ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण तभी, जब शासन साबित करेगा प्रदेश में हैं असाधारण परिस्थितयां

Sanjay Gupta | Mar 24, 2026, 19:08 IST
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Photograph: (THESOOTR)

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण संबंधी सभी याचिकाएं फिर हाईकोर्ट जबलपुर लौट आई है। इस मामले में 16 अप्रैल से नियमित सुनवाई होगी, लेकिन मुख्य मुद्दा इंदिरा साहनी केस होगा।

मध्यप्रदेश में साल 2019 यानी सात साल से चल रहे ओबीसी के 27 फीसदी आरक्षण केस की अब उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अब हाईकोर्ट इसमें देरी नहीं करना चाहता है और सभी पक्षकारों से उनके जवाब मांगे गए हैें। इस पर फिर नियमित फाइनल सुनवाई 16 अप्रैल से होगी। सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी माह में इस केस को तीन माह में निराकृत करने के निर्देश दिए हुए है।

इस केस में तीन याचिकाएं अहम है...

मप्र में तत्कालीन कमलनाथ सरकार ने ओबीसी आरक्षण को 14 से बढ़ाकर 27 फीसदी करने का आर्डिनेंस लागू किया। इस पूरे विवाद में तीन याचिकाएं सबसे अहम है-

याचिका 5901/2029

  • ओबीसी आरक्षण 27 फीसदी देने के लिए कमलनाथ सरकार के आर्डिनेंस के खिलाफ सबसे पहले मूल याचिका 5901/2019 लगी। अशिता दुबे की इस याचिका जरिए ओबीसी को 14 फीसदी से अधिक आरक्षण देने पर स्टे हो गया।
  • इसके साथ ही विविध भर्तियां नए आर्डिेनेंस के साथ 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण के साथ निकलती गई और इस पर याचिकाएं लगती गई और स्टे होते गए।
  • सरकार ने फिर जुलाई 2019 में 27 फीसदी आरक्षण का एक्ट पास कर दिया। यानी इसके सात ही आर्डिनेंस खत्म हो गया।

दूसरी अहम याचिका 3668/2022

आरक्षण एक्ट पास होने के बाद इस लागू करने के लिए नियम, आरक्षण रोस्टर का नोटिफिकेशन जारी हुआ। इस पर एक सबसे अहम याचिका शिवम गौतम की 3688/2022 लगी।

यह याचिका पीएससी की सहायक जिला लोक अभियोजन (एडीपीओ) की भर्ती को लेकर लगी थी जिसमें 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण था। इसमें 14 मई 2022 को फिर हाईकोर्ट ने ओबीसी को 14 फीसदी से ज्यादा आरक्षण देने पर रोक लगा दी।

ओबीसी वेलफेयर कमेटी का पक्ष है कि एक्ट पर कोई रोक नहीं है। आर्डिनेंस पर रोक थी लेकिन वह तो पहले ही खत्म हो चुका है तो 27 फीसदी आरक्षण मिलना चाहिए

वहीं दूसरे पक्ष का कहना है कि एक्ट पर भले ही रोक नहीं है लेकिन एक्ट लागू करने के लिए जो आरक्षण रोस्टर नोटिफिकेशन है इसे चुनौती दी गई है और इस याचिका 3668/22 के तहत इस पर स्टे है। यानी भर्ती में ओबीसी को 14 फीसदी से ज्यादा आरक्षण नहीं दिया जा सकता है।

तीसरी अहम याचिका 5596/24

प्रज्ञा शर्मा, प्रियंका तिवारी, आशीष जैन व अन्य की याचिका में पीएससी में मूल रूप से 13 फीसदी होल्ड उम्मीदवारों की मेरिट सूची जारी करने की मांग की थी। इसमें दो फैसले अहम हुए।

पहले तो जबलपुर हाईकोर्ट ने 4 अप्रैल 2025 को अहम आदेश दिया कि पक्षकारों को यानी शासन और पीएससी को विशेष रूप से उन व्यक्तियों के नाम और योग्यता क्रम का खुलासा करना होगा, जिन्हें अनारक्षित और ओबीसी श्रेणी में 13% हिस्सा शामिल है।

याचिकाकर्ताओं की योग्यता क्रम का भी खुलासा किया जाना चाहिए। साथ ही बताया जाना चाहिए कि क्या याचिकाकर्ताओं से कम योग्यता क्रम प्राप्त करने वाले किसी उम्मीदवार को 87% रिक्तियों को भरने के लिए नियुक्त किया गया है।

यह वह आदेश था जिसके तहत 13 फीसदी होल्ड पदों की भी मेरिट सूची जारी होना थी।

इसके बाद इसमें दूसरा अहम आदेश 16 जुलाई 2024 को जारी हुआ। शासन ने चार अप्रैल के इस आदेश का पालन नहीं किया और इस पर हाईकोर्ट ने 50 हजार का दंड शासन पर लगा दिया। तब उम्मीद थी कि 13 फीसदी की सूची जारी होगी। लेकिन इसके बाद इस याचिका को मूल याचिका 5901 के साथ लिंक कर दिया गया। इसके साथ ही यह मामला भी हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट और फिर अब हाईकोर्ट आ गया।

अब 27 फीसदी आरक्षण में बताना होगी असाधारण परस्थितियां

इस केस में सबसे अहम शासन के लिए होगा कि वह बताए और साबित करे कि मप्र में वह असाधारण परिस्थितियां है जिसमें ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण देना चाहिए। दरअसल इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ (1992) के ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण की कुल सीमा 50 फीसदी तय की थी। लेकिन साथ ही यह भी कहा था कि कुछ "असाधारण परिस्थितियों" (Extraordinary Circumstances) में 50 फीसदी से अधिक आरक्षण दिया जा सकता है।

असाधारण परिस्थिति में है कि...

  • सुदूर और दुर्गम क्षेत्र (Far-flung and remote areas): ऐसे भौगोलिक क्षेत्र या समुदाय जो मुख्यधारा से कटे हुए हैं और जिन्हें विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।
  • राष्ट्रीय जीवन की मुख्यधारा से बाहर (Excluded from mainstream): ऐसी जातियां या समूह जो ऐतिहासिक और सामाजिक रूप से इतने पिछड़े हैं कि उन्हें मुख्यधारा में लाने के लिए सामान्य 50% की सीमा पर्याप्त नहीं है।
  • क्षेत्रीय या जनसांख्यिकीय विशिष्टता (Regional or Demographic Specifics): कुछ राज्यों में आबादी की संरचना और पिछड़ेपन की प्रकृति इतनी विशिष्ट हो सकती है कि वहां 50% से अधिक आरक्षण तर्कसंगत हो (जैसे तमिलनाडु में 69% आरक्षण का मामला)।

सुप्रीम कोर्ट ने इस केस में कहा था यह फैसला हाईकोर्ट कर सकता है

मप्र के 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण केस की सुनवाई के दौरान बेंच ने एक बार कहा भी था कि प्रदेश में क्या डेमोग्राफिक स्थिति है और क्या पिछड़ापन है यह वहां हाईकोर्ट में ही तय हो सकता है। ऐसे में यह केस वहीं भेजा जाना ही उचित होगा। इसके बाद यह केस मप्र हाईकोर्ट में रैफर हो गया।

हालांकि, ओबीसी वेलफेयर कमेटी का लगातार यह तर्क रहा कि छत्तीसगढ़ जैसी राहत मप्र में दी जाए और यहां एक्ट क्योंकि 27 फीसदी का है तो जो रूकी हुई भर्ती और रिजल्ट है वह 27 फीसदी के साथ होने दिया जाए। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम राहत देने की जगह फाइनल फैसले की बात कही और मामला हाईकोर्ट भेज दिया।

फैसला होने पर 40 हजार से अधिक युवाओं को मिलेगी नौकरी

इस मामले में फैसला होने पर करीब 40 हजार युवाओं की नौकरी के रास्ते खुल जाएंगे। पीएससी, ईएसबी के साथ ही बिजली कंपनी व अन्य विभागों द्वारा ली गई भर्ती में करीब इतने पद 13 फीसदी कैटेगरी में होल्ड रखे हुए हैं, जिसमें एक लाख से ज्यादा उम्मीदवार (ओबीसी और अनारक्षित दोनों) उलझे हुए हैं।

यह स्थिति सितंबर 2022 से ही है जबसे 87-13 फीसदी का फार्मूला लागू किया गया। ऐसे में ऊंट जिस करवट बैठेगा उस कैटेगरी के युवाओं को यह होल्ड पद पर भर्ती मिल जाएगी।

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