रातोंरात गायब हो गया अस्पताल, सरकारी मदद लेकर कर रहा था मरीजों का इलाज, अब लीपापोती की तैयारी

Ravi Awasthi | Jan 07, 2026, 13:28 IST
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madhusudangarh fake hospital scam cm fund fraud
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मध्य प्रदेश के मधुसूदनगढ़ में एक बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आया है। यहां 'भोपाल सिटी हॉस्पिटल' नाम का अस्पताल सरकारी पैसे डकारकर रातोंरात गायब हो गया। इस अस्पताल ने मुख्यमंत्री चिकित्सा सहायता कोष से करीब 50 से 55 लाख रुपए हड़पे हैं।

5 पॉइंट में समझें खबर के मायने...

  • एमपी के मधुसूदनगढ़ में फर्जी अस्पताल ने मुख्यमंत्री सहायता कोष से 55 लाख रुपए हड़पे।
  • शिकायत के बाद अस्पताल का नाम बदलकर स्वास्तिक अस्पताल कर दिया गया।
  • अस्पताल गुना में था, लेकिन बैंक खाता भोपाल की शाखा में था।
  • भोपाल, विदिशा और राजगढ़ कलेक्टरों ने अस्पताल को भुगतान किया।
  • शिकायतकर्ता का दावा है कि अधिकारियों ने उनका नंबर ब्लॉक कर दिया।
भोपाल। मध्यप्रदेश में एक प्राइवेट अस्पताल रातोंरात गायब हो गया। गजब है ना। लेकिन, यह मधुसूदनगढ़ का मामला है। फर्जीवाड़े का यह अस्पताल सरकारी मदद से भोपाल, विदिशा व राजगढ़ के गंभीर मरीजों का इलाज कर रहा था। शिकायत के बाद मौके पर पहुंची जांच टीम भी अस्पताल के दूसरे नाम का बोर्ड टंगा देख हैरान रह गई। हालांकि, अफसरों की कलई खुलने के भय से जिम्मेदार अब मामले की लीपा-पोती में जुटे हैं।

इस मामले का खुलासा सीएम हेल्पलाइन में हुई एक शिकायत के बाद हुआ। दरअसल, टीला जमालपुरा निवासी राजेश शर्मा और नवीन शर्मा ने इसी साल फरवरी में सीएम हेल्पलाइन में शिकायत दर्ज कराई। इसमें कहा गया कि मधुसूदनगढ़ के भोपाल सिटी हॉस्पिटल में फर्जी तरीके से मरीजों की भर्ती दिखाकर मुख्यमंत्री चिकित्सा सहायता कोष से करीब 50 से 55 लाख रुपए हड़पे गए हैं।

भोपाल,विदिशा,राजगढ़ कलेक्टर ने किया भुगतान

हैरत की बात यह कि मधुसूदनगढ़ के इस अस्पताल में गुना या आसपास के मरीज ही नहीं, बल्कि भोपाल, सीहोर और विदिशा से भी गंभीर मरीज इलाज कराने पहुंचे। विधायकों के सिफारिशी पत्रों के आधार पर मरीजों के परिजनों ने मुख्यमंत्री चिकित्सा सहायता कोष से मदद की गुहार लगाई और उनके प्रकरण मंजूर भी हुए।

'द सूत्र' के पास इन जिलों के मरीजों के इलाज के लिए भोपाल सिटी अस्पताल के खाते में हुए भुगतान के साक्ष्य भी हैं। यह रकम संबंधित जिलों के कलेक्टर के आदेश पर जिला कोषालयों से जारी की गई। क्रमश: 80 हजार,1.20 लाख व 75 हजार की यह रकम मई 2025 की अलग-अलग तारीखों में अदा की गई।

अस्पताल गुना में, बैंक खाता भोपाल में

मामले का एक और आश्चर्यजनक पक्ष यह है कि अस्पताल भले ही गुना जिले में रहा हो,लेकिन इसका खाता इंडसइंड बैंक की त्रिलंगा, भोपाल शाखा में खोला गया। सूत्रों का दावा है कि अस्पताल का पूरा लेनदेन मधुसूदनगढ़ से करीब 125 किमी दूर इसी बैंक शाखा से होता रहा।

