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गुना: घटना सोमवार शाम, 23 फरवरी की है। हालत गंभीर होने पर कर्मचारी को तुरंत जिला अस्पताल पहुंचाया गया है। इस घटना ने नगर पालिका के भीतर चल रही गुटबाजी को को एक बार फिर से उजागर कर दिया है।
सेवा से हटाने से जुड़ा है मामला
बताया जा रहा है कि संविदा कर्मी करण मालवीय को कुछ समय पहले नौकरी से हटा दिया गया था। उसे फर्जी हस्ताक्षर और दस्तावेजों के मामले में दोषी ठहराया गया था।
करण अपनी बात रखने के लिए प्रभारी सीएमओ मंजूषा खत्री के पास गया था। चर्चा के दौरान जब उसकी बात अनसुनी हो गई, तो वह बहुत दुखी हो गया और उसने जहर खा लिया।
प्राकृतिक न्याय का गला घोंटा गया?
अस्पताल में भर्ती होने से पहले करण ने प्रशासन को जो आवेदन सौंपा, वह हैरान करने वाले हैं। करण का दावा है कि
उसे बिना किसी पूर्व सूचना के सीधे काम से हटा दिया गया था।
सेवा समाप्ति से पहले उसकी बात सुनने के लिए कोई जांच कमेटी नहीं बनाई गई थी।
उसने अपने आवेदन में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला भी दिया है। जो कहते हैं कि किसी भी व्यक्ति को अपना पक्ष रखे बिना दंडित करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध है।
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कर्मचारी का सबसे बड़ा दर्द
इस पूरे मामले का सबसे दुखद पहलू भेदभाव है। पीड़ित करण मालवीय का कहना है कि उसे फर्जी हस्ताक्षर और दस्तावेज के मामले में सेवा से हटा दिया गया, जबकि इसी मामले में कुछ स्थायी कर्मचारी भी दोषी पाए गए थे। उन स्थायी कर्मचारियों को सिर्फ निलंबित किया गया और बाद में उन्हें फिर से बहाल (वापस काम पर रखा) भी कर लिया गया।
अब सवाल ये उठता है कि क्या नियम सिर्फ संविदा कर्मचारियों के लिए ही कड़े हैं? एक ही अपराध के लिए दो अलग-अलग सजा देना क्या प्रशासनिक पक्षपात नहीं दिखाता?
सेवा समाप्ति के बाद भी लिया काम
मामला यहीं खत्म नहीं हुआ। करण का कहना है कि उसकी सेवा समाप्ति का आदेश होने के बावजूद, विभाग ने उससे दो महीने तक काम लिया था। और सबसे हैरान करने वाली बात ये है कि इस दौरान का वेतन भी उसे नहीं दिया गया। जब उसने अपनी जायज मांगें और अपना पक्ष रखने के लिए प्रभारी सीएमओ मंजूषा खत्री के पास जाकर बात की, तो उसकी बात ही अनसुनी कर दी गई।
इस वक्त गुना नगर पालिका जैसे चक्की के दो पाटों के बीच फंसी हुई है। एक तरफ नगर पालिका अध्यक्ष और पार्षदों के बीच आपसी खींचतान चल रही है, और दूसरी तरफ प्रशासनिक दबाव है। इस टकराव में सबसे ज्यादा नुकसान छोटे और संविदा कर्मचारियों का हो रहा है।
मुख्य बिंदु जो जांच के घेरे में हैं
- स्थायी और संविदा कर्मियों के बीच भेदभाव क्यों?
- बर्खास्तगी के बाद दो महीने काम कराकर वेतन क्यों रोका गया?
- क्या प्रभारी सीएमओ के पास अपने कर्मचारी की बात सुनने का समय नहीं था?
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