हाईकोर्ट ने कर्मचारियों के सर्विस मामलों में प्रशासनिक सिस्टम की कमी पर जताई चिंता

Sanjay Sharma | Feb 02, 2026, 16:36 IST
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high court concerned over lack
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हाईकोर्ट ने कर्मचारियों के शासकीय सेवा मामलों पर चिंता जताई है। एक याचिका की सुनवाई में प्रशासनिक सिस्टम विकसित करने की जरूरत पर जोर दिया गया।

News in short

  • हाईकोर्ट में वर्तमान में लगभग 50 हजार सेवा संबंधी मामले लंबित।
  • छोटे-बड़े मामलों में कर्मचारी न्यायालय जाने हैं मजबूर
  • मध्यप्रदेश के मुख्य सचिव को सुनवाई के जरिए किया निर्देशित।
  • पूर्व में बनी परामर्शदात्री और आंतरिक शिकायत समितियां रहीं विफल
  • 2003 में राज्य प्रशासनिक न्यायाधिकरण बंद करने से बढ़े हाईकोर्ट केस

News in Details

कर्मचारियों की शासकीय सेवा संबंधी मामलों में पर हाईकोर्ट ने चिंता जताई है। एक याचिका की सुनवाई के दौरान न्यायालय ने इनसे निपटने के लिए प्रशासनिक सिस्टम विकसित करने की जरूरत पर जोर दिया है। हाईकोर्ट में सर्विस मैटर से संबंधित 50 हजार से ज्यादा केस लंबित हैं।

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कोर्ट की शरण लेनी पड़ रही

कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि कर्मचारियों को अपने अधिकारों के लिए भी कोर्ट की शरण लेनी पड़ रही है।कर्मचारी संगठन भी इस समस्या की ओर सरकार का ध्यान आकर्षित करते आ रहे हैं। उच्च न्यायालय का यह निर्णय कर्मचारियों की पीड़ा को अभिव्यक्त करता है।

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आदेश के बाद भी भटकते हैं कर्मचारी

मध्यप्रदेश में कर्मचारियों के सर्विस मैटर से संबंधित ज्यादातर मामलों में प्रशासनिक बेरुखी बरती जाती है। इनमें कोर्ट से निर्णय आने के बावजूद विभागों में अधिकारी द्वारा कर्मचारियों की सुनवाई नहीं होती। इस वजह से कर्मचारियों को कोर्ट के आदेश के पालन के लिए फिर उसी कोर्ट में गुहार लगानी पड़ती है।

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सुशीला देवी केस में दिए निर्देश भूली सरकार

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने सुशीला देवी प्रकरण की सुनवाई के दौरान एक समान मामलों में दिए गए निर्णय सभी पर लागू करने निर्देशित किया था। यानी एक जैसी प्रकृति के केस में कर्मचारियों को अलग-अलग और बार-बार कोर्ट के चक्कर काटने की जरूरत नहीं है। इसके बावजूद MP में एक जैसे केस में दिए गए निर्णय को अधिकारी मान ही नहीं रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी हर छोटे मामले में अपील की प्रवृत्ति रोकने के लिए व्यवहारिक व्यवस्था के निर्देश दिए हैं।

सरकार की बेरुखी से प्रयास विफल

वर्ष 1975 से परामर्शदात्री समितियां गठित की गई थीं। इन समितियों को कर्मचारी सर्विस मैटर संबंधी विवादों की सुनवाई करनी थी। कुछ समय ये समितियां काम करती रहीं। लेकिन सरकारी बेरुखी के चलते इनकी सुनवाई विफल साबित हुई। 2010 में मुकदमा नीति के तहत आंतरिक शिकायत निवारण समितियां बनाई गईं। ये भी औपचारिकता तक सीमित रहीं।

प्रशासनिक प्राधिकरण की जरूरत

मध्यप्रदेश में केंद्र की तर्ज पर राज्य प्रशासनिक न्यायाधिकरण काम कर चुका है। इसमें प्रशासनिक और न्यायिक सदस्य कर्मचारियों से संबंधित सर्विस मैटर मामलों की सुनवाई करते थे। इससे कर्मचारियों को तय समय में समाधान मिल जाता था। साल 2003 में तत्कालीन सरकार ने अचानक ही इस प्राधिकरण को समाप्त कर दिया था।

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कर्मचारी कर रहे आर्बिट्रेशन की मांग

कोर्ट में सर्विस मैटर केसों की संख्या बढ़ रही है। कर्मचारी संगठन अब स्वतंत्र आर्बिट्रेशन ट्रिब्यूनल या प्रशासनिक प्राधिकरण की मांग कर रहे हैं। सुधीर नायक का कहना है कि इससे कर्मचारियों के मामलों की जल्दी सुनवाई होगी। इससे हाई कोर्ट का भार कम होगा और विभागों की कार्यप्रणाली में सुधार होगा।



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