आईएएस संतोष वर्मा केस में जज विजेंद्र सिंह रावत और बाबू के खिलाफ चालान पेश
News In Short
- आईएएस संतोष वर्मा केस में फर्जी कोर्ट आदेश का मामला सामने आया था।
- पुलिस ने जज विजेंद्र सिंह रावत और बाबू नीतू सिंह को आरोपी बनाया था।
- कोर्ट में चालान पेश, दोनों आरोपी पेश होकर जमानत पर छूट गए हैं।
- जांच में मोबाइल लोकेशन, चैट और कंप्यूटर रिकॉर्ड अहम सबूत बने।
- अब मामले में कोर्ट में नियमित ट्रायल चलेगा।
News In Detail
विवादित आईएएस संतोष वर्मा के पुराने केस में बरी करने के विवादित आदेश को लेकर न्यायाधीश विजेंद्र सिंह रावत के खिलाफ कोर्ट में चालान पेश हो गया है। इसमें कोर्ट बाबू नीतू सिंह भी आरोपी हैं। चालान पेश होने के दौरान दोनों ही कोर्ट में मौजूद रहे और जमानत आवेदन भी लगाया। इस आवेदन को मंजूर कर जमानत दे दी गई है। अब मामले में ट्रायल चलेगा। रावत पूर्व में ही निलंबित हो चुके हैं।
यह है विवाद
उल्लेखनीय है कि संतोष वर्मा पर एक महिला ने गंभीर आरोप लगाए थे। इसकी एफआईआर लसूड़िया थाने में हुई थी। मामला जिला कोर्ट में चला और वहां से उन्हें बरी करने का एक आदेश आया था। इसके आधार पर डीपीसी (DPC) में वर्मा पदोन्नत होकर आईएएस बन गए थे। वहीं बाद में जिला कोर्ट जज विजेंद्र सिंह रावत ने एमजी रोड थाने पर केस दर्ज कराया कि बरी होने का आदेश उन्होंने जारी नहीं किया और यह फर्जी है। इस केस में वर्मा गिरफ्तार भी हुए थे और बाद में इस केस की जांच एसआईटी (SIT) को सौंपी गई थी।
चालान में इस आधार पर जज को बनाया आरोपी
इस विवादित केस के लिए पुलिस ने एसआईटी बनाई थी। एसीपी विनोद दीक्षित द्वारा चालान पेश किया गया। जांच में आरोपी बनाने के लिए मुख्य तौर पर तकनीकी साक्ष्य पेश किए गए हैं। इसमें मोबाइल की टावर लोकेशन, मोबाइल चैट, कोर्ट से लिए गए कंप्यूटर रिकॉर्ड, पेन ड्राइव आदि अहम सबूत बनाए गए हैं।
पुलिस ने ये अहम बातें कही हैं चालान में
पुलिस जांच में आया है कि जज रावत और आईएएस संतोष वर्मा के बीच मोबाइल पर 114 बार बात हुई है। दोनों के कई बार मोबाइल की टावर लोकेशन समान रही है। कई बार मोबाइल में भी दोनों की एक ही लोकेशन रही है, यानी दोनों कई बार एक साथ रहे हैं। यह भी सामने आया कि आदेश कोर्ट में 06 अक्टूबर 2020 की सुबह चार से सात के बीच कोर्ट के कंप्यूटर में टाइप हुआ है। इसके बाद इसी दिन रावत छुट्टी पर गए थे।
संतोष वर्मा पर एक युवती ने आरोप लगाए थे
प्रशासनिक अधिकारी संतोष वर्मा पर एक युवती ने आरोप लगाए थे। इस केस के चलते उनके पदोन्नत होकर आईएएस बनने की राह में रोड़ा आ गया था। आरोप है कि इस मामले में बरी होने का फर्जी आदेश पारित कराया गया था।
जज रावत ने थाने में यह कराई थी शिकायत
एमजी रोड थाने में 27 जून 2021 को यह फर्जी कोर्ट आदेश बनाने का केस दर्ज हुआ था। जज रावत द्वारा इसमें अज्ञात आरोपी पर आईपीसी की धारा 120B, 420, 467, 468, 471 व 472 में केस कराया गया। अपराध यानी कोर्ट आदेश जारी होने का दिन 06 अक्टूबर 2020 बताया गया। आवेदन में न्यायाधीश रावत ने कहा था कि लसूड़िया थाने में संतोष वर्मा पर दर्ज एफआईआर क्रमांक 851/2016 (धारा 323, 294 व 506) का फौजदारी केस 1621/2019 चल रहा है।
यह केस अन्य कोर्ट से ट्रांसफर होकर मेरी कोर्ट में 03 अक्टूबर 2020 को आया था। इस मामले में मेरी कोर्ट द्वारा 06 अक्टूबर 2020 को कोई आदेश पारित नहीं किया गया। कोर्ट की डायरी व सीआईएस (CIS) में इस दिन का कोई रिकॉर्ड नहीं है, ना ही इस दिन मेरे हस्ताक्षर से कोई निर्णय हुआ। इस दिन 06 अक्टूबर को मैं अवकाश पर था।
संतोष वर्मा केस के फेर में इन सभी पर आंच:
- एडीजे विजेंद्र सिंह रावत: संतोष वर्मा के खिलाफ महिला द्वारा कराए गए केस में इन्हीं की कोर्ट से फर्जी आदेश जारी होने के आरोप लग रहे हैं। यह निलंबित हो चुके हैं।
- सीजेएम अमन सिंह भूरिया: संतोष वर्मा केस इन्हीं की कोर्ट से शिफ्ट होकर जज रावत की कोर्ट में गया था। इन्हें भी निलंबित किया जा चुका है।
- एडीजे प्रकाश कसेर: इस केस में 5 दिसंबर 2025 को पहले एडीजे विजेंद्र सिंह रावत की अग्रिम जमानत लगी, जो मंजूर हो गई। वहीं इसके बाद जब पुलिस ने टाइपिस्ट नीतू सिंह को गिरफ्तार कर 18 दिसंबर को पुलिस रिमांड लिया, तो रिमांड के दौरान ही नीतू का जमानत आवेदन 19 दिसंबर को लगा। न केस डायरी कोर्ट पहुंची, इसके बाद भी जमानत रिमांड अवधि में ही मंजूर हो गई। इनका 22 दिसंबर को ट्रांसफर सीधी हो गया।
- टाइपिस्ट नीतू सिंह: इस केस में यह चौथी किरदार हैं। जब एडीजे रावत की कोर्ट में संतोष वर्मा का केस आया, तब उस समय वह कोर्ट में पदस्थ थीं और सीआई (CI) केस का काम देखती थीं। इनसे पूछताछ और कोर्ट आदेश के दस्तावेज जुटाने के लिए पुलिस ने 18 दिसंबर को गिरफ्तारी ली, जो इस केस की पहली गिरफ्तारी थी, लेकिन एक ही दिन में जमानत हो गई। अभी यह फैमिली कोर्ट में पदस्थ हैं।
- जिला लोक अभियोजक अकरम शेख: इस केस में एक और किरदार हैं जिला लोक अभियोजक अकरम शेख। आरोप है कि इस केस में पूरी मध्यस्थता का काम इनके द्वारा संभाला गया। इसके लिए कई बार मोबाइल पर जज से चर्चा हुई, मोबाइल से व्हाट्सएप चैट हुई। इस पूरे मामले में इन पर भी शासकीय कार्रवाई हुई थी। यह भी उलझे हुए हैं।
पदोन्नति के लिए जरूरी था बरी होने का आदेश
वर्मा पर दर्ज हुए महिला संबंधी अपराध के केस का चालान जिला कोर्ट में लगा। इसी दौरान साल 2020 में संतोष वर्मा का नाम डीपीसी के लिए गया, जिससे उन्हें आईएएस अवॉर्ड होना था। इसके लिए जरूरी था कि उन्हें इस अपराध से मुक्ति मिले। बताया जाता है कि इस मामले में कोर्ट के दो आदेश सामने आए।
पहले केस में बताया गया कि वर्मा और संबंधित पीड़िता के बीच समझौता हो गया और समझौते से केस खत्म हो गया। लेकिन बाद में कहा गया कि इस आधार पर उन्हें बरी नहीं माना जाएगा और डीपीसी नहीं होगी। फिर दूसरा आदेश बना, जिसे जज रावत फर्जी बता रहे हैं। इसमें संतोष वर्मा को केस से बरी होने की बात कही गई, जो 6 अक्टूबर 2020 का बना है (एडीजे रावत की कोर्ट से)। यह आदेश डीपीसी में लगा और संतोष वर्मा को आईएएस अवॉर्ड हो गया। इसी अवॉर्ड के लिए ही यह पूरा खेल रचने के आरोप हैं।
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