ऐसे बदल गया अस्पताल का नाम

सूत्रों का दावा है कि शिकायत को शुरुआती स्तर पर दबाने का जतन हुआ। जब यही मामला राज्य विधानसभा के पिछले सत्र में उठा तो जिम्मेदारों के कान खड़े हुए। आनन-फानन में गुना सीएमएचओ के नेतृत्व में 4 सदस्यीय जांच समिति बनी। जांच समिति सदस्य मौके पर पहुंचे तो वहां भोपाल सिटी हॉस्पिटल की जगह स्वास्तिक अस्पताल का बोर्ड टंगा देख दंग रह गए। पूछताछ में खुलासा हुआ कि पुराना अस्पताल बंद हो चुका है। नए के पंजीयन के लिए आवेदन प्रक्रिया में है।

रिपोर्ट में साक्ष्य नहीं मिलने का तर्क

सदन में पेश जांच रिपोर्ट में स्वास्थ्य विभाग की ओर से मौके पर भोपाल सिटी हॉस्पिटल नहीं होने की बात स्वीकार की गई। जवाब के साथ पेश जांच रिपोर्ट में यह तर्क भी दिया कि शिकायतकर्ताओं ने कई बार कहने के बाद साक्ष्य उपलब्ध नहीं कराए। सवाल यही कि शिकायतकर्ता साक्ष्य न दें तो क्या, गड़बड़ी उजागर नहीं की जा सकती?

जवाब में गुना के सीएमएचओ डॉ. आरआर माथुर कहते हैं, हमारे हाथ में अस्पताल पंजीयन के अलावा कुछ नहीं। यह काम भी ऑनलाइन है, पंजीयन मुख्यालय से होता है। सीएम सहायता कोष से सहायता पाने आवेदक सीधे मंत्रालय आवेदन करता है। प्रकरण भी वहीं मंजूर होकर रकम सीधे अस्पताल के खाते में आती है। उन्होंने कहा कि जांच के दौरान जो तथ्य सामने आए, उन्हीं का हवाला रिपोर्ट में दिया गया है।

साक्ष्य देने पर नंबर किया ब्लॉक

दूसरी ओर शिकायतकर्ता नवीन शर्मा का कुछ और ही कहना है। वह कहते हैं, साक्ष्य उपलब्ध कराने के बीसियों बार जतन किए गए। यहां तक कि वाट्सऐप पर भी फर्जी मरीजों के वीडियो, बैंक भुगतान की​ क्लिपिंग्स व दूसरे डॉक्यूमेंट्स बीएमओ डॉ धीरेंद्र श्रीवास्तव को साझा किए।

नवीन के अनुसार जांच समिति वाट्सऐप पर मुझे सूचना पत्र भेज सकती है, लेकिन इस पर साक्ष्य लेने के लिए वह राजी नहीं। व्यक्तिगत संपर्क कर साक्ष्य देना चाहा तो ऑफिस में बिजली गुल होने, कर्मचारी नहीं होने की बात कहकर टाल दिया। उन्होंने कहा कि जब उन्होंने बीएमओ से संपर्क करने का प्रयास किया तो उन्होंने मेरा मोबाइल नंबर ही ब्लॉक कर दिया। उन्होंने इस मामले में जिम्मेदार अधिकारियों पर मिलीभगत के आरोप भी लगाए।

अस्पताल में न डॉक्टर्स, न जरूरी सुविधा

नवीन ने भोपाल सिटी अस्पताल का एक वीडियो भी 'द सूत्र' को उपलब्ध कराया। इसमें देखा जा सकता है कि तत्कालीन अस्पताल में दो-तीन कर्मचारियों के अलावा न तो जरूरी पैरा मेडिकल स्टॉफ था, न विशेषज्ञ चिकित्सक। अस्पताल के संचालनकर्ता भी गैर चिकित्सक बताए जाते हैं। वार्डों में सन्नाटा व कक्षों में गंदगी पसरी है। हालांकि, द सूत्र वीडियो की पुष्टि नहीं करता।

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मंजूरी के वक्त अस्पताल अस्तित्व में: अवर सचिव

​मुख्यमंत्री के अवर सचिव आशुतोष गोस्वामी ने कहा कि मुख्यमंत्री सहायता कोष से प्रकरणों की स्वीकृति के दौरान संबंधित अस्पताल अस्तित्व में था। विधायकों की सिफारिशी पत्र व अन्य जरूरी दस्तावेज देखने के बाद ही प्रकरण मंजूर हुए। उन्होंने कहा कि सहायता कोष की आर्थिक मदद कलेक्टर व जिला कोषालय के माध्यम से अस्पतालों के खातों में जाती है।

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