पुलिस होती कौन है हमें रोकने वाली? AISF कार्यकर्ता श्रावणी का बड़ा आरोप, इटारसी हिरासत से हाईकोर्ट तक की पूरी कहानी

Neel Tiwari | Oct 13, 2026, 21:02 IST
​AISF कार्यकर्ता की हिरासत पर विवाद ​
दिल्ली में प्रदर्शन के लिए जा रहीं AISF कार्यकर्ता श्रावणी बुवा ने इटारसी में हिरासत, मारपीट और मेडिकल सुविधा नहीं मिलने के गंभीर आरोप लगाए हैं। हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का निपटारा हो चुका है। श्रावणी ने द सूत्र से बातचीत में पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं।
AISF activist Shravani Buva alleges wrongful detention, assault, and denial of medical care by police in Itarsi while traveling to Delhi for a protest.

इटारसी में हिरासत से हाईकोर्ट तक पहुंचा मामला

दिल्ली प्रदर्शन जा रहीं महिला कार्यकर्ताओं की इटारसी में हिरासत का मामला हाईकोर्ट पहुंचा। AISF कार्यकर्ता (AISF Activist) श्रावणी बुवा और प्रीति प्रशांत लोधे की ओर से बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाएं दायर की गई थीं। इनमें दोनों महिलाओं को कोर्ट के सामने पेश कराने की मांग की गई थी।



मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस अल्पेश यशवंत कोगजे और जस्टिस विवेक जैन की डिविजन बेंच में हुई। याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता शुभम मिश्रा ने पक्ष रखा।



सरकार ने चुना महिलाओं को घर पहुंचाने का विकल्प

सुनवाई के दौरान महिलाओं को घर पहुंचाने या कोर्ट में पेश करने के विकल्प पर सरकार ने उन्हें घर छोड़ने का विकल्प चुना। सरकार की ओर से कोर्ट को इसकी जानकारी दी गई। श्रावणी ने द सूत्र को बताया कि पुलिस ने उन्हें नोटिस दिया और घर पहुंचा दिया, जबकि वह जबलपुर हाईकोर्ट में पेश होना चाहती थीं।



पुणे से जबलपुर आने में करीब 16 हजार रुपए खर्च होने की बात कहते हुए उन्होंने बताया कि आर्थिक परेशानी के कारण वह वहां नहीं पहुंच सकीं।



वह वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए सुनवाई से जुड़ी थीं, लेकिन वकीलों के निर्देश पर उन्होंने खुद कोर्ट के सामने अपना पक्ष नहीं रखा। उनकी ओर से अधिवक्ता शुभम मिश्रा ने पुलिस के व्यवहार से जुड़े तथ्यों को कोर्ट के सामने रखा।



हाईकोर्ट ने याचिका का निपटारा किया, आगे की कार्रवाई की स्वतंत्रता

हाईकोर्ट ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का निपटारा कर दिया। याचिकाकर्ताओं को अन्य मांगों या आगे की कानूनी कार्रवाई के लिए अलग याचिका दायर करने की स्वतंत्रता भी दी गई। बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के जरिए अदालत से हिरासत की कानूनी वैधता जांचने की मांग होती है।



इस मामले में याचिकाकर्ताओं की ओर से पुलिस के कथित व्यवहार की जानकारी रखी गई। कार्यकर्ता हिरासत में कथित दुर्व्यवहार, चोट और इलाज संबंधी शिकायतों पर कानूनी कार्रवाई कर सकती हैं।



हालांकि कानूनी जानकार इस सुनवाई पर अपनी चिंता जाता रहे है। उनके अनुसार बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका कामाख्या जी यही होता है कि अवैध रूप से हिरासत में लिए गए व्यक्ति को कोर्ट के सामने पेश किया जाए। लेकिन यहां पर वीडियो कॉन्फ्रेंस से जुड़ी कार्यकर्ताओं से भी कोर्ट ने कोई पुष्टि नहीं की और उनका पक्ष नहीं लिया।



पुलिस होती कौन है तय करने वाली कि हमें कहां जाना है?

मामले के निपटारे के बाद AISF कार्यकर्ता श्रावणी बुवा (AISF Activist Shravani Buva) ने द सूत्र के साथ एक्सक्लूसिव बयान साझा किया। उन्होंने कहा कि वह और उनके साथी दिल्ली में प्रदर्शन में शामिल होने जा रहे थे, लेकिन उन्हें रास्ते में रोक दिया गया।



श्रावणी ने सवाल उठाया कि यदि उनके खिलाफ कोई आरोप या सबूत नहीं था, तो उन्हें यात्रा करने से क्यों रोका गया? उन्होंने कहा- आप होते कौन हैं हमें रोकने वाले कि हम कहां जाएं? श्रावणी के मुताबिक, उनका प्रदर्शन लोकतंत्र और संविधान की रक्षा के लिए था। उन्होंने पुलिस की कार्रवाई को लेकर नाराजगी जताई और हिरासत के दौरान हुए व्यवहार पर सवाल उठाए।



ट्रेन के लेडीज कोच से घसीटकर बाहर निकाला

श्रावणी के अनुसार, 8 अक्टूबर को शाम करीब 6:30 बजे इटारसी रेलवे स्टेशन पर पुलिसकर्मी उन्हें ट्रेन के महिला कोच से बाहर ले आए। उन्होंने आरोप लगाया कि उनके साथ यात्रा कर रहे करीब 20 से 25 लोगों में से 14 लोगों को ट्रेन से उतारा गया, जिनमें पांच महिलाएं थीं।



