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JABALPUR. रिसर्च के लिए पंचगव्य को वैज्ञानिक आधार देने की योजना में बड़ी हेराफेरी सामने आई है। साल 2012 से 2018 के बीच इस योजना के तहत रिसर्च के लिए मिले फंड को जिम्मेदारों ने अपने निजी शौक और सैर सपाटे पर उड़ा दिया।
प्रशासनिक जांच में जबलपुर स्थित नानाजी देशमुख पशु चिकित्सा विज्ञान कॉलेज में गोबर और गौमूत्र से कैंसर- टीबी जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए हुई रिसर्च कटघरे में है।
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योजना के तहत करीब तीन करोड़ की सरकारी राशि के दुरुपयोग पर सवाल उठ रहे हैं। वहीं जांच में सामने आया है कि जिम्मेदारों ने रिसर्च फंड को हवाई यात्राओं, वाहन और फर्नीचर खरीदी पर खर्च कर दिया। इस वजह से रिसर्च हो पाई और न इसके परिणाम सामने आ सके।
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हजारों की खरीदी पर 1.92 करोड़ रुपए खर्च
कलेक्टर के आदेश पर दो सदस्यीय टीम ने जांच की। टीम में अपर कलेक्टर रघुवीर सिंह मरावी और जिला कोषालय अधिकारी विनायकी लकरा थे।
रिपोर्ट में बताया गया कि करीब 1.92 करोड़ रुपए गोबर-गौमूत्र, कच्चे पदार्थ, गमले और मशीनों की खरीदी में खर्च दिखाया गया। वहीं बाजार में इन मशीनों की अनुमानित कीमत मात्र 15 से 20 लाख रुपए बताई जा रही है।
इसके अलावा रिसर्च फंड से गोवा, बेंगलुरु समेत देश के कई शहरों की 24 हवाई यात्राएं की गईं। करीब साढ़े सात लाख रुपए की कार खरीदी गई, पेट्रोल- डीजल और मेंटनेंस पर भी लाखों रुपए फूंक दिए गए। फर्नीचर, टेबल और इलेक्ट्रॉनिक सामान पर करीब 15 लाख रुपए खर्च कर दिए। वहीं लेबर भुगतान पर भी लाखों रुपए खर्च बताया गया।
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दस्तावेज गायब, जिम्मेदारों की भूमिका संदिग्ध
जांच के दौरान सामने आया कि कई अहम दस्तावेज या तो नष्ट कर दिए गए या जानबूझकर उपलब्ध नहीं कराए गए। यशपाल साहनी, सचिन कुमार जैन, गिरिराज सिंह सहित अन्य लोगों के नाम जांच में सामने आए हैं। साथ ही विश्वविद्यालय के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका को भी संदिग्ध माना गया है। जांच रिपोर्ट कलेक्टर को सौंप दी गई है और सूत्रों के अनुसार आगे एफआईआर दर्ज होने और पुलिस जांच की पूरी संभावना है।
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यूनिवर्सिटी का पक्ष: पुरानी योजना, सब ऑडिटेड
वहीं विश्वविद्यालय प्रबंधन ने आरोपों से इनकार किया है। कुलगुरु मनदीप शर्मा ने कहा कि पंचगव्य योजना 2012 से 2017-18 तक चली। सभी तकनीकी और वित्तीय रिपोर्ट समय पर फंडिंग एजेंसी को दी गई थीं और वे ऑडिटेड थीं। प्रारंभिक स्तर पर कोई अनियमितता नहीं पाई गई थी। अब जांच रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई शासन और प्रशासन तय करेगा।
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परंपरागत ज्ञान के नाम पर सवालों का बोझ
एक ओर पंचगव्य जैसे पारंपरिक ज्ञान को वैज्ञानिक आधार देने का अवसर था। लेकिन जिम्मेदारों ने इसे निजी ऐशो-आराम और सरकारी पैसों से हवाई यात्रा का जरिया बना लिया। अब सवाल यह है कि करोड़ों रुपए खर्च होने के बावजूद इस रिसर्च का ठोस लाभ कहां है? जांच की अगली कड़ी पर पूरे प्रदेश की नजरें टिकी हैं।
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