संजय पाठक की पार्टनरशिप फर्म को HC से झटका
भाजपा विधायक संजय पाठक की पार्टनरशिप फर्म पैसिफिक एक्सपोर्ट (Pacific Export) से जुड़े खनन मामले में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट से राहत नहीं मिली है। मामला जबलपुर जिले की सिहोरा तहसील के झींटी गांव में लौह अयस्क खदान से कथित अतिरिक्त खनन और करीब 81.73 करोड़ रुपए की वसूली से जुड़ा है। इस मामले में दायर याचिका जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की बेंच ने खारिज कर दी। फैसला 13 अक्टूबर को सुनाया गया था, जो शुक्रवार 16 अक्टूबर को अपलोड हुआ है। हालांकि, कोर्ट ने कंपनी पर इस रकम की अंतिम देनदारी तय नहीं की है। अब मामले में कलेक्टर को सुनवाई के बाद फैसला करना होगा।
क्या है 81.73 करोड़ रुपए की वसूली का पूरा मामला?
पैसिफिक एक्सपोर्ट के नाम से दायर याचिका में झींटी गांव के करीब 27.05 हेक्टेयर क्षेत्र में लौह अयस्क और लेटेराइट खनन से जुड़ी कार्रवाई को चुनौती दी गई थी। खनन पट्टा अगस्त 2010 में 30 साल के लिए निष्पादित किया गया था। सरकारी जांच में वर्ष 2004 से 2017 के बीच हुई खनन गतिविधियों की पड़ताल की गई। जांच में 10 लाख 89 हजार 860 मीट्रिक टन लौह अयस्क के कथित अतिरिक्त या अवैध उत्खनन का मामला सामने आया। इसके आधार पर 81 करोड़ 73 लाख 95 हजार रुपए और जीएसटी जमा कराने की सिफारिश की गई। इसके बाद कलेक्टर की ओर से कारण बताओ नोटिस जारी किए गए।
वसूली की रकम पर फर्म ने उठाए सवाल
फर्म की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मनोज कुमार शर्मा ने कोर्ट में दलील दी कि जांच रिपोर्ट तैयार करते समय कंपनी को पर्याप्त जानकारी नहीं दी गई। रिपोर्ट में इस्तेमाल किए गए दस्तावेज, गणना का तरीका और संबंधित रिकॉर्ड भी पूरी तरह उपलब्ध नहीं कराए गए। फर्म का कहना था कि उसने कई बार दस्तावेज मांगे, लेकिन उसे अधूरी और अस्पष्ट जानकारी ही दी गई। कंपनी ने यह भी दलील दी कि वह जरूरी अनुमतियों के आधार पर खनन करती रही है और रॉयल्टी सहित सभी लागू शुल्क जमा करती रही है। इसी आधार पर उसने वसूली की कार्रवाई रद्द करने की मांग की थी।
कलेक्टर के अधिकार और जांच समिति पर भी सवाल
फर्म ने कोर्ट में यह भी सवाल उठाया कि खनन कानून के तहत इतनी बड़ी रकम की वसूली का फैसला करने का अधिकार कलेक्टर को है या नहीं। उसका तर्क था कि जांच समिति के गठन और रिपोर्ट तैयार करने की प्रक्रिया में कानूनी खामियां हैं। कंपनी ने यह भी कहा कि प्रस्तावित वसूली का कुछ हिस्सा खनन पट्टा शुरू होने से पहले की अवधि से जुड़ा है। इसलिए पूरी कार्रवाई पर रोक लगाई जानी चाहिए। फर्म ने वैकल्पिक रूप से पूरी जांच रिपोर्ट और संबंधित दस्तावेज उपलब्ध कराने के बाद प्रभावी सुनवाई का अवसर देने की मांग की थी।
सरकार ने कहा, अभी वसूली का अंतिम आदेश नहीं
राज्य सरकार की ओर से कोर्ट में कहा गया कि कलेक्टर ने अभी केवल कारण बताओ नोटिस जारी किए हैं। कंपनी पर कितनी रकम की देनदारी बनती है, इसका अंतिम फैसला नहीं हुआ है। सरकार के मुताबिक, कंपनी को अपना पक्ष रखने के कई मौके दिए गए, लेकिन उसने लंबे समय तक अपना पूरा जवाब दाखिल नहीं किया। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि जांच रिपोर्ट में 81.73 करोड़ रुपए और जीएसटी जमा कराने की सिफारिश को अंतिम वसूली आदेश नहीं माना जा सकता। कलेक्टर को कंपनी की आपत्तियों और संबंधित दस्तावेजों पर विचार करने के बाद ही फैसला लेना है।
हाई कोर्ट ने क्यों खारिज की याचिका?
हाई कोर्ट (High Court) ने माना कि मध्य प्रदेश खनिज नियम, 2022 के तहत कलेक्टर को अवैध खनन से जुड़े मामलों में फैसला लेने का अधिकार है। इसलिए कलेक्टर के अधिकार क्षेत्र को लेकर फर्म की दलील स्वीकार नहीं की गई। कोर्ट ने यह भी कहा कि जब कारण बताओ नोटिस पर सुनवाई अभी जारी है और अंतिम आदेश नहीं हुआ है, तब इस स्तर पर हाई कोर्ट का हस्तक्षेप उचित नहीं है। फर्म को पहले कलेक्टर के सामने अपना पक्ष रखना चाहिए। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जांच रिपोर्ट अपने आप में वसूली का अंतिम आदेश नहीं है।
चार महीने में फैसला करने की अपेक्षा
हाई कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कलेक्टर, जबलपुर से मामले का जल्द निपटारा करने की अपेक्षा जताई है। कोर्ट के मुताबिक, आदेश की प्रमाणित प्रति मिलने की तारीख से अधिमानतः चार महीने के भीतर अंतिम फैसला किया जाना चाहिए। कलेक्टर को फर्म की आपत्तियों, जांच रिपोर्ट और संबंधित रिकॉर्ड पर विचार करना होगा। साथ ही, फर्म को अपना पक्ष रखने का पर्याप्त और प्रभावी अवसर देना होगा। इसके बाद कानून के अनुसार स्वतंत्र रूप से फैसला लिया जाएगा।
क्या अब 81.73 करोड़ रुपए ही चुकाने होंगे?
हाई कोर्ट के इस आदेश का मतलब यह नहीं है कि फर्म पर 81.73 करोड़ रुपए की देनदारी तय हो गई है। कोर्ट ने केवल वसूली की प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिका खारिज की है। वास्तविक देनदारी कितनी बनती है, इसका फैसला कलेक्टर की सुनवाई और अंतिम आदेश के बाद होगा। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि उसने मामले के तथ्यों या फर्म की वास्तविक देनदारी पर कोई अंतिम राय नहीं दी है। अब इस मामले में अगला अहम फैसला कलेक्टर को लेना है।