अब सोशल मीडिया का शिकार हुए IAS अफसर: वायरल वीडियो में सचिव दीपक सिंह का नाम
ऐसे समझें क्या है पूरा मामला...
- वायरल वीडियो में आईएएस दीपक सिंह का नाम जोड़ा गया।
- वीडियो में कार और बाइक सवारों का विवाद दिख रहा है।
- दीपक सिंह ने सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया।
- मामले की शिकायत साइबर क्राइम शाखा में दर्ज हुई।
- फर्जी सोशल मीडिया दावों पर फिर सवाल खड़े हुए।
मध्य प्रदेश में एक बार फिर सोशल मीडिया के जरिए किसी वरिष्ठ अफसर का नाम विवादों में घसीटे जाने का मामला सामने आया है। इस बार राज्य निर्वाचन आयोग में सचिव पद पर पदस्थ वरिष्ठ आईएएस दीपक सिंह का नाम एक वायरल वीडियो से जोड़ा जा रहा है।
वीडियो में सड़क पर कार और बाइक सवारों के बीच विवाद दिखाई दे रहा है, लेकिन आईएएस अधिकारी का दावा है कि घटना से उनका कोई लेना-देना नहीं है और उनके नाम का दुरुपयोग किया गया है।
इससे पहले भी प्रदेश और देश में कई आईएएस अधिकारी सोशल मीडिया पर फर्जी दावों, भ्रामक पोस्ट और गलत तथ्यों के जरिए निशाना बन चुके हैं। बाद में नियमानुसार जांच और कार्रवाई की प्रक्रिया चलती है, लेकिन तब तक सोशल मीडिया अपना फैसला सुना चुका होता है।
मध्य प्रदेश स्टेट इलेक्शन कमीशन में सचिव पद पर पदस्थ
वरिष्ठ आईएएस अधिकारी दीपक सिंह इन दिनों सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक वीडियो को लेकर चर्चा में हैं। दावा किया जा रहा है कि वीडियो में दिखाई दे रहा व्यक्ति आईएएस दीपक सिंह है। वीडियो को एक अप्रैल 2024 की घटना से जोड़कर 14-15 जून को दोबारा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर तेजी से प्रसारित किया गया।
वायरल वीडियो में कार और बाइक सवारों के बीच विवाद तथा कथित तौर पर पुलिस में ले जाने की धमकी दिए जाने की बात कही जा रही है। कुछ सोशल मीडिया पोस्ट में आईएएस अधिकारी का नाम जोड़ते हुए उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग तक की जा रही है। हालांकि, आईएएस दीपक सिंह ने इन दावों को पूरी तरह खारिज किया है।
सूत्रों के मुताबिक, जैसे ही मामला उनके संज्ञान में आया, उन्होंने साइबर क्राइम शाखा में लिखित शिकायत दर्ज कराई। दीपक सिंह का कहना है कि सड़क पर दो लोगों के बीच हुए विवाद को उनके नाम से जोड़ दिया गया, जबकि उनका इस पूरे घटनाक्रम से कोई संबंध नहीं है। उन्होंने दोषियों के खिलाफ वैधानिक कार्रवाई की मांग की है।
पहले भी सोशल मीडिया का शिकार हो चुके हैं अफसर
यह पहला मामला नहीं है जब किसी IAS अफसर को सोशल मीडिया पर भ्रामक सामग्री के जरिए विवादों में घसीटा गया हो। इससे पहले मध्य प्रदेश कैडर की वरिष्ठ आईएएस अधिकारी स्वाति मीणा नायक को भी सोशल मीडिया पर वायरल हुई एक फर्जी प्रेरणादायक कहानी का सामना करना पड़ा था।
उनकी तस्वीर का इस्तेमाल करते हुए उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि और संघर्ष से जुड़ी ऐसी कहानी प्रसारित की गई, जिसे उन्होंने सार्वजनिक रूप से झूठा बताया था।
स्वाति मीणा नायक ने स्वयं सोशल मीडिया पर स्पष्ट किया था कि उनके बारे में प्रसारित की जा रही भावनात्मक कहानी का वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है। उन्होंने लोगों से अपील की थी कि सिर्फ 'हिट्स' और 'रीपोस्ट' के लिए झूठी सामग्री प्रसारित न करें।
इतना ही नहीं, उन्होंने अपने नाम से फर्जी ऑडियो और भ्रामक पोस्ट प्रसारित किए जाने की शिकायत पुलिस और साइबर क्राइम अधिकारियों से भी की थी।
यह घटनाक्रम बताता है कि सोशल मीडिया पर वायरल होने वाली हर सामग्री तथ्यात्मक हो, यह जरूरी नहीं है और किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले जांच की प्रतीक्षा करना आवश्यक है।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या सोशल मीडिया पर वायरल हो रही सामग्री को अंतिम सत्य मान लिया जाना चाहिए? या फिर किसी व्यक्ति, खासकर सार्वजनिक पदों पर बैठे अधिकारियों के मामले में तथ्यों की पुष्टि और जांच पूरी होने तक संयम बरतना अधिक उचित होगा।
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