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BHOPAL.मध्यप्रदेश वन विभाग ने 728 वनरक्षक पदों पर भर्ती का विज्ञापन जारी किया, लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि इसमें अनुसूचित जाति (SC) के लिए एक भी पद आरक्षित नहीं किया गया। नियमों के मुताबिक 16% आरक्षण अनिवार्य है, फिर यह चूक कैसे हो गई? इतने जिम्मेदार अधिकारियों के होते हुए ऐसी गलती ने विभागीय कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
क्या है पूरा मामला?
वन विभाग ने कुल 728 रिक्त पदों के लिए भर्ती निकाली है, लेकिन जारी विज्ञापन में आरक्षण का बंटवारा कुछ इस तरह दिखाया गया है, जिसने विवाद खड़ा कर दिया है।
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अधिनियम के अनुसार नियम क्या...
SC के लिए 16% आरक्षण अनिवार्य
ST के लिए 20%
OBC के लिए 27%
EWS के लिए 10%
यदि 728 पदों की गणना की जाए तो लगभग 116 पद अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित होने चाहिए थे। फिर यह कोटा शून्य कैसे हो गया?
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अजाक्स संरक्षक का बयान: ‘यह सुधार करना ही होगा’
अजाक्स के संरक्षक और रिटायर्ड अपर मुख्य सचिव जे.एन. कंसोटिया ने कहा कि नियमानुसार SC के 16% पद शामिल करना अनिवार्य है। कंसोटिया के अनुसार लगभग 116 पद SC वर्ग को मिलने चाहिए। उन्होंने साफ कहा कि यह बड़ी चूक है और विभाग को नियमों के अनुसार सुधार करना होगा। आखिर गलती कहां हुई, यह विभाग ही बता सकता है।
वन विभाग की सफाई: ‘हो सकता है गणना में गलती हुई हो’
वन विभाग की एपीसीसीएफ (प्रशासन-2) कमालिका मोहंता ने कहा कि संभव है गणना में त्रुटि हुई हो। उन्होंने भरोसा दिलाया कि मामले की जांच कराई जाएगी और यदि गलती है तो उसे ठीक किया जाएगा।
कर्मचारी संघ का पक्ष: ‘जानबूझकर नहीं हुई होगी गलती’
मध्यप्रदेश वन निगम एवं वन्य प्राणी संरक्षण कर्मचारी संघ के प्रांताध्यक्ष रामयश मौर्य ने कहा कि विभाग जानबूझकर ऐसी गलती नहीं करता। संभावना है कि प्रशासनिक स्तर पर कोई चूक हुई हो, जिसे सुधारा जाएगा। उन्होंने भी माना कि SC वर्ग को नियमानुसार 16% आरक्षण मिलना चाहिए।
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सवाल सिर्फ गणना का नहीं, सिस्टम का है
इतने बड़े स्तर की भर्ती में यदि आरक्षण जैसी संवेदनशील प्रक्रिया में शून्य कोटा दिख रहा है, तो यह केवल तकनीकी गलती भर नहीं लगती।
क्या विभागीय स्तर पर सही जांच नहीं हुई?
क्या विज्ञापन जारी करने से पहले आरक्षण रोस्टर की समीक्षा नहीं की गई? जब इतने वरिष्ठ अफसर विभाग में मौजूद हैं, तो ऐसी चूक कैसे संभव है?
विवाद क्यों बढ़ रहा है?
आरक्षण केवल आंकड़ा नहीं, संवैधानिक अधिकार है। यदि 728 पदों में SC के लिए एक भी सीट नहीं दिखाई गई, तो यह सामाजिक न्याय के सिद्धांत पर सीधा प्रश्न है। यही कारण है कि मामला अब प्रशासनिक गलती से आगे बढ़कर नीतिगत सवाल बन गया है।
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अब आगे क्या?
वन विभाग ने संकेत दिए हैं कि गणना की पुनः जांच होगी। यदि त्रुटि पाई जाती है, तो संशोधित विज्ञापन जारी किया जा सकता है। लेकिन तब तक यह सवाल बना रहेगा क्या यह साधारण चूक थी या सिस्टम की गंभीर लापरवाही?
निष्कर्ष: भरोसे की बहाली जरूरी
एक ओर विभाग सुधार का आश्वासन दे रहा है, तो दूसरी ओर आरक्षण के मुद्दे पर पारदर्शिता की मांग तेज हो रही है। अब नजर इस पर है कि वन विभाग नियमों के अनुसार संशोधन करता है या विवाद और गहराता है। क्योंकि बात सिर्फ 728 पदों की नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकारों और प्रशासनिक जवाबदेही की है।
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