इंदौर में 79 गांवों में धारा 16 की कहानी- 2500 करोड़ की 800 एकड़ जमीन पर कॉलोनी मंजूरी रिश्वत के हिस्सों को लेकर उलझी

इंदौर में जनवरी 2022 से 79 गांवों की जमीन का लैंडयूज खेती घोषित हो गया है, क्योंकि इन्हें मास्टर प्लान में नए निवेश क्षेत्र में जोड़ लिया गया है।

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Pratibha ranaa
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इंदौर में 79 गांवों में धारा 16 की कहानी
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संजय गुप्ता, INDORE. मप्र की आर्थिक राजधानी इंदौर और यहां जमीन का खेल…कल्पना से परे है। धारा 16 के तहत इंदौर के 79 गांवों में कॉलोनी विकास की मंजूरी (कम से कम 10 एकड़ में) खुली, बंद हुई, फिर खुली और अब फिर बंद हो गई। वह भी मौखिक ही। मुद्दा नियमों का नहीं बल्कि इसी बात का है कि मंजूरी जारी करने पर मिलने वाली मलाई यानी रिश्वत की कमाई का हिस्सा कौन कितना रखेगा। बात सीएम डॉ. मोहन यादव तक पहुंची और उन्होंने इस पर रोक ही लगा दी। 

मुद्दा क्या है और कितनी जमीन और राशि उलझी

एक जनवरी 2022 से इन 79 गांवों की जमीन का लैंडयूज खेती घोषित हो गया है, क्योंकि इन्हें मास्टर प्लान में नए निवेश क्षेत्र में जोड़ लिया गया है, यानी अब यहां टीएंडसीपी ही मंजूरी बिना कॉलोनी नहीं कटेगी और जब तक मास्टर प्लान मंजूर नहीं होता है, यहां पर विशेष शर्तों के तहत टीएंडसीपी कॉलोनी की मंजूरी धारा 16 के तहत ही देगा। इसके लिए भोपाल स्तर पर कमेटी बनाकर मंजूरी होती है। इसके चलते करीब 800 एकड़ जमीन, जिसके सौदे ढाई हजार करोड़ रुपए को होकर पड़े हुए हैं और यहां करीब 25 हजार लोग प्लॉट खरीदेंगे। इसकी कीमत कम से कम पांच हजार करोड़ रुपए होगी, वह सब अटक चुकी है। कुछ प्रोजेक्ट तो ऐसे हैं, जिसमें प्लॉट की बुकिंग विकास और टीएंडसीपी मंजूरी की उम्मीद में हो चुकी है और प्लाटधारक अब परेशान है, लेकिन हल किसी के पास नहीं है। 

आइए अब देखते हैं रिश्वत की राशि की मांग कहां तक पहुंच गई

धारा 16 के तहत मंजूरी के लिए कम से कम 10 एकड़ जमीन (चार हैक्टयर) जरूरी है। पहले मंजूरी होने के लिए दाम था 4 लाख रुपए प्रति एकड़ यानी कम से कम 40 लाख रुपए प्रति प्रोजेक्ट, रोक लगने के बाद कुछ बिल्डर इंदौर से भोपाल गए और यह सेटिंग जमाकर आ गए। फिर मंजूरी नियमों को लेकर टीएंडसीपी के तत्कालीन डायरेक्टर मुकेश गुप्ता के सात पीएस नगरीय प्रशासन नीरज मंडलोई के बीच विवाद हुआ। मंजूरी रूक गई। बाद में सरकार बदली और 6 लाख प्रति एकड़ पर बात जम गई और मंजूरियां खुल गई। लेकिन इस बंदरबाट में हिस्सों को लेकर लड़ाई जारी रही और आखिरकार फंसे हुए बिल्डर ने इसे 10 लाख रुपए प्रति एकड़ तक कर दिया यानी एक करोड़ प्रति कॉलोनी। लेकिन इस लड़ाई की शिकायतें सीएम डॉ. मोहन यादव तक पहुंची और उन्होंने इसे रोकते हुए धारा 16 के तहत मंजूरी देने पर ही मौखिक रूप से अधिकारियों को आदेश देकर रोक लगवा दी। 

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किस तरह से उलझी पूरी कहानी

-    टीएंडसीपी मास्टर प्लान क्षेत्र में ही मंजूरी जारी करता है। बात करते हैं कमलनाथ सरकार के समय की। तब 79 गांव मास्टर प्लान के बाहर थे और इनकी विकास मंजूरी कलेक्टोरेट से होती थी और तब यह आदेश दिए गए कि बिल्डर टीएंडसीपी से अभिमत लेकर आए। हालांकि मास्टर प्लान की बाहर की बात थी तो पहले मना किया फिर भोपाल से आदेश आए। इस पर टीएंडसीपी ने अभिमत देना शुरू कर दिया और अभिमत के आधार पर कलेक्टोरेट से मंजूरिया जारी होने लगी।

-    इंदौर के मास्टर प्लान का विस्तार कर 79 गांवों को शामिल करने की अधिसूचना 12 मार्च 2021 को जारी की गई थी। इन गांवों के लिए लैंडयूज तय करने के लिए जमीन उपयोग को फ्रीज करते हुए 31 दिसंबर 2021 को धारा 16 लागू कर दी गई। कलेक्टर मनीष सिंह ने इसके आदेश जारी किए। एक जनवरी 2022 से मंजूरियां, अभिमत सभी रूक गए। इससे कलेक्टोरेट से भी विकास मंजूरियां रूक गई। 

-    इसी बीच एक और खेल हो गया। इस रोक के पहले करीब 700 एकड़ जमीन के प्रोजेक्ट टीएडंसीपी से इन 79 गांव में पास हो चुके थे। लेकिन इसमें टीएडंसीपी के तत्कालीन ज्वाइंट डायरेक्टर एसके मुदगल ने नगरीय सीमा में लागू प्रावधान कि 3 फीसदी ईडब्ल्यूएस और 3 फीसदी एलआईजी के प्लाट रखने की जगह बंधक राशि जमा कराने के नियम को इन 79 गांवों में भी लागू कर दिया था और इसी आधार पर कई प्रोजेक्ट में यह राशि जमा करके टीएंडसीपी से मंजूरी जारी कर दी। 

-    मामला तूल पकड़ा तो इस मामले में कलेक्टर सिंह ने अतिरिक्त महाधिवक्ता पुष्यमित्र भार्गव से अभिमत लिया, उन्होंने इसे गलत बताया और कहा कि प्लाट ही रखने होंगे राशि नहीं ले सकते हैं। इसके बाद कलेक्टर ने इन सभी प्रोजेक्ट को बिल्डर से कहा कि वह टीएंडसीपी से संशोधित कराएं। लेकिन धारा 16 लागू होने के चलते टीएंडसीपी ने ऐसा करने से मना कर दिया और यह सभी प्रोजेक्ट ठंडे बस्ते में चले गए।  

-    वहीं नियमों में प्रावधान है कि धारा 16 के तहत भोपाल स्तर पर कमेटी विचार करेगी और अपनी रिपोर्ट ज्वाइंट डायरेक्टर को देगी और फिर रिपोर्ट के आधार पर कुछ शर्तों के साथ जैसे कि कम से कम 10 एकड़ जमीन हो, 12 मीटर चौड़ रोड हो, एसटीपी हो आदि के साथ मंजूरी दे सकता है। इंदौर से कुछ बिल्डर भोपाल गए और तालमेल बैठाकर आ गए. इसके बाद मंजूरिया जारी होने लगी। 

-    इस नियम के तहत हर महीने औसतन 5 से 8 मंजूरियां हो रही थी। लेकिन फिर टीएंडसीपी डायेरक्टर और नगरीय प्रशासन विकास प्रमुख सचिव के बीच में विवाद हुआ और मामला सीएस (मुख्य सचिव) इकबाल सिंह बैंस तक पहुंचा और उन्होंने जून-जुलाई 2023 में इस पर रोक लगा दी। 

-    इसके बाद सीएम शिवराज सरकार के समय यह बंद ही रहा। फिर आई मोहन सरकार। नगरीय प्रशासन मंत्री कैलाश विजयवर्गीय बने और जब उन तक यह मामला पहुंचा तो उन्होंने टीएंडसीपी को निर्देश दिए कि जब नियमों में प्रावधान है तो फिर 16 के तहत जो मंजूरी बनती है उसे दी जाए। फरवरी में यह मौखिक आदेश हुए और फिर मंजूरियां लगने लगी। कुछ ही हुई थी कि फिर अंदरखाने में विवाद शुरू हो गए और शिकायतें शुरू हो गई। इसके बाद सीएम ने इस मामले में रोक ही लगा दी। 

पूरे मामले में नुकसान किस-किस का

  • सरकार का- सरकार को 800 एकड़ की जमीन की खरीदी-बिक्री में मिलने वाली स्टाम्प ड्यूटी रूक गई। किसान से बिल्डर के सौदे अधूरे हैं, क्योंकि बिक्री अटकी तो वह किसान को पूरी सौदा राशि नहीं दे रहा है। इसके चलते वह रजिस्ट्री नहीं हो रही और फिर प्लाट बेचने से जो ड्यूटी मिलती वह भी रूक गई। कम से कम सरकार को 500 करोड़ का नुकसान है। 

  • किसान का- सौदा हो चुका है, लेकिन बयान राशि लेकर बैठा है। पूरी राशि नहीं मिली। आधा-अधूरा सौदा गले पड़ गया है।

  • बिल्डर- बिल्डर दो तरफा उलझ गया, एक और किसान पूरी सौदा राशि मांग रहा है तो वहीं पर जिसने प्लाट बुक किया और निवेश किया, वह भी अपना हिसाब मांग रहा है। क्योंकि मंजूरी मिलने की उम्मीद में कई जगह तो सौदे पहले ही डायरियों पर बुक हो चुके हैं। 

  • प्लाटधारक, निवेशक- डायरियों पर सौदे करके बैठे हुए हैं, कई निवेशक भी है जो क़ॉलोनी की मंजूरी के बाद 1000-1500 रुपए प्रतिवर्गफीट के सौदे को दो से तीन हजार में बेचने की उम्मीद में था या फिर जिसे वहां मकान बनाना था। यह सभी उलझ गए हैं।