कांग्रेस का जन महाभियोग सवालों के घेरे में! लोकतांत्रिक असहमति या जन-अदालत की राजनीति?

The Sootr | Nov 02, 2026, 22:47 IST
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कांग्रेस और इंडिया गठबंधन के जन महाभियोग कार्यक्रम में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ प्रतीकात्मक प्रस्ताव पर संवैधानिक बहस।
कांग्रेस और इंडिया गठबंधन के जन महाभियोग कार्यक्रम में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ प्रतीकात्मक प्रस्ताव पर संवैधानिक बहस।

लोकतंत्र में सरकार की आलोचना करना, संवैधानिक संस्थाओं से सवाल पूछना और उनके फैसलों का विरोध करना हर नागरिक और राजनीतिक दल का अधिकार है। लेकिन जब राजनीतिक विरोध इस हद तक पहुंच जाए कि संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर ही सवाल उठने लगें और राजनीतिक मंचों पर उनके खिलाफ फैसले सुनाए जाने लगें, तो इस पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है।

हाल ही में कांग्रेस और इंडिया गठबंधन के एक कार्यक्रम को लेकर ऐसी ही बहस छिड़ गई है। पहले इस कार्यक्रम को मॉक पार्लियामेंट कहा गया था, लेकिन बाद में इसका नाम बदलकर जन महाभियोग कर दिया गया। 31 अक्टूबर 2026 को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के आवास पर हुए इस कार्यक्रम में 19 राजनीतिक दलों के 215 सांसदों के शामिल होने का दावा किया गया था। इस दौरान मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ एक प्रतीकात्मक प्रस्ताव भी पेश किया गया।

अब सवाल यह उठता है कि क्या राजनीतिक दल किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के खिलाफ खुद ही अदालत जैसी सुनवाई कर सकते हैं और फैसला सुना सकते हैं? क्या ऐसे कार्यक्रम संवैधानिक संस्थाओं से जवाब मांगने का तरीका हैं या फिर इनके जरिए संस्थाओं की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर राजनीतिक माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है?

माओवादी जन-अदालत और राजनीतिक जन-अदालत का प्रश्न

इस पूरे मामले को समझने के लिए माओवादी संगठनों की जन-अदालतों का उदाहरण भी देख सकते हैं। माओवादी प्रभाव वाले इलाकों में लंबे समय तक जन-अदालतें और जनताना सरकार जैसी व्यवस्थाएं चलती रही हैं। इनका मकसद सिर्फ स्थानीय झगड़े सुलझाना नहीं था, बल्कि सरकार की प्रशासनिक और न्याय व्यवस्था के समानांतर अपनी अलग व्यवस्था खड़ी करना भी था।

इन जन-अदालतों में कई बार आरोप लगाने वाले, सुनवाई करने वाले और फैसला सुनाने वाले लोग एक ही संगठन से होते थे। किसी को पुलिस का मुखबिर बता दिया जाता था, तो किसी को संगठन का विरोधी या जनविरोधी घोषित कर दिया जाता था। स्थानीय लोगों की मौजूदगी को यह दिखाने के लिए इस्तेमाल किया जाता था कि फैसले को जनता का समर्थन हासिल है। कई मामलों में डर, दबाव और हिंसा के जरिए इन फैसलों को लागू भी कराया जाता था।

इस तरह की व्यवस्था भारतीय संविधान और कानून के मुताबिक नहीं थी। सबसे बड़ी समस्या यह थी कि आरोप लगाने वाला और फैसला सुनाने वाला पक्ष अलग-अलग नहीं होता था। ऐसे में निष्पक्ष न्याय की गुंजाइश बेहद कम रह जाती थी।

अब कांग्रेस और इंडिया गठबंधन के जन महाभियोग की तुलना माओवादी जन-अदालतों से की जा रही है, तो दोनों के बीच का फर्क समझना भी जरूरी है। किसी राजनीतिक कार्यक्रम को सीधे माओवादी गतिविधि नहीं कहा जा सकता। लेकिन अगर कोई राजनीतिक मंच संवैधानिक प्रक्रिया से अलग खुद ही सुनवाई और फैसला करने का दावा करता है, तो उसकी भूमिका और लोकतांत्रिक तरीके पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

