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News in Short
- इंदौर में पुलिस ने निर्दोषों को ड्रग केस में फंसाया।
- जांच में ड्रग की बजाय यूरिया (पोटेशियम नाइट्रेट) पाया गया।
- आरोपी 10 महीने जेल में रहे, बाद में जमानत पर बाहर आए।
- पुलिस अधिकारियों पर गंभीर आरोप, मुआवजे की मांग की गई।
- आरक्षक गुप्ता ने आरोप लगाया कि यह केस बदला लेने के लिए बनाया गया।
News in Detail
इंदौर में एक साल पहले दो करोड़ की एमडी ड्रग्स बताकर चार आरोपियों को जेल भेज तारीफ लूटने वाली पुलिस अब उलझ गई है। इसमें फील्ड पुलिस अधिकारी जहां घेरे में हैं वहीं तीन-तीन आईपीएस अधिकाररियों की कार्यशैली पर भी सवाल उठ रहे हैं। इस केस में आरोपी बनाए गए निर्दोषों ने हाईकोर्ट में याचिका लगाई है। साथ ही मुआवजा की मांग की है।
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पहले बताते हैं कि केस क्या है ?
दरअसल ये मामला 26 फरवरी 2025 का है। पुलिस की कहानी के अनुसार कंट्रोल रूम से मिली सूचना के आधार पर तेजाजी नगर थाने के एएसआई मनोज दुबे, प्रधान आरक्षक देवेंद्र परिहार, अभिनव शर्मा, आरक्षक गोविंदा व आरक्षक दीपेंद्र राणा एबी रोड बायपास स्थित कस्तूरबा ग्राम पहुंचे।
वहां सड़क किनारे बाइक पर बैठे दो युवकों को रोका तो वह दोनों भागने लगे, फिर उन्हें पकड़ा गया। उनकी पहचान विजय पाटीदार निवासी मंदसौर और मोहम्मद शाहनवाज निवासी आजाद नगर के रूप में हुई। शाहनवाज की जेब से पाउडरनुमा पदार्थ, जिसे एएसआई रवि बट्टी और स्टाफ ने अनुभव के आधार पर एमडी (मेफेड्रोन ड्रग) पाया।
यह तौल करने पर 198 ग्राम था। इसे सील कर पाटीदार और शहनवाज को गिरफ्तार किया। एनडीपीएस एक्ट का केस किया। पूछताछ में इसमें पुलिस आरक्षक लखन गुप्ता और राजा उर्फ राजा बाबू खान निवासी मूसाखेड़ी इंदौर का नाम आया। इन्हें भी गिरफ्तार किया गया। आरोपी जो निर्दोष थे वह इस केस में करीब 10 माह जेल में रहे और फिर जमानत हुई।
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जांