हाईकोर्ट ने खारिज की छठवें वेतनमान पर तत्कालीन शिवराज सरकार की अपील
News in Short
- DRDA के कर्मचारियों की सेवाएं तत्कालीन शिवराज सरकार ने पंचायत विभाग को सौंपी थीं।
- कर्मचारियों को पांचवें वेतनमान के लिए हाईकोर्ट जाना पड़ा।
- विभाग के नियमित कर्मचारियों के समान वेतन नहीं मिल रहा था।
- सरकार ने छठा वेतनमान लागू किया, लेकिन आदेश में एक शर्त थी।
- इसके कारण DRDA कर्मचारियों को 2006 से नहीं, 2013 से लाभ मिलने का प्रस्ताव था।
News in Detail
मध्यप्रदेश के हजारों पंचायतकर्मियों के फायदे से जुड़ी खबर आई है। 70-80-90 फीसदी सैलरी केस के बाद हाईकोर्ट में सरकार की एक और कानूनी हार हुई है। करीब तेरह साल पुराने मामले में पंचायतकर्मियों को बड़ी राहत मिली है।
पंचायतकर्मियों ने तत्कालीन शिवराज सरकार के छठवें वेतनमान से संबंधित आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका पेश की थी। जिस पर सिंगल बेंच ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया तो सरकार भी अपील में चली गई।
इस वजह से जिला ग्रामीण विकास प्राधिकरण से जिला पंचायतों को सौंपे गए कर्मचारियों को छठवां वेतनमान नहीं मिल रहा था। यह वेतनमान दूसरे कर्मचारियों की समान अवधि से मिलता था। कर्मचारियों को 12 साल बाद छठे वेतनमान का हक मिला। हाईकोर्ट की डबल बेंच ने सिंगल बेंच का आदेश बरकरार रखा। सरकार की अपील खारिज कर दी गई।
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आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका
मामला प्रदेश के पंचायतकर्मियों के हितों से जुड़ा है। हाईकोर्ट ने पूर्ववर्ती शिवराज सिंह चौहान सरकार की रिट अपील खारिज कर कर्मचारियों को छठवे वेतनमान से संबंधित मामले में बड़ी राहत दी है। कर्मचारियों ने सरकार द्वारा साल 2013 से छठवे वेतनमान का लाभ देने के आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका पेश की थी।
सिंगल बेंच ने सुनवाई के बाद सरकार को नियमित कर्मचारियों की तरह 2006 से ही छठवे वेतनमान का लाभ देने का फैसला सुनाया था। हाईकोर्ट की सिंगल बेंच के आदेश के खिलाफ तत्कालीन सरकार ने अपील की थी। यह मामला 12 साल तक कोर्ट की सुनवाई में चलता रहा और अब हाईकोर्ट की डबल बेंच ने सरकार की अपील को खारिज कर दिया है।
इसके साथ ही डबल बेंच ने पूर्व में सिंगल बेंच द्वारा सुनाए गए फैसले को यथावत रखा है। यानी अब सरकार को इन पंचायतकर्मियों को बकाया अवधि यानी 2647 दिन तक रोका गया छठवें वेतनमान का लाभ देना होगा। हाईकोर्ट बेंच इंदौर के जस्टिस विजय शुक्ला और आलोक अवस्थी की पीठ ने कर्मचारियों को बकाया वेतन के भुगतान का आदेश सरकार को दिया है।
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सालों से कानूनी पेंच में फंसा रहा वेतनमान
जिला ग्रामीण विकास प्राधिकरण से पंचायत विभाग को सौंपे गए कर्मचारियों को 2006 से छठे वेतनमान का लाभ नहीं मिल रहा था। यह मामला लंबे समय तक कानूनी लड़ाई में फंसा रहा। हाईकोर्ट में सरकार नए तर्क और तथ्य पेश करती रही। कभी माली हालत खराब होने का हवाला दिया गया, कभी सेवा शर्तों की दलील दी गई। अंततः हाईकोर्ट ने समान काम समान वेतन के आधार पर राहत देने वाला फैसला सुनाया।
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कर्मचारियों के खिलाफ पेश की थी अपील
कर्मचारियों की याचिका पर सिंगल बेंच ने फैसला सुनाया तो तत्कालीन सरकार हाईकोर्ट में अपील लेकर पहुंच गई थी।कोर्ट में डिप्टी एजी सुदीप भार्गव ने कहा कि सरकारी खजाने की हालत ठीक नहीं है।
इसी वजह से DRDA से पंचायत विभाग में ट्रांसफर कर्मचारियों को 2013 से छठे वेतनमान का फायदा देने का फैसला लिया गया था। उन्होंने दलील दी कि कर्मचारियों ने सरकार के उस आदेश को सीधी चुनौती नहीं दी है, जो 2013 में जारी किया गया था।
पंचायतकर्मियों की सेवा-शर्तें और नियम अलग थे। याचिकाकर्ताओं के एडवोकेट रवींद्र सिंह छाबड़ा, विकास जायसवाल और प्रनीषा नैयर ने कहा कि पंचायत एक निकाय है। जब नियोक्ता ने छठा वेतनमान देने का फैसला लिया, तो भेदभाव कैसे किया जा सकता है?
एमपी सरकार 2006 की बजाय 2013 से वेतनमान देने का कारण नहीं बता सकी। हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देकर कहा कि वेतन में भेदभाव अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है। कोर्ट ने समान काम समान वेतन के सिद्धांत पर सिंगल बेंच का फैसला यथावत रखते हुए सरकार की अपील खारिज कर दी।
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अब आगे क्या
सालों से कानूनी लड़ाई लड़ रहे पंचायत कर्मचारी इंदौर हाईकोर्ट के फैसले के बाद खुश हैं। उन्हें भी अब 2006 से ही छठवे वेतनमान का लाभ मिलेगा। इसका असर उनके वेतन में इजाफे के रूप में नजर आएगा। वहीं 2647 दिन तक रुका रहा वेतनमान का लाभ भी सरकार से उन्हें एरियर के रूप में मिल पाएगा।