भारत में मार्क्सवाद: 100 साल का हिसाब - मजदूर आंदोलनों से माओवादी हिंसा तक, क्या मिला देश को? | Marxism in India: 100 Years Account - From Labor Movements to Maoist Violence, What Did the Country Gain?
भारत में मार्क्सवादी विचारधारा के 100 साल: मजदूर आंदोलनों से माओवादी हिंसा तक, देश को क्या मिला?
25 Oct 2026 ,
By The Sootr
विचार मंथन: भारत में मार्क्सवादी विचारधारा के लगभग 100 साल पूरे हो चुके हैं। इस दौरान वामपंथी संगठनों ने मजदूरों और किसानों के लिए आंदोलन किए। केरल और पश्चिम बंगाल में लंबे समय तक सरकारें चलाईं। दूसरी ओर माओवादी हिंसा ने हजारों लोगों की जान ली। ऐसे में सवाल है कि मार्क्सवादी संगठनों ने शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सामाजिक विकास में क्या स्थायी योगदान दिया?
विचार मंथन: भारत में मार्क्सवादी विचारधारा के लगभग 100 साल पूरे हो चुके हैं। इस दौरान वामपंथी संगठनों ने मजदूरों और किसानों के लिए आंदोलन किए। केरल और पश्चिम बंगाल में लंबे समय तक सरकारें चलाईं। दूसरी ओर माओवादी हिंसा ने हजारों लोगों की जान ली। ऐसे में सवाल है कि मार्क्सवादी संगठनों ने शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सामाजिक विकास में क्या स्थायी योगदान दिया?

संवैधानिक प्रक्रिया और राजनीतिक आयोजन में अंतर

भारत के संविधान में मुख्य निर्वाचन आयुक्त को पद से हटाने के लिए एक खास प्रक्रिया तय की गई है। संविधान के अनुच्छेद 324(5) के मुताबिक, मुख्य निर्वाचन आयुक्त को उसी प्रक्रिया और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जिनके तहत सुप्रीम कोर्ट के किसी जज को हटाया जाता है। इसके लिए संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत से प्रस्ताव पास होना जरूरी है।

यानी कोई भी राजनीतिक दल, गठबंधन या लोगों का समूह अपने स्तर पर कार्यक्रम आयोजित करके किसी संवैधानिक पदाधिकारी को पद से नहीं हटा सकता। अगर किसी अधिकारी पर आरोप हैं, तो उनकी जांच होनी चाहिए, सबूत देखे जाने चाहिए और फैसला संविधान में तय प्रक्रिया के मुताबिक ही होना चाहिए।

वहीं, निर्वाचन आयोग और वोटर लिस्ट के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR से जुड़े मामले भी सुप्रीम कोर्ट में चल रहे हैं। इन मामलों में चुनाव आयोग ने हलफनामा देकर अपना पक्ष रखा है और दूसरे पक्ष को भी जवाब देने का मौका मिला है।

ऐसे में जब मामला कोर्ट में है, तो राजनीतिक दलों को उस पर सवाल उठाने और सार्वजनिक बहस करने का पूरा अधिकार है। लेकिन राजनीतिक मंच पर होने वाली बहस को अदालत के फैसले का विकल्प नहीं माना जा सकता।

निर्वाचन आयोग, न्यायपालिका और संसद के प्रति अविश्वास

देश की मौजूदा राजनीति में तीन बड़ी संवैधानिक संस्थाएं लगातार चर्चा में बनी हुई हैं।

सबसे पहले बात चुनाव आयोग की। चुनावों में गड़बड़ी, वोट चोरी और पक्षपात के आरोप लगाकर उसकी निष्पक्षता पर सवाल उठाए जा रहे हैं।