श्रावणी का दावा है कि उन्हें वैन और बस से एक बैंक्वेट हॉल में ले जाया गया। शुरुआत में उन्हें यह जानकारी नहीं थी कि वह जगह कहां है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उनके फोन काफी देर तक उनके पास नहीं रहने दिए गए, जिससे वह अपने परिवार को अपनी स्थिति नहीं बता सकीं।



उनके मुताबिक, वे सोशल मीडिया पर लाइव आकर कार्रवाई की जानकारी साझा कर रहे थे।



मारपीट, कपड़े फाड़ने और मेडिकल सुविधा नहीं देने के आरोप

श्रावणी ने पुलिस पर मारपीट करने, कपड़े फाड़ने और मेडिकल सहायता नहीं देने के गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि हिरासत के दौरान उन्हें शरीर पर चोटें आईं और सिर में तेज दर्द हुआ, लेकिन मेडिकल परीक्षण या इलाज की व्यवस्था नहीं की गई।



उन्होंने पानी और जरूरी सुविधाएं नहीं मिलने तथा सामान कई घंटों तक वापस नहीं किए जाने का भी दावा किया। ये आरोप श्रावणी के बयान पर आधारित हैं। पुलिस का पक्ष और इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी सामने नहीं आई है।



प्रीति के पैर में लिगामेंट टियर, बाद में चला पता

श्रावणी ने अपनी साथी प्रीति प्रशांत लोधे की चोट को लेकर भी चिंता जताई। उनके मुताबिक, प्रीति के पैर में लिगामेंट टियर हुआ है, जिसकी जानकारी उन्हें पुणे लौटने के बाद मिली। श्रावणी का आरोप है कि हिरासत के दौरान प्रीति को भी समुचित चिकित्सा सुविधा नहीं मिली।



उन्होंने बताया कि परिवार को उनकी स्थिति की जानकारी नहीं मिल पा रही थी, इसलिए उनके भाई ने हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की। श्रावणी के अनुसार, हिरासत के दौरान वे यह भी नहीं जानती थीं कि उन्हें कहां रखा गया है।



पुलिस पर भरोसा नहीं था, जबलपुर में पेश होना चाहती थी

श्रावणी ने बताया कि हाईकोर्ट के आदेश के बाद पुलिस ने उनसे कहा कि उन्हें घर पहुंचाया जा सकता है या कोर्ट में पेश किया जा सकता है। उन्होंने जबलपुर हाईकोर्ट में पेश होने की इच्छा जताई, क्योंकि उन्हें पुलिस पर भरोसा नहीं था कि वह उन्हें सुरक्षित पुणे पहुंचाएगी।



लेकिन उनके मुताबिक, पुलिस ने उनकी मांग स्वीकार नहीं की और उन्हें घर छोड़ने का विकल्प चुना। श्रावणी ने यह भी आरोप लगाया कि कई लोगों को एक छोटी ट्रैवलर में बैठाकर ले जाया गया और रास्ते में खाने की व्यवस्था भी उन्हें खुद करनी पड़ी। इन आरोपों पर पुलिस का आधिकारिक पक्ष सामने आना बाकी है।



अब आगे की कानूनी कार्रवाई पर नजर

इस मामले में अब मुख्य सवाल दिल्ली जा रहे कार्यकर्ताओं को रोके जाने के आधार और हिरासत के दौरान उनके साथ हुए कथित व्यवहार को लेकर हैं। हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का निपटारा हो चुका है और याचिकाकर्ताओं को आगे की कानूनी कार्रवाई के लिए स्वतंत्रता दी गई है।



श्रावणी ने द सूत्र से बातचीत में पुलिस की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनके आरोपों की जांच, संबंधित मेडिकल दस्तावेजों और पुलिस के पक्ष से घटना के सभी पहलुओं की स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।



FAQs:

  1. इटारसी में हिरासत में लिए गए महिला कार्यकर्ताओं के मामले में क्या हुआ?
    इटारसी में दिल्ली जा रही महिला कार्यकर्ताओं श्रावणी बुवा और प्रीति प्रशांत लोधे को हिरासत में लिया गया था। उनकी ओर से हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की गई, जिसमें उनके कोर्ट में पेश करने की मांग की गई थी।
  2. सरकार ने कोर्ट में महिलाओं को घर जाने का विकल्प क्यों चुना?
    सरकार ने कोर्ट में बताया कि उन्होंने महिलाएं को घर पहुंचाने का विकल्प चुना, जबकि याचिकाकर्ताओं ने जबलपुर हाईकोर्ट में पेश होने की इच्छा जताई थी। साथ ही, आर्थिक कठिनाई के कारण श्रावणी इन्टर्नेट के माध्यम से कोर्ट की सुनवाई में शामिल हुईं।
  3. महिला कार्यकर्ताओं के खिलाफ पुलिस की कार्रवाई पर क्या आरोप हैं?
    महिला कार्यकर्ताओं ने पुलिस पर मारपीट, कपड़े फाड़ने, चिकित्सा सहायता न देने और हिरासत के दौरान दुर्व्यवहार करने के गंभीर आरोप लगाए हैं। श्रावणी ने कहा कि प्रीति के पैर में लिगामेंट टियर हुआ है और उन्हें चिकित्सा सुविधा नहीं दी गई।
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