एमपी में स्कूलों की मरम्मत के नाम पर फर्जी बिलों से करोड़ों डकारने वाले बेफिक्र

Sanjay Sharma | Jun 12, 2026, 19:19 IST
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दब गई मेंटेनेंस घोटाले की जांच
दब गई मेंटेनेंस घोटाले की जांच

DPI कमिश्नर बदलते ही मैहर-सतना सहित प्रदेश के अन्य जिलों में स्कूल मरम्मत घोटाले की जांच रुक गई है। स्कूलों में बिना टेंडर बुलाए प्राचार्यों ने मरम्मत कराते हुए फर्जी बिलों से लाखों रुपए निकाल लिए थे।

समझें क्या है पूरा मामला

  • 19 करोड़ का स्कूल मरम्मत घोटाला फाइल में दफन।
  • भौतिक सत्यापन का आदेश गया ठंडे बस्ते में।
  • स्कूल मरम्मत के नाम पर हुई थी 19 करोड़ की हेराफेरी।
  • कमिश्नर बदलते ही डीपीआई भूल गया जांच कराना।
  • कार्रवाई से बच निलक बिना काम करोड़ों डकारने वाले।

करोड़ों के घोटाले की जांच ठंडी पड़ गई

स्कूल मरम्मत के नाम पर स्कूल शिक्षा विभाग में हुए करोड़ों के घोटाले की जांच ठंडी पड़ गई है। बिना काम कराए फर्जी बिल लगाने वाले बेफिक्री के साथ नौकरी कर रहे हैं। वहीं पूर्व डीपीआई कमिश्नर शिल्पा गुप्ता के निर्देशों के बाद भी इन कामों का भौतिक सत्यापन नहीं कराया गया है। छह महीने बीतने के बाद भी बिना टेंडर कराए गए इन निर्माण और मरम्मत कार्यों के नाम पर विभाग को चूना लगाने वालों पर कार्रवाई प्रस्तावित नहीं की जा सकी है। वहीं अब लाखों रुपए की हेराफेरी करने वाले प्राचार्य और शिक्षक तबादला कराने की जुगत भिड़ा रहे हैं।

ईट लगी न सीमेंट और हो गई मरम्मत

स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा साल 2025 में स्कूलों की मरम्मत के लिए बजट उपलब्ध कराया गया था। फरवरी 2026 में मैहर विधायक श्रीकांत चतुर्वेदी ने विधानसभा में फर्जीवाड़े की शिकायत उठाई थी। उन्होंने बताया था कि अकेले मैहर जिले में ही डेढ़ दर्जन से ज्यादा स्कूलों में स्कूलों की मरम्मत के नाम पर करोड़ों रुपए की हेराफेरी हुई है। प्राचार्य, प्रधानाध्यापक और शिक्षकों द्वारा फर्जी बिल लगाकर लाखों रुपए हड़प लिए गए। जबकि मौके पर न तो मरम्मत कराई गई न रंग रोगन हुआ था। इसके साथ ही सतना, रीवा सहित प्रदेश के कई जिलों से ऐसे मामले सामने आए थे।

कहां अटकी गड़बड़झाले की जांच

स्कूल मरम्मत घोटाले की शिकायतों को देखते हुए पहले लोक शिक्षण संचालनालय (DPI) स्तर पर जांच टीम गठित की गई थी। मैहर विधायक द्वारा जांच टीम के अधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठाए गए थे। डीपीआई की तत्कालीन आयुक्त शिल्पा गुप्ता ने जिलों में कलेक्टर के माध्यम से भौतिक सत्यापन कराने पत्र लिखा था। कलेक्टर के निर्देशन में स्कूलों में मरम्मत, रंग रोगन और पार्किंग शैड निर्माण के कामों की जांच की जानी थी। पत्र लिखने के अगले महीने ही गुप्ता का तबादला हो गया और उनकी विदाई के साथ ही जांच भी फाइलों में दबकर रह गई।

हर जिले के स्कूलों में फर्जीवाड़ा

मरम्मत के नाम पर मैहर के स्कूलों से उजागर हुआ घोटाला करोड़ों रुपए का है। अकेले मैहर, रीवा और सतना जिलों में ही स्कूलों में फर्जी बिलों के सहारे 19 करोड़ से ज्यादा की हेराफेरी सामने आ चुकी है। जबकि प्रदेश के अन्य जिलों में घपले की राशि और भी ज्यादा हो सकती है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि स्कूलों में लाखों रुपए के काम बिना टेंडर बुलाए कराए गए। जिन कामों का लाखों रुपए भुगतान किया गया वे कराए ही नहीं गए थे। मुरैना, विदिशा, खंडवा, देवास, रतलाम जैसे जिलों में भी स्कूल मरम्मत की आड़ में करोड़ों का गबन हुआ है।

मरम्मत के नाम पर यहां हुआ घोटाला

  • मैहर: मैहर ब्लॉक के शासकीय स्कूल की छत की मरम्मत फाइल पर दिखाई गई जबकि मौके पर काम ही नहीं हुआ। बिल पास कर 12 लाख रुपए डकार लिए गए। वहीं कक्षाओं में बारिश का पानी रिसना बंद नहीं हुआ। ऑडिट में सामने आया कि मरम्मत के लिए सामग्री खरीदी गई न मजदूर लगाए गए। टेंडर भी नहीं कराया गया था।
  • सतना: सतना की माध्यमिक शाला में 4 साल से बाउंड्री क्षतिग्रस्त पड़ी है। बीते साल इसे दुरुस्त करने के नाम पर 8 लाख रुपए निकाल लिए गए। शिकायत की जांच के दौरान अधिकारी पहुंचे तो दीवार ध्वस्त पड़ी थी। मौके पर सामग्री मिली न ही काम चल रहा था।
  • रीवा: रीवा के एक हायर सेकेंडरी स्कूल में स्वच्छ भारत के तहत 6 टॉयलेट बनाने 15 लाख मिले थे। प्राचार्य ने अन्य के साथ मिलकर फर्जी फोटो लगाकर बिल पास कराया और रुपए निकाल लिए। बिल के साथ जो फोटो लगाए वे नजदीक के स्कूल के टॉयलेट के थे।
  • मैहर: एक ही मैहर रामनगर ब्लॉक के स्कूल में 2022, 2023, 2024 में तीन बार रंगाई- पुताई के नाम पर चार- चार लाख रुपए निकाले गए। जबकि इन स्कूलों में कई सालों से पुताई ही नहीं कराई गई थी। जबकि हर साल पुताई कराने के बिल भुगतान पंजी में लगाए गए थे।

FAQ

  1. DPI का 19 करोड़ स्कूल मरम्मत घोटाला क्या है?
    मैहर-सतना क्षेत्र के स्कूलों में बिना निर्माण और मरम्मत कराए प्राचार्यों ने फर्जी बिल लगाकर 19 करोड़ रुपये निकाल लिए। पूरे काम में एक भी टेंडर नहीं हुआ। पूर्व DPI कमिश्नर ने भौतिक सत्यापन के आदेश दिए थे।
  2. कमिश्नर बदलते ही जांच क्यों रुक गई?
    पूर्व कमिश्नर ने हेराफेरी पकड़ने के बाद कलेक्टरों को स्कूलों का ग्राउंड वेरिफिकेशन करने को कहा था। नए कमिश्नर के आते ही फाइल आगे नहीं बढ़ी और भौतिक सत्यापन की प्रक्रिया ठप पड़ गई।

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