दूसरी संस्था है न्यायपालिका। जब अदालत से किसी राजनीतिक दल या नेता की उम्मीद के मुताबिक फैसला नहीं आता, तो कई बार अदालत की भूमिका और निष्पक्षता पर भी सवाल उठने लगते हैं। इसी सिलसिले में 12 अक्टूबर को विपक्षी नेताओं के सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च करने और 15 अक्टूबर को राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे समेत अन्य नेताओं को नोटिस जारी होने की घटनाओं का भी जिक्र किया जा रहा है।

तीसरी संस्था है संसद। संसद के कामकाज, उसके फैसलों और राजनीतिक वैधता को लेकर भी लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं।

हालांकि, इन संस्थाओं पर सवाल उठाना या उनकी आलोचना करना लोकतंत्र के खिलाफ नहीं है। लोकतंत्र में हर संस्था की जवाबदेही जरूरी है। लेकिन किसी संस्था से जवाब मांगना और उसकी वैधता को पूरी तरह नकार देना, दोनों अलग बातें हैं।

अगर लोगों के मन में यह धारणा बनने लगे कि चुनाव आयोग निष्पक्ष नहीं है, न्यायपालिका स्वतंत्र नहीं है और संसद जनता की सही आवाज नहीं उठाती, तो इससे लोकतांत्रिक व्यवस्था पर लोगों का भरोसा कमजोर पड़ सकता है।

सड़क आधारित राजनीति और रिजीम चेंज का विमर्श

इस पूरे मामले को हाल के कुछ राजनीतिक आंदोलनों से जोड़कर भी देखा जा रहा है। इनमें NEET के खिलाफ प्रदर्शन, शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग, चुनाव आयोग के खिलाफ आंदोलन, SIR का विरोध, सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च और अब जन महाभियोग जैसे कार्यक्रम शामिल हैं।

इसी बीच योगेंद्र यादव के सड़क से देश चलेगा वाले कथन और प्रशांत भूषण के 15 अक्टूबर 2026 को दिए गए रिजीम चेंज यानी सत्ता या व्यवस्था परिवर्तन से जुड़े बयान को लेकर भी चर्चा हो रही है।

लोकतंत्र में हर नागरिक को सड़क पर उतरकर विरोध करने का अधिकार है। देश में पहले भी कई बड़े आंदोलनों ने सामाजिक और राजनीतिक बदलाव लाने में अहम भूमिका निभाई है। लेकिन सवाल यह है कि क्या सड़क पर होने वाले आंदोलन संसद, सरकार और दूसरी संवैधानिक संस्थाओं की जगह ले सकते हैं?

जनता की आवाज सुनी जानी चाहिए, लेकिन कोई एक राजनीतिक दल या संगठन यह तय नहीं कर सकता कि पूरे देश की जनता क्या चाहती है।

वहीं, रिजीम चेंज का मतलब भी समझना जरूरी है। चुनाव के जरिए सरकार बदलना और पूरी शासन व्यवस्था को बदलना, दोनों अलग बातें हैं। लोकतंत्र में सरकार जनता के वोट और संविधान के मुताबिक बदलती है। जबकि व्यवस्था परिवर्तन का मकसद मौजूदा संस्थाओं को बदलकर नई व्यवस्था खड़ी करना भी हो सकता है।

हालांकि, हर व्यवस्था परिवर्तन हिंसक या गैरकानूनी नहीं होता। लेकिन अगर इसके लिए संविधान और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को किनारे करने की कोशिश की जाती है, तो इस पर गंभीर सवाल उठना स्वाभाविक है।

बांग्लादेश का जेन-जी आंदोलन और अंतरराष्ट्रीय संदर्भ

बांग्लादेश में युवाओं के जेन-जी आंदोलन के बाद शेख हसीना की सरकार गिर गई थी। इसके बाद वहां जो राजनीतिक हालात बने, उन्हें भी इस पूरी बहस से जोड़कर देखा जा रहा है। भारत में AISA की नेता नेहा बोरा के बांग्लादेश के आंदोलन से प्रेरणा लेने की बात का भी जिक्र किया जा रहा है।

दुनिया के कई देशों में छात्र आंदोलनों, विरोध प्रदर्शनों और जनता के सड़कों पर उतरने से सरकारें बदली हैं। नेपाल, श्रीलंका और बांग्लादेश जैसे देशों के उदाहरण बताते हैं कि जब जनता में नाराजगी बढ़ती है, तो उसका असर देश की राजनीति और सरकार पर भी पड़ सकता है।

लेकिन हर देश के हालात अलग होते हैं। जरूरी नहीं कि एक देश में जिस तरह आंदोलन हुआ, वही तरीका दूसरे देश में भी काम करे या वहां के लिए सही हो।

ऐसे में यह समझना भी जरूरी है कि ट्रेड यूनियन, छात्र संगठन, सामाजिक संगठन, आम नागरिकों के समूह और सोशल मीडिया लोगों की राय बनाने और उन्हें आंदोलनों से जोड़ने में कितनी बड़ी भूमिका निभाते हैं।

इनका इस्तेमाल लोकतांत्रिक तरीके से किया जाए, तो समाज में अच्छे बदलाव लाए जा सकते हैं। लेकिन अगर इनके जरिए बिना सबूत वाली खबरें फैलाई जाएं, गलत जानकारी देकर लोगों को भड़काया जाए या संवैधानिक संस्थाओं के प्रति अविश्वास पैदा किया जाए, तो इनका गलत इस्तेमाल भी हो सकता है।

भारत के लोकतंत्र के सामने मूल चुनौती

भारत में लोकतंत्र का मतलब सिर्फ चुनाव कराना और सरकार बनाना नहीं है। हमारे लोकतंत्र की असली ताकत संविधान, स्वतंत्र न्यायपालिका, निष्पक्ष चुनाव व्यवस्था, संसद और जागरूक जनता है। भारत में हमेशा से बातचीत, अलग-अलग विचारों और आपसी सहमति को महत्व दिया गया है।

ऐसे में सरकार का विरोध करना या उसके फैसलों पर सवाल उठाना लोकतंत्र के खिलाफ नहीं है। लेकिन विरोध के नाम पर संविधान से अलग अपनी व्यवस्था बनाकर फैसले सुनाने की कोशिश होती है, तो उस पर सवाल उठना भी जरूरी है।

अब सवाल यह है कि क्या सिर्फ राजनीतिक आरोप लगाकर किसी को दोषी ठहराया जा सकता है? क्या अदालत का फैसला आने से पहले किसी राजनीतिक मंच पर किसी को दोषी घोषित करना सही है? क्या चुनाव आयोग, न्यायपालिका और संसद के फैसलों का विरोध करते-करते इन संस्थाओं की विश्वसनीयता को ही नकार देना लोकतंत्र को मजबूत करेगा? और सबसे बड़ा सवाल यह कि देश में सरकार का बदलाव जनता के वोट और संविधान के जरिए होगा या फिर सड़कों पर होने वाले आंदोलनों से?

इन सवालों पर देशभर में गंभीर चर्चा होनी चाहिए।

लोकतंत्र में हर किसी को अपनी बात रखने, सरकार का विरोध करने और संवैधानिक संस्थाओं से जवाब मांगने का पूरा अधिकार है। सरकार बदलने का रास्ता भी हमेशा खुला रहना चाहिए। लेकिन यह सब संविधान के दायरे में होना जरूरी है। कोई भी राजनीतिक दल, गठबंधन या आंदोलन खुद को संविधान से ऊपर नहीं मान सकता।

आखिरकार, लोकतंत्र की असली ताकत सिर्फ सरकार बदलने में नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाए रखने में है, जहां हर कोई अपनी बात कह सके, गलत फैसलों पर सवाल उठा सके और जिम्मेदार लोगों से जवाब मांग सके। साथ ही, देश की संवैधानिक संस्थाओं पर लोगों का भरोसा भी बना रहे।

नोट: लेखक कैलाश चंद्र के विचार उनके निजी हैं।
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