Gandhi Jayanti: जब पहली बार भोपाल नवाबी रियासत के शाही मेहमान बने थे बापू, नवाब खान ने रेशमी कपड़े छोड़ पहनी थी खादी
Kaushiki | Sootr Creatives | Oct 02, 2026, 12:01 IST
महात्मा गांधी के भोपाल आने की कहानी
Gandhi Jayanti: महात्मा गांधी की भोपाल यात्रा का इतिहास बहुत खास रहा है। साल 1929 में बापू नवाब के बुलावे पर भोपाल आए थे। उन्होंने यहां खादी भंडार का निरीक्षण किया था। साथ ही सर्वधर्म प्रार्थना सभा में हिस्सा लिया। आइए गांधी जयंती पर बापू के भोपाल से जुड़ी रोचक और दिलचस्प कहानी के बारे में जानें।
आज दो अक्टूबर का दिन आते ही महात्मा गांधी से जुड़ी कई ऐतिहासिक यादें ताजा हो जाती हैं। ऐसी ही एक बेहद दिलचस्प और कम जानी-मानी कहानी मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से जुड़ी है। बात साल 1929 की है, जब भोपाल रियासत के नवाब हमीदुल्ला खान के खास बुलावे पर बापू यहां पहुंचे थे। बापू यहां 8 सितंबर से 10 सितंबर तक रुके थे।
तीन दिनों के इस खास प्रवास में बापू ने न सिर्फ अहमदाबाद पैलेस की राहत मंजिल में सर्वधर्म प्रार्थना सभा की। बल्कि मारवाड़ी रोड स्थित खादी भंडार का बारीक निरीक्षण भी किया था।
बापू के इस दौरे ने भोपाल में आजादी के आंदोलन और स्वदेशी की भावना को एक नया जोश और नई दिशा दी। आइए, आज गांधी जयंती के मौके पर जानें बापू की इस ऐतिहासिक भोपाल यात्रा का पूरा किस्सा।
महात्मा गांधी की भोपाल यात्रा बहुत ज्यादा खास रही थी। डॉक्टर एमए अंसारी ने इसके लिए बड़े प्रयास किए थे। नवाब हमीदुल्ला खान ने बापू को भोपाल आने का न्योता दिया। बापू 8 से 10 सितंबर 1929 तक भोपाल में रहे। उनके साथ मीरा बेन और महादेव देसाई भी भोपाल आए।
नवाब से बातचीत के लिए जमनालाल बजाज को भी बुलाया गया। डॉक्टर जाकिर हुसैन भी इस बातचीत के लिए भोपाल पहुंचे थे। भोपाल के कई स्थानीय नेता बापू के करीबी संपर्क में थे।
इनमें डॉक्टर अंसारी, अब्दुल रहमान और मोहम्मद हयात शामिल थे। शोएब कुरैशी भी बापू के बेहद करीबी साथियों में से थे। नवाब और बापू के बीच बहुत घनिष्ठ और अच्छे संबंध थे।
शोएब कुरैशी असल में मोहम्मद अली के दामाद भी थे। इस यात्रा ने भोपाल के लोगों में नया जोश भर दिया। आजादी के आंदोलन को भोपाल में नई दिशा मिली थी। लोग बापू के विचारों से बहुत ज्यादा प्रभावित हुए थे।
बापू का ठहराव अहमदाबाद पैलेस स्थित राहत मंजिल में हुआ। नौ सितंबर को राहत मंजिल के प्रांगण में प्रार्थना हुई। यह एक खास सर्वधर्म प्रार्थना सभा रखी गई थी। प्रार्थना में नवाब परिवार के सभी लोग शामिल हुए थे।
रियासत के बड़े अधिकारी और आम लोग भी वहां आए थे। सभा में गीता, कुरान, गुरुवाणी और बाइबिल पढ़ी गई। कवि माखनलाल चतुर्वेदी ने इस घटना का जिक्र किया था। उन्होंने अपने पत्र कर्मवीर में इस बारे में लिखा था।
माखनलाल जी ने लिखा कि भोपाल नवाब प्रार्थना में घुटने टेककर बैठे थे। बापू खुद पूरी तरह ध्यानमग्न होकर प्रार्थना सुन रहे थे। यह दृश्य सांप्रदायिक सौहार्द की बहुत बड़ी मिसाल बना।
इसने समाज में आपसी भाईचारे का बड़ा संदेश दिया। प्रार्थना सभा के बाद लोग बापू से मिलने पहुंचे। बापू ने सभी लोगों से बहुत प्यार से बात की। हर कोई बापू की सादगी देखकर बहुत ज्यादा प्रभावित था।
प्रार्थना सभा के बाद बापू मारवाड़ी रोड पहुंचे थे। वहां उन्होंने खादी भंडार का बारीक निरीक्षण किया था। उन्होंने खादी के काम को बढ़ावा देने की सलाह दी। यहां 10 सितंबर को बेनजीर पैलेस मैदान में जनसभा हुई।
इस विशाल जनसभा में हजारों की संख्या में लोग आए। सभा मंच और रास्ते खादी से सजाए गए थे। बापू ने अपने भाषण में रामराज्य की कांसेप्ट समझाई। उन्होंने हिंदू-मुस्लिम एकता पर बहुत जोर दिया था।
छुआछूत मिटाने के लिए उन्होंने कड़ा संदेश दिया था। उन्होंने सभी से स्वदेशी और खादी अपनाने की अपील की। लोगों ने बापू की बातों को ध्यान से सुना। खादी भंडार के काम की बापू ने काफी तारीफ की।
इससे स्थानीय खादी कारीगरों का हौसला बहुत बढ़ गया। शहर में खादी पहनने का चलन तेजी से बढ़ा। बापू का यह संदेश पूरे भोपाल में फैल गया।
इसके बाद भोपाल से लौटते समय बापू का नागरिक अभिनंदन हुआ। गुजराती मोड वणिक समाज की बगिया में कार्यक्रम हुआ। समाज के लोगों ने बापू का बहुत भव्य स्वागत किया।
हरिजन फंड के लिए बापू को 501 रुपए दिए गए। यह राशि उस दौर में बहुत बड़ी मानी जाती थी। भोपाल से आगरा लौटते समय बापू सांची भी गए। इसके बाद 10 सितंबर साल 1929 को उन्होंने सांची स्तूप देखा था।
विश्व प्रसिद्ध बौद्ध स्तूप देखकर बापू बहुत खुश हुए। इसके बाद साल 1933 में बापू फिर भोपाल आए थे। हरिजन यात्रा के दौरान वे ट्रेन बदलने स्टेशन रुके थे। भोपाल रेलवे स्टेशन पर हजारों की भीड़ जमा हो गई।
बापू ने स्टेशन पर 15 मिनट का भाषण दिया। उन्होंने आंदोलनकारियों को संबोधित कर जोश भरा था। इसी दौरान एक छोटी बच्ची बापू के पास आई। उस बच्ची ने अपनी सोने की अंगूठी दान दे दी।
भोपाल में बापू से जुड़े कई मेन साइट मौजूद हैं। पहला स्थल राहत मंजिल है जहां बापू ठहरे थे। ये साल 1929 में बापू का विश्राम स्थल बना था। अब इसे नवाब परिवार ने ढा दिया है।
दूसरा मेन साइट बेनजीर पैलेस का मैदान है। यहां 10 सितंबर 1929 को ऐतिहासिक जनसभा हुई थी। आज यह स्थल काफी उपेक्षित स्थिति में पड़ा हुआ है।
तीसरा स्थल मोड की बगिया माना जाता है। यहां 1993 में एक स्मारक पट्टिका लगाई गई थी। अब वह पट्टिका भी वहां से गायब हो चुकी है।
चौथा स्थान भोपाल रेलवे स्टेशन का परिसर है। साल 1933 में बापू ने यहां छोटा प्रवास किया था। उन्होंने यहां लोगों को संबोधित भी किया था। लेकिन यहां भी कोई स्मारक चिह्न मौजूद नहीं है।
तो Gandhi Jayanti पर ये निशानियां सिर्फ मेमोरी की याद नहीं दिलाती। इन धरोहरों को सहेजने की सख्त जरूरत नजर आती है। इसमें सर्वधर्म प्रार्थना, हिंदू-मुस्लिम एकता और छुआछूत खत्म करने जैसे मूल्य दिखते हैं। ये मूल्य संविधान की भावना से भी जुड़ते हैं।
तीन दिनों के इस खास प्रवास में बापू ने न सिर्फ अहमदाबाद पैलेस की राहत मंजिल में सर्वधर्म प्रार्थना सभा की। बल्कि मारवाड़ी रोड स्थित खादी भंडार का बारीक निरीक्षण भी किया था।
बापू के इस दौरे ने भोपाल में आजादी के आंदोलन और स्वदेशी की भावना को एक नया जोश और नई दिशा दी। आइए, आज गांधी जयंती के मौके पर जानें बापू की इस ऐतिहासिक भोपाल यात्रा का पूरा किस्सा।
भोपाल कब आए थे महात्मा गांधी
नवाब से बातचीत के लिए जमनालाल बजाज को भी बुलाया गया। डॉक्टर जाकिर हुसैन भी इस बातचीत के लिए भोपाल पहुंचे थे। भोपाल के कई स्थानीय नेता बापू के करीबी संपर्क में थे।
इनमें डॉक्टर अंसारी, अब्दुल रहमान और मोहम्मद हयात शामिल थे। शोएब कुरैशी भी बापू के बेहद करीबी साथियों में से थे। नवाब और बापू के बीच बहुत घनिष्ठ और अच्छे संबंध थे।
शोएब कुरैशी असल में मोहम्मद अली के दामाद भी थे। इस यात्रा ने भोपाल के लोगों में नया जोश भर दिया। आजादी के आंदोलन को भोपाल में नई दिशा मिली थी। लोग बापू के विचारों से बहुत ज्यादा प्रभावित हुए थे।
राहत मंजिल में सर्वधर्म प्रार्थना
रियासत के बड़े अधिकारी और आम लोग भी वहां आए थे। सभा में गीता, कुरान, गुरुवाणी और बाइबिल पढ़ी गई। कवि माखनलाल चतुर्वेदी ने इस घटना का जिक्र किया था। उन्होंने अपने पत्र कर्मवीर में इस बारे में लिखा था।
माखनलाल जी ने लिखा कि भोपाल नवाब प्रार्थना में घुटने टेककर बैठे थे। बापू खुद पूरी तरह ध्यानमग्न होकर प्रार्थना सुन रहे थे। यह दृश्य सांप्रदायिक सौहार्द की बहुत बड़ी मिसाल बना।
इसने समाज में आपसी भाईचारे का बड़ा संदेश दिया। प्रार्थना सभा के बाद लोग बापू से मिलने पहुंचे। बापू ने सभी लोगों से बहुत प्यार से बात की। हर कोई बापू की सादगी देखकर बहुत ज्यादा प्रभावित था।
खादी भंडार का दौरा और संदेश
इस विशाल जनसभा में हजारों की संख्या में लोग आए। सभा मंच और रास्ते खादी से सजाए गए थे। बापू ने अपने भाषण में रामराज्य की कांसेप्ट समझाई। उन्होंने हिंदू-मुस्लिम एकता पर बहुत जोर दिया था।
छुआछूत मिटाने के लिए उन्होंने कड़ा संदेश दिया था। उन्होंने सभी से स्वदेशी और खादी अपनाने की अपील की। लोगों ने बापू की बातों को ध्यान से सुना। खादी भंडार के काम की बापू ने काफी तारीफ की।
इससे स्थानीय खादी कारीगरों का हौसला बहुत बढ़ गया। शहर में खादी पहनने का चलन तेजी से बढ़ा। बापू का यह संदेश पूरे भोपाल में फैल गया।
सांची स्तूप भी पहुंचे थे बापू
हरिजन फंड के लिए बापू को 501 रुपए दिए गए। यह राशि उस दौर में बहुत बड़ी मानी जाती थी। भोपाल से आगरा लौटते समय बापू सांची भी गए। इसके बाद 10 सितंबर साल 1929 को उन्होंने सांची स्तूप देखा था।
विश्व प्रसिद्ध बौद्ध स्तूप देखकर बापू बहुत खुश हुए। इसके बाद साल 1933 में बापू फिर भोपाल आए थे। हरिजन यात्रा के दौरान वे ट्रेन बदलने स्टेशन रुके थे। भोपाल रेलवे स्टेशन पर हजारों की भीड़ जमा हो गई।
बापू ने स्टेशन पर 15 मिनट का भाषण दिया। उन्होंने आंदोलनकारियों को संबोधित कर जोश भरा था। इसी दौरान एक छोटी बच्ची बापू के पास आई। उस बच्ची ने अपनी सोने की अंगूठी दान दे दी।
आज किस हाल में है ये निशानियां
दूसरा मेन साइट बेनजीर पैलेस का मैदान है। यहां 10 सितंबर 1929 को ऐतिहासिक जनसभा हुई थी। आज यह स्थल काफी उपेक्षित स्थिति में पड़ा हुआ है।
तीसरा स्थल मोड की बगिया माना जाता है। यहां 1993 में एक स्मारक पट्टिका लगाई गई थी। अब वह पट्टिका भी वहां से गायब हो चुकी है।
चौथा स्थान भोपाल रेलवे स्टेशन का परिसर है। साल 1933 में बापू ने यहां छोटा प्रवास किया था। उन्होंने यहां लोगों को संबोधित भी किया था। लेकिन यहां भी कोई स्मारक चिह्न मौजूद नहीं है।
तो Gandhi Jayanti पर ये निशानियां सिर्फ मेमोरी की याद नहीं दिलाती। इन धरोहरों को सहेजने की सख्त जरूरत नजर आती है। इसमें सर्वधर्म प्रार्थना, हिंदू-मुस्लिम एकता और छुआछूत खत्म करने जैसे मूल्य दिखते हैं। ये मूल्य संविधान की भावना से भी जुड़ते हैं।
- महात्मा गांधी की भोपाल यात्रा का महत्व क्या था?
महात्मा गांधी की भोपाल यात्रा का महत्व इस बात में निहित है कि इसने 1929 में स्थानीय आजादी के आंदोलन को नया जोश और दिशा दी। बापू के विचारों ने भोपाल के लोगों में स्वदेशी भावना को प्रोत्साहित किया और सांप्रदायिक सौहार्द का संदेश फैलाया। - भोपाल में महात्मा गांधी ने किन स्थानों का दौरा किया था?
महात्मा गांधी ने भोपाल में राहत मंजिल, खादी भंडार और बेनजीर पैलेस के मैदान का दौरा किया था। इसके अलावा, उन्होंने सांची स्तूप को भी देखा। - महात्मा गांधी की भोपाल यात्रा के दौरान क्या खास घटनाएं हुईं?
महात्मा गांधी की भोपाल यात्रा के दौरान 9 सितंबर 1929 को राहत मंजिल में सर्वधर्म प्रार्थना सभा आयोजित की गई थी, जिसमें नवाब परिवार और आम लोग शामिल हुए। बापू ने खादी भंडार का निरीक्षण किया और 10 सितंबर को बेनजीर पैलेस में एक विशाल जनसभा को संबोधित किया।
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