इंदौर में पुलिस इंस्पेक्टर के जांच आदेश में अधिकारियों की बड़ी चूक, पूर्व टीआई सुजीत श्रीवास्तव भी पहुंचे हाईकोर्ट
जबलपुर हाईकोर्ट के गायत्री केस में क्या हुआ था?
बता दें खजराना थाने के पूर्व टीआई दिनेश वर्मा और क्राइम ब्रांच के इंस्पेक्टर सुजीत श्रीवास्तव की विभागीय जांच के आदेशों में तकनीकी गलती का मामला सामने आया है। यह मामला जबलपुर हाईकोर्ट के गायत्री देवी केस से जुड़ा है। दरअसल, साल 2018 में जबलपुर में पदस्थ इंस्पेक्टर गायत्री देवी के खिलाफ विभागीय जांच के आदेश हुए थे। इसके खिलाफ वे हाईकोर्ट पहुंची थीं।
वहीं, जून 2024 में हाईकोर्ट ने फैसला सुनाते हुए जांच के आदेश और चार्जशीट को खारिज कर दिया था। कोर्ट ने कहा था कि इंस्पेक्टर रैंक के अधिकारी पर कार्रवाई का अधिकार सिर्फ एसपी (डीसीपी) स्तर के अधिकारी को है। यह कार्रवाई बड़े अधिकारियों के आदेश पर नहीं की जा सकती है। हाईकोर्ट का यही फैसला अब दूसरे इंस्पेक्टरों के मामलों में भी अहम बन गया है।
दिनेश वर्मा केस में क्या हुआ?
दिनेश वर्मा जब तिलकनगर थाने में टीआई थे, तब उन पर चालान में गलती करने का आरोप लगा था। इसी मामले में उनके खिलाफ विभागीय जांच के आदेश दिए गए थे। लेकिन जिस अधिकारी ने जांच के आदेश दिए, वह डीसीपी से प्रमोट होकर डीआईजी बन चुके थे। इसी तकनीकी गलती के आधार पर वर्मा ने हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने गायत्री देवी केस के फैसले को आधार मानते हुए विभागीय जांच पर रोक लगा दी। दरअसल, इंस्पेक्टर के खिलाफ जांच के आदेश डीसीपी रैंक के अधिकारी को ही देने थे।
सुजीत श्रीवास्तव केस में क्या हुआ?
सुजीत श्रीवास्तव केस में विभागीय कार्रवाई को लेकर सवाल उठे हैं। मामला इंदौर हाईकोर्ट पहुंचा है। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि चार्जशीट भले ही एसपी रैंक के अधिकारी यानी डीसीपी ने जारी की हो, लेकिन इसके पीछे उच्च अधिकारियों के निर्देश थे।
वकील के मुताबिक, डीसीपी ने अपने स्तर पर कार्रवाई का फैसला नहीं लिया था। यह कार्रवाई डीआईजी और एडीजीपी की रिपोर्ट और निर्देशों के आधार पर शुरू हुई थी। इतना ही नहीं, 24 अगस्त को डीआईजी ने खुद एक आदेश जारी किया था। इसमें विभागीय जांच के लिए जांच अधिकारी और प्रेजेंटिंग ऑफिसर नियुक्त किए गए थे।
याचिकाकर्ता के वकील ने गायत्री सोनी बनाम मध्य प्रदेश राज्य मामले का भी हवाला दिया। उन्होंने कहा कि उस मामले में तय कानूनी सिद्धांतों के मुताबिक यह कार्रवाई सही नहीं है। इसलिए चार्जशीट और विभागीय कार्रवाई को रद्द किया जाना चाहिए।
हाईकोर्ट ने क्या आदेश दिए?
इस मामले में इंदौर हाईकोर्ट ने 24 अगस्त के आदेश को देखा। कोर्ट ने पाया कि यह आदेश इंदौर के अतिरिक्त पुलिस आयुक्त (अपराध/मुख्यालय) ने जारी किया था। इसके बाद हाईकोर्ट ने सरकारी वकील से अधिकारी का सही रैंक और पद स्पष्ट करने को कहा। कोर्ट जानना चाहता है कि यह पद एसपी रैंक या डीआईजी रैंक के बरावर है। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के वकील को इस संबंध में जानकारी लेकर आने के निर्देश दिए हैं। अब मामले की अगली सुनवाई 23 अक्टूबर को होगी।
लोकायुक्त में भी दर्ज हो चुकी है एफआईआर
इंदौर लोकायुक्त ने सुजीत श्रीवास्तव के खिलाफ अगस्त में एफआईआर दर्ज की थी। उन पर 1 लाख 20 हजार रुपए की रिश्वत मांगने का आरोप है। यह कार्रवाई प्रीति हजारी की शिकायत पर हुई थी। मामले में श्रीवास्तव के अलावा उनके निजी ड्राइवर अभय सिंह, तत्कालीन आरक्षक विकास सेंधव और निजी व्यक्ति दीपक पटेल को भी आरोपी बनाया गया है।
शिकायत के मुताबिक, क्राइम ब्रांच ने प्रीति हजारी के बेटे को बुलाया था। आरोप है कि उसे छोड़ने के बदले 1 लाख 20 हजार रुपए मांगे गए। इसमें 20 मार्च को 50 हजार 800 रुपए यूपीआई से दीपक पटेल को दिए गए। इसके बाद 70 हजार रुपए नकद देने का भी आरोप है।
लोकायुक्त एसपी राजेश सहाय ने शिकायत की जांच कराई थी। जांच में शिकायत सही पाए जाने के बाद 24 अगस्त को एफआईआर दर्ज की गई। आरोपियों के खिलाफ भ्रष्टाचार का केस दर्ज किया गया है।
FAQs
- जबलपुर हाईकोर्ट के गायत्री देवी केस में क्या फैसला दिया गया था?
जबलपुर हाईकोर्ट ने गायत्री देवी के खिलाफ विभागीय जांच के आदेश और चार्जशीट को खारिज कर दिया, यह कहते हुए कि इंस्पेक्टर रैंक के अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई का अधिकार केवल एसपी (डीसीपी) स्तर के अधिकारी को है। - दिनेश वर्मा के मामले में कोर्ट के आदेश का क्या महत्व है?
दिनेश वर्मा ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी कि उनके खिलाफ विभागीय जांच के आदेश देने वाले अधिकारी का रैंक गलत था, और कोर्ट ने गायत्री देवी केस के फैसले को आधार बनाते हुए उनकी जांच पर रोक लगा दी। - सुजीत श्रीवास्तव के खिलाफ किए गए आरोप क्या हैं?
सुजीत श्रीवास्तव पर 1 लाख 20 हजार रुपए की रिश्वत मांगने का आरोप है, जिसके आधार पर इंदौर लोकायुक्त ने उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज की है।