भागीरथपुरा कांड की 112 पन्नों की रिपोर्ट- आईएएस शिवम, दिलीप यादव, प्रतिभा पाल को क्लीन चिट, रोहित सिसोनिया, भव्या मित्तल के साथ संजीव श्रीवास्तव घिरे
Sanjay Gupta | Sept 30, 2026, 15:18 IST
भागीरथपुरा की जांच रिपोर्ट में क्या?
Indore. भागीरथपुरा में दूषित पानी के कारण हुई 35 मौतों को लेकर जांच रिपोर्ट सामने आ गई है। हाईकोर्ट के रिटायर जस्टिस सुशील गुप्ता ने 600 पन्नों की रिपोर्ट 18 अगस्त को सौंपी थी। बाद में इसे सार्वजनिक करने पर रोक लगगई, जिसे हाल ही में वेबसाइट पर अपलोड करने के आदेश हुए। इसके बाद 112 पन्नों की रिपोर्ट सामने आ गई है; यह द सूत्र के पास मौजूद है।
बाकी 400 पन्नों में साक्ष्य व अन्य दस्तावेज संलग्नहैं। इसमें मुख्य रूप से सरकारी सिस्टम, प्रशासनिक लापरवाही और फील्ड के इंजीनियरवतकनीकी स्टाफ की जिम्मेदारी मानी गई है।
इस रिपोर्ट में तत्कालीन निगमायुक्त व वर्तमान इंदौर कलेक्टर शिवम वर्मा, तत्कालीन निगमायुक्त व वर्तमान में एमडी पर्यटन दिलीप यादव, तत्कालीन निगमायुक्त व वर्तमान सागर कलेक्टर प्रतिभा पाल को क्लीन चिट दी गई है। साफ तौर पर कहा गया है कि प्रशासनिक तौर पर निगम में पानी के काम की जिम्मेदारी एडिशनल कमिशनर स्तर पर होती है, ऐसे में जांच रिकॉर्ड में पाया गया है कि शिवम वर्मा, प्रतिभा पाल और दिलीप यादव स्तर पर कोई भी देरी नहीं हुई है। इनके द्वारा प्रशासनिक तत्परता से काम किया गया है। इसी के साथ तत्कालीन एडिशनल कमिशनर अभिलाष मिश्रा, सिद्धार्थ जैन और अभिषेक गेहलोत को भी क्लीन चिट मिली है। इन सभी के समय में पानी की लाइन डालने के काम में कोई देरी नहीं देखी गई है।
लेकिन तत्कालीन एडिशनल कमिशनर भव्या मित्तल और रोहित सिसोनिया की ओर से दो टेंडर के काम में देरी बताई गई है। हालांकि सीधे तौर पर इनकी जिम्मेदारी नहीं बनती है क्योंकि फाइल को पुटअप करने में और प्रशासनिक काम में लापरवाही टेक्निकल और इंजीनियर फील्ड के अधिकारियों द्वारा की गई। जैसे कि भागीरथपुरा के टेंडर काम के लिए 15 अक्टूबर 2025 को ही रोहित सिसोनिया ने ईई संजीव श्रीवास्तव को लिखा कि इस मामले में चर्चा कीजिए। वहीं, यह चर्चा 26 दिसंबर को हुई, यानी 72 दिन की देरी से। संजीव श्रीवास्तव को इसमें देरी नहीं करना थी। हालांकि सुपरविजन की जिम्मेदारी सिसोनिया की थी, जो वह नहीं कर सके। वहीं भव्या मित्तल के समय में पहले टेंडर फाइल में खासी देरी की गई।
जांच रिपोर्ट में पाया गया कि संजीव श्रीवास्तव, एग्जीक्यूटिव इंजीनियर, साल 2013 से ही जल शाखा में पदस्थ हैं। हर टेंडर से लेकर मॉनिटरिंग काम में उनकी जिम्मेदारी थी। वहीं, वह इसमें खासे विफल रहे और पूरी तरह से जिम्मेदारी उनकी बनती है। हर टेंडर प्रक्रिया में देरी और वर्क ऑर्डर करने में देरी से लेकर पानी की लाइन देखने व मॉनिटरिंग, सभी में संजीव द्वारा लापरवाही बरती गई।
कमेटी ने सीधे तौर पर तत्कालीन निगमायुक्त आशीष सिंह व एडिशनल कमिशनर संदीप सोनी को जिम्मेदार नहीं माना। लेकिन यह कहा कि साल 2019 में प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड की जल दूषित होने की रिपोर्ट आई थी। इसके आधार पर तत्काल काम किए जाने की जरूरत थी, जो उस समय आगे बढ़कर नहीं किए गए।
महापौर पुष्यमित्र भार्गव और एमआईसी के सभी सदस्यों के फैसले तथा उनकी साइन को लेकर भी कमेटी ने लिखा है। हालांकि यह सामने आया कि साल 2022 में इनके कार्यकाल में ही पहली बार वहां वाटरलाइन डलने का काम शुरू हुआ। इसके लिए पहला टेंडर साल 2022 में इनके समय ही पास हुआ। लेकिन एमआईसी से पास होने के बाद महापौर के साइन में 66 दिन की देरी हुई।
हालांकि इसके लिए महापौर जिम्मेदार नहीं हैं, क्योंकि यह काम प्रशासनिक होता है कि फाइल पुटअप करके साइन कराए जाएं। वैसे भी पांच करोड़ तक के काम का जिम्मा एडिशनल कमिशनर स्तर पर होता है। इस पहले टेंडर के काम में आया कि ठेकेदार मालवा इंजीनियरिंग ने भी 600 दिन में यह काम किया और देरी की। इस तरह पूरे प्रोजेक्ट में 859 दिन की देरी हुई, जो बहुत ज्यादा है।
कमेटी ने जिम्मेदारी के लिए तीन स्तर बताए हैं। पहले स्तर पर फील्ड अधिकारी हैं, जिनमें असिस्टेंट इंजीनियर, सब इंजीनियर और साइट इंजीनियर हैं। दूसरे स्तर पर एग्जीक्यूटिव अथॉरिटी को जिम्मेदार बताया है, जिसमें एग्जीक्यूटिव इंजीनियर और एडिशनल कमिशनर निगम (जल कार्य) को जिम्मेदार कहा गया। वहीं तीसरे स्तर पर इंचार्ज (जल कार्य) एडिशनल कमिशनर को जिम्मेदार बताया है। निगमायुक्त स्तर पर जिम्मेदारी नहीं मानी गई है।
कमेटी ने पाया कि आईडीए और निगम के पास 1990 से 2000 के बीच हुए कामों का रिकॉर्ड ही नहीं है। उस समय एग्जीक्यूटिव इंजीनियर जेपी पाठक, असिस्टेंट इंजीनियर रमन महाजन, डिप्टी इंजीनियर यशवंत वर्मा, चीफ इंजीनियर आरपी गुप्ता और प्रोजेक्ट डायरेक्टर सीएम डगावकर थे। इसमें गुप्ता और डगावकर का निधन हो चुका है और बाकी रिटायर हो चुके हैं।
साल 2022 के टेंडर के समय पर भव्या मित्तल एडिशनल कमिशनर, संजीव श्रीवास्तव ईई, सरोज प्रजापति एई, विनोद बागरी सब इंजीनियर, शरद सोनी इंचार्ज टेक्निकल ऑफिसर, नीति चौरसिया टेंडर ब्रांच अधिकारी और प्रज्ञा तिवारी टेंडर क्लर्क थे। तत्कालीन एडिशनल कमिशनर अभिलाष मिश्रा के समय पर टेंडर प्रक्रिया में उनके स्तर पर कोई देरी नहीं हुई। लेकिन संजीव श्रीवास्तव के स्तर पर देरी की गई। उस समय टेंडर कमेटी में सुपरिटेंडेंट इंजीनियर श्रीकांत कांटे, एडिशनल कमिशनर फाइनेंस देवधर दरवाई और एडिशनल कमिशनर (टेंडर कमेटी) अभय राजनगांवकर थे। वहीं तीसरे टेंडर के समय पर एडिशनल कमिशनर रोहित सिसोनिया और ईई श्रीवास्तव थे। सरोज प्रजापति एई, सम्यक जैन सब इंजीनियर, रोहित राय इंचार्ज टेक्निकल ऑफिसर, श्वेता सिंह टेंडर सब इंजीनियर और प्रज्ञा तिवारी टेंडर क्लर्क पद पर थे।
कमेटी ने पाया कि पानी के सैंपल साल 2025 से ही खराब आ रहे थे। इसमें बैक्टीरिया पाया गया था। लगातार शिकायतें आ रही थीं। सेंपलों में बैक्टीरिया पाए गए हैं। वहीं सीवर लाइन में लीकेज पाया गया है, जो पानी से मिल रहा था। इसके चलते पानी दूषित हुआ।
कमेटी ने यह भी तथ्य पाया कि पानी की टंकी के पास बनी पुलिस चौकी के सेप्टिक टैंक से भी लगातार लीकेज था, जिसने पानी को दूषित किया। ऐसे में एक नहीं कई कारण थे। सीवर और पानी की लाइन में दूरी नहीं थी और बताया गया कि संकरी गली के कारण उन्हें पास-पास कर दिया गया। लाइन मेंटेन नहीं थी। वहीं कई जगह यह क्रॉस हो रही थी, लेकिन इसमें लीकेज का ध्यान नहीं रखा गया। इन सभी कारणों से पानी दूषित हुआ और इसके कारण यह कांड हो गया।
कमेटी ने वार्ड 11 भागीरथपुरा के पार्षद कमल वाघेला के साथ स्थानीय रहवासियों के बयान लिए। साथ ही तत्कालीन एडिशनल कमिशनर रोहित सिसोनिया, कमिशनर दिलीप यादव, महापौर पुष्यमित्र भार्गव, पूर्व कमिशनर प्रतिभा पाल, आशीष सिंह, शिवम वर्मा, पूर्व एडिशनल कमिशनर सिद्धार्थ जैन, संदीप सोनी, भव्या मित्तल, पूर्व कमिशनर हर्षिका सिंह, पूर्व एडिशनल कमिशनर वीरभद्र शर्मा, पूर्व एसई एनएस तोमर, पूर्व एसआई अशोक राठौर, पूर्व ईई दिलीप चौहान, पूर्व ईई विवेश जैन, ईई अश्विन जनपदे, ईई एएन भास्कर, एडिशनल कमिशनर आशीष पाठक, अभय राजनगांवकर, पूर्व एडिशनल कमिशनर अभिलाष मिश्रा व अभिषेक गेहलोत, रीजनल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड के सतीश कुमार, पूर्व कमिशनर मनीष सिंह, आईडीए सीईओ परीक्षित झाड़े, एमजीएम के डीन डॉ. अरविंद घनघोरिया, सीएमएचओ डॉ. माधव हसानी और कमिशनर क्षितिज सिंघल, इन सभी के बयान लिए।
इन IAS को क्लीन चिट मिली
इन IAS अधिकारियों के काम में देरी
संजीव श्रीवास्तव सबसे बड़े लापरवाह
आशीष सिंह और संदीप का नाम क्यों आया
महापौर और एमआईसी को लेकर यह लिखा
हालांकि इसके लिए महापौर जिम्मेदार नहीं हैं, क्योंकि यह काम प्रशासनिक होता है कि फाइल पुटअप करके साइन कराए जाएं। वैसे भी पांच करोड़ तक के काम का जिम्मा एडिशनल कमिशनर स्तर पर होता है। इस पहले टेंडर के काम में आया कि ठेकेदार मालवा इंजीनियरिंग ने भी 600 दिन में यह काम किया और देरी की। इस तरह पूरे प्रोजेक्ट में 859 दिन की देरी हुई, जो बहुत ज्यादा है।
टेंडर कमेटी और फील्ड अधिकारी की पहली जिम्मेदारी
पूर्व के कामों का रिकॉर्ड नहीं, यह थे उस समय
टेंडर की देरी के समय यह थे
साल 2025 से आ रहा था दूषित पानी
पुलिस चौकी से भी पानी दूषित
कमेटी ने इन सभी के लिए थे बयान
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