मिडिल ईस्ट जंग की चपेट में मरीज, 50% तक बढ़ सकते हैं कैंसर दवाओं के दाम

Aman Vaishnav | Jun 17, 2026, 14:01 IST
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कैंसर दवाओं के दाम
कैंसर दवाओं के दाम

अमेरिका-ईरान संघर्ष के कारण देश में कैंसर के इलाज के लिए जरूरी तीन प्रमुख दवाओं की भारी कमी हो गई है। कच्चे माल की किल्लत से उत्पादन बंद है और आने वाले दिनों में कीमतें 50% तक बढ़ सकती हैं।

समझें क्या है पूरा मामला

  • अमेरिका-ईरान युद्ध का असर अब देश के कैंसर मरीजों तक पहुंच गया है।
  • कीमोथेरेपी में काम आने वाली तीन अहम दवाएं बनना बंद हो गई हैं।
  • कच्चे माल की भारी कमी इसकी वजह है।
  • जानकारी के अनुसार मध्य प्रदेश में सिर्फ सात से आठ दिन का स्टॉक बचा है।
  • इससे लाखों कैंसर मरीजों का इलाज खतरे में आ गया है।

दवाओं का उत्पादन क्यों रुका

कैंसर के इलाज की रीढ़ मानी जाने वाली तीन दवाएं सिस्प्लैटिन, कार्बोप्लेटिन और ऑक्सालिप्लाटिन हैं। इन दवाओं को बनाने के लिए जरूरी कच्चा माल अब बाजार में नहीं मिल रहा है। इस कच्चे माल को एपीआई कहा जाता है। इसकी सप्लाई जरूरत के मुकाबले सिर्फ 25 फीसदी रह गई है।

वहीं जानकारों के आनुसार देश भर में अभी सिर्फ एक जर्मन कंपनी के पास इन दवाओं का स्टॉक बचा है। स्टॉकिस्ट के गोदामों में भी अब बहुत कम मात्रा है। यह संकट किसी एक शहर तक सीमित नहीं है। पूरे देश के कैंसर मरीज इससे प्रभावित हो सकते हैं।

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मध्य प्रदेश पर कितना असर

जानकारी के अनुसार मध्य प्रदेश में अभी एक लाख 60 हजार कैंसर मरीज हैं। इनमें से लगभग 70 फीसदी मरीजों को कीमोथेरेपी की जरूरत पड़ती है। इस बड़ी आबादी का इलाज इन्हीं तीन दवाओं पर टिका है। वहीं यदि सप्लाई पूरी तरह रुक जाती है तो हजारों मरीजों का इलाज बीच में अटक सकता है।

गांधी मेडिकल कॉलेज के पूर्व प्रोफेसर डॉ. ओपी सिंह बताते हैं कि, ज्यादातर कीमोथेरेपी प्रक्रियाओं में सिस्प्लैटिन किसी न किसी रूप में शामिल होती है। यानी इस एक दवा की कमी से इलाज की पूरी प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।

मध्यप्रदेश फार्मासिस्ट एसोसिएशन के मीडिया प्रभारी राजवीर त्यागी के अनुसार अभी सिर्फ सात से आठ दिन का स्टॉक बचा है। इसके बाद ये दवाएं मार्केट से पूरी तरह गायब हो सकती हैं। उनका कहना है कि सरकार को उत्पादन बढ़ाने के लिए तुरंत कदम उठाना चाहिए।

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तीन दशक से भरोसे की दवा

सिस्प्लैटिन और कार्बोप्लेटिन को पिछले 30 साल से कैंसर इलाज की सबसे भरोसेमंद दवाओं में गिना जाता रहा है। टेस्टिकुलर कैंसर में तो इन दवाओं की मदद से 90 फीसदी से ज्यादा मरीज पूरी तरह ठीक हो जाते हैं।

इसी वजह से डॉक्टर इन्हें कैंसर उपचार की पेनिसिलिन भी कहते हैं। इतने भरोसेमंद इलाज का अचानक रुक जाना मरीजों और डॉक्टरों दोनों के लिए चिंता का विषय बन गया है।

इलाज होगा और महंगा

इस संकट के बीच एक और बड़ी समस्या सामने आई है। ये दवाएं अब तक यूनिफॉर्म ड्रग कोड के तहत नियंत्रित दामों पर मिलती थीं। हाल ही में इन्हें इस सूची से बाहर कर दिया गया है। इस पर ऊंचे स्तर पर चर्चा भी हो चुकी है।

माना जा रहा है कि अगले दो से तीन महीने में इनके दाम 50 फीसदी तक बढ़ सकते हैं। इससे गरीब मरीजों के लिए यह कैंसर का इलाजपहुंच से बाहर हो सकता है।

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किल्लत के पीछे की बड़ी वजहें

इस पूरे संकट के पीछे कई कारण हैं। युद्ध की वजह से कच्चे माल की वैश्विक सप्लाई बाधित हुई है। प्लेटिनम जैसे जरूरी कच्चे माल की कीमत भी काफी बढ़ी है। सेमीकंडक्टर और एआई डेटा सेंटर उद्योगों में मांग बढ़ने से प्लेटिनम महंगा हुआ है।

दवा बनाने में लगने वाले कच्चे माल की लागत 200 से 300 फीसदी तक बढ़ गई है। इससे दवा निर्माण काफी महंगा हो गया है। दूसरी ओर, राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA – National Pharmaceutical Pricing Authority) ने इन दवाओं की कीमतें तय कर रखी हैं।

कंपनियां बढ़ी हुई लागत का बोझ उठा नहीं पा रही हैं। नतीजा यह हुआ कि कई कंपनियों ने उत्पादन घटा दिया है या पूरी तरह बंद कर दिया है।

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डॉक्टर्स कि क्या राय...

एम्स के ऑन्कोसर्जन डॉ. विनय कुमार के मुताबिक, जिन कीमोथेरेपी दवाओं की कमी चल रही है, उनकी जगह दूसरी दवाएं तो दी जा रही हैं, लेकिन उनका असर उतना अच्छा नहीं माना जाता है।

देश में कैंसर के ज्यादातर मरीजों का इलाज इन्हीं दवाओं पर निर्भर है। फेफड़े, स्तन, ओवरी, मुंह, सर्वाइकल, सिर-गर्दन, बड़ी आंत और अंडकोष के कैंसर में इनका नियमित इस्तेमाल होता है।

डॉक्टरों का कहना है कि कुछ विकल्प मौजूद हैं लेकिन वे पूरी तरह इन दवाओं की बराबरी नहीं कर पाते हैं। वहीं, अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्लेटिनम की कीमत लगभग आठ हजार रुपए प्रति ग्राम तक पहुंच गई है।

उत्पादन लागत बढ़ने के कारण कई कंपनियों ने इन दवाओं का निर्माण कम कर दिया है या बंद कर दिया है।

FAQ

  1. कैंसर की कौन सी दवाएं कम हो रही हैं?
    सिस्प्लैटिन, कार्बोप्लेटिन और ऑक्सालिप्लाटिन की कमी हो रही है। ये तीनों दवाएं कीमोथेरेपी में इस्तेमाल होती हैं। इनकी सप्लाई जरूरत के मुकाबले सिर्फ 25 फीसदी रह गई है।
  2. कैंसर की दवाओं की किल्लत क्यों हो रही है?
    अमेरिका-ईरान युद्ध से कच्चे माल की सप्लाई बाधित हुई है। प्लेटिनम जैसी जरूरी सामग्री की कीमत भी बहुत बढ़ गई है। इससे दवा बनाना मुश्किल और महंगा हो गया है।
  3. क्या कैंसर की दवाओं के दाम बढ़ेंगे?
    हां, इन्हें यूनिफॉर्म ड्रग कोड की सूची से बाहर किया गया है। अगले दो से तीन महीने में दाम 50 फीसदी तक बढ़ सकते हैं। इससे गरीब मरीजों के लिए इलाज मुश्किल हो सकता है।

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