस्थित रहकर उन्हें अंक दिए। साक्षात्कार से पहले इन सदस्यों ने अपने रिश्तेदारों के अभ्यर्थी होने की घोषणा भी नहीं की थी।इस घटनाक्रम ने चयन समिति की निष्पक्षता और हितों के टकराव से जुड़े सवाल खड़े किए हैं।
भर्ती प्रक्रिया में चयन समिति के सदस्यों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। ऐसे में अपने रिश्तेदारों के साक्षात्कार में स्वयं शामिल होकर उन्हें अंक देना जांच एजेंसी के अनुसार गंभीर अनियमितता है।ब्यूरो ने इस मामले में मध्यप्रदेश पंचायत राज अधिनियम, 1993 की धारा 40(1) के स्पष्टीकरण के खंड (ग) का भी उल्लेख किया है।
इसमें पंचायत पदाधिकारी द्वारा अपने पद या प्रभाव का प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष उपयोग कर किसी रिश्तेदार को पंचायत में नियोजन दिलाने या आर्थिक लाभ पहुंचाने के लिए कार्रवाई करने को कदाचार की श्रेणी में रखा गया है।
कॉलेज में नियमित पढ़ाई, फिर भी अध्यापन अनुभव के अंक
इससे उनके अध्यापन अनुभव की वास्तविकता और पात्रता पर सवाल उठे।जांच एजेंसी के अनुसार, संबंधित अभ्यर्थियों के अनुभव प्रमाणपत्रों को लेकर चयन समिति के समक्ष आपत्तियां और शिकायतें उपलब्ध थीं। इसके बावजूद उन्हें अध्यापन अनुभव के बोनस अंक दिए गए।
जांच में इन दस्तावेजों को भर्ती प्रक्रिया में अनियमितताओं से जोड़कर देखा गया। जांच एजेंसी का आरोप है कि अनुभव संबंधी पात्रता पर सवाल होने के बावजूद संबंधित अभ्यर्थियों को लाभ दिया गया, जिससे चयन प्रक्रिया प्रभावित हुई।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि अध्यापन अनुभव के अंकों को साक्षात्कार के लिए तैयार की गई सूची में शामिल किए जाने से योग्यताक्रम प्रभावित होने का आरोप पहले से ही जांच के केंद्र में था।
नौ लोकसेवकों और 16 अभ्यर्थियों की भूमिका आई सामने
चालान में नामजद तत्कालीन लोकसेवकों में शामिल हैं
2. अंबिका प्रसाद शांडिल्य — तत्कालीन मुख्य कार्यपालन अधिकारी, जनपद पंचायत पंडरिया।
3. एन.एल. वस्त्रकार — तत्कालीन विकासखंड शिक्षा अधिकारी, पंडरिया।
4. एन.आर. वर्मा — तत्कालीन उप संचालक, लोक शिक्षण, कवर्धा।
5. शंकरलाल चंद्रवंशी — तत्कालीन अध्यक्ष, शिक्षा स्थायी समिति।
6. हरिराम घृतलहरे — तत्कालीन सदस्य, शिक्षा स्थायी समिति।
इन छह लोकसेवकों के साथ भर्ती में चयनित 16 अभ्यर्थियों को भी आरोपी बनाया गया है।
वहीं, प्रकरण से जुड़े तत्कालीन मुख्य कार्यपालन अधिकारी एम.एल. बढ़ई और शिक्षा स्थायी समिति के तत्कालीन सदस्य बृजबिहारी वैष्णव और अंबिकादत्त शर्मा की मृत्यु हो चुकी है। ब्यूरो ने चालान में उनकी मृत्यु की जानकारी भी दी है।
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि 22 आरोपियों के खिलाफ चालान पेश किया गया है, लेकिन चालान में लगाए गए आरोप अपने आप में दोषसिद्धि नहीं हैं। आरोपियों की आपराधिक जिम्मेदारी का अंतिम निर्धारण न्यायालय द्वारा किया जाएगा।
भ्रष्टाचार, साजिश और कूटरचना की धाराओं में कार्रवाई
मामले में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 13(1)(डी) और 13(2) के साथ भारतीय दंड संहिता की धारा 120बी, 420, 467, 468 और 471 के तहत कार्रवाई की गई है।
इन धाराओं में आपराधिक षड्यंत्र, धोखाधड़ी और कूटरचित दस्तावेज तैयार करने अथवा उनका उपयोग करने जैसे आरोप शामिल हैं। भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की संबंधित धाराएं लोकसेवकों द्वारा पद के दुरुपयोग से जुड़े आरोपों से संबंधित हैं।
ब्यूरो का कहना है कि भर्ती प्रक्रिया में अनियमितताओं के दौरान संबंधित लोकसेवकों और लाभ प्राप्त करने वाले अभ्यर्थियों के बीच आपसी सांठगांठ के साक्ष्य मिले हैं। इन्हीं साक्ष्यों के आधार पर आरोपियों की पृथक-पृथक भूमिका का आकलन कर चालान प्रस्तुत किया गया है।
1,000 पन्नों के चालान पर अब न्यायालय में आगे की कार्रवाई
मामले में अब न्यायालय के समक्ष अभियोजन के साक्ष्यों, दस्तावेजों और आरोपियों की कथित भूमिका का परीक्षण होगा। यह तय होना बाकी है कि भर्ती प्रक्रिया में सामने आई अनियमितताएं किन आरोपियों की व्यक्तिगत जिम्मेदारी से जुड़ती हैं और उनके विरुद्ध लगाए गए आरोप न्यायालय में किस हद तक प्रमाणित होते हैं।
इस मामले का व्यापक महत्व इसलिए है कि सरकारी भर्ती में मेरिट, आरक्षण, अनुभव प्रमाणपत्र और चयन समिति की निष्पक्षता जैसे बुनियादी नियमों के उल्लंघन की जांच लगभग तीन दशक बाद भी जारी है। पंडरिया की 320 पदों वाली भर्ती में सामने आए तथ्य इस बात की पड़ताल का आधार बने हैं कि चयन प्रक्रिया में नियमों का पालन हुआ या नहीं और यदि अनियमितताएं हुईं, तो उनके लिए कौन जिम्मेदार था।
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