कमेटी की जांच में वरुण नागेश यौन शोषण का दोषी, विभाग ने दे दी जिले की कमान

VINAY VERMA | Sept 10, 2026, 18:33 IST
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वरुण नागेश पर यौन शोषण का आरोप
वरुण नागेश पर यौन शोषण का आरोप

महिला एवं बाल विकास विभाग के अधिकारी वरुण नागेश की पोस्टिंग को लेकर सवाल उठ रहे हैं। दो महिला कर्मचारियों के यौन उत्पीड़न के आरोप के बाद भी उन्हें जिला कार्यक्रम अधिकारी बनाए जाने पर विवाद सामने आया है।

महिला एवं बाल विकास विभाग में अफसरों की मेहरबानी का ऐसा मामला सामने आया है, जिसने पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस अधिकारी पर उनकी ही दो महिला मातहतों ने यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोप लगाए, कलेक्टर की जांच कमेटी ने जिसे दोषी ठहराया, विभाग ने उसी अधिकारी को पहले रायपुर में अहम जिम्मेदारी दी और अब जिले की कमान सौंप दी। अधिकारी का नाम वरुण नागेश है। दंतेवाड़ा में जिला कार्यक्रम अधिकारी रहते हुए उन पर दो महिला कर्मचारियों ने यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए थे।

कमेटी की रिपोर्ट के बाद भी कार्रवाई नहीं

मामले की शिकायत के बाद कलेक्टर स्तर पर जांच कमेटी बनाई गई थी। जांच में वरुण नागेश को आरोपों का दोषी पाया गया। इसके बाद उन्हें तत्काल प्रभाव से निलंबित किया गया और जगदलपुर में अटैच किया गया था। लेकिन विभागीय कार्रवाई यहीं खत्म नहीं हुई। सवाल यह है कि जब जांच कमेटी की रिपोर्ट में अधिकारी को दोषी माना गया था, तब विभाग ने उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने के बजाय उन्हें आगे जिम्मेदारी देने का रास्ता क्यों चुना?

निलंबन में रायपुर कैसे पहुंचे?

सबसे बड़ा सवाल निलंबन की अवधि को लेकर है। जानकारी के मुताबिक, निलंबन के दौरान ही वरुण नागेश रायपुर पहुंच गए। इसके बाद उन्हें महिला एवं बाल विकास विभाग के राज्य स्तरीय संसाधन केंद्र यानी एसआरसी में जिम्मेदारी दी गई। हालिया प्रशासनिक फेरबदल में उन्हें राज्य स्तरीय संसाधन केंद्र, रायपुर में उप संचालक बनाए जाने की जानकारी भी सामने आई। यानी जिस अधिकारी पर गंभीर आरोप लगे और जिसकी जांच रिपोर्ट भी विभाग के सामने थी, उसे विभाग ने हाशिए पर रखने के बजाय महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दे दी।

अब गृह जिले की कमान

मामला यहीं नहीं रुका। अब वरुण नागेश को गरियाबंद जिले का जिला कार्यक्रम अधिकारी बनाया गया है। खास बात यह है कि वरुण नागेश मूल रूप से गरियाबंद के ही रहने वाले हैं। यानी उन्हें अपने गृह जिले की जिम्मेदारी मिल गई। सामान्य प्रशासन विभाग के नियमों के मुताबिक सामान्य परिस्थितियों में अधिकारी की पोस्टिंग उसके गृह जिले में नहीं की जाती। विशेष परिस्थितियों में रिटायरमेंट से एक साल पहले गृह जिले में पदस्थापना का प्रावधान होने की बात कही जाती है। ऐसे में उनकी पोस्टिंग ने विभाग के भीतर ही सवाल खड़े कर दिए हैं।

कोर्ट के स्टे का दिया जा रहा हवाला

वरुण नागेश ने जांच रिपोर्ट के खिलाफ कोर्ट का रुख किया था। अब उनकी गरियाबंद पदस्थापना को लेकर यह दावा किया जा रहा है कि कोर्ट से उन्हें स्टे मिला है। लेकिन विभाग की ओर से इस स्टे की वास्तविक स्थिति और उसमें दिए गए निर्देशों को लेकर तस्वीर साफ नहीं है। सिर्फ कोर्ट में राहत मिलने के आधार पर क्या विभाग किसी अधिकारी को जिले का प्रमुख बना सकता है, यह भी बड़ा सवाल है। खासकर तब, जब मामला महिला कर्मचारियों से जुड़े यौन उत्पीड़न के आरोपों का हो।

महिला विभाग में ही सबसे बड़ा सवाल

महिला एवं बाल विकास विभाग में यह मामला इसलिए और गंभीर हो जाता है क्योंकि यहां बड़ी संख्या में महिला कर्मचारी काम करती हैं। ऐसे विभाग में यौन उत्पीड़न के आरोपों से घिरे अधिकारी को जिला स्तर की कमान देने का फैसला कर्मचारियों के बीच असहजता पैदा कर सकता है। विभाग से यह उम्मीद की जाती है कि वह महिला कर्मचारियों की सुरक्षा और भरोसे को प्राथमिकता देगा, लेकिन इस मामले में फैसले उलटी दिशा में जाते दिखाई दे रहे हैं।

सवाल, जिनका जवाब विभाग को देना होगा

निलंबन अवधि में वरुण नागेश को रायपुर कैसे लाया गया? उन्हें राज्य स्तरीय ट्रेनिंग सेंटर की जिम्मेदारी किस आधार पर मिली? क्या कोर्ट के आदेश में उन्हें दोषमुक्त घोषित किया गया है या सिर्फ किसी कार्रवाई पर अंतरिम राहत मिली है? उनका निलंबन कब खत्म हुआ और उसका आदेश कहां है? जांच कमेटी की रिपोर्ट के बावजूद उन्हें जिम्मेदारी क्यों दी गई? और सबसे अहम, गृह जिले गरियाबंद में पोस्टिंग देने का आधार क्या है? विभाग इन सवालों पर चुप रहा तो यह मामला सिर्फ एक अधिकारी की पोस्टिंग का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की कार्यशैली पर सवाल बन जाएगा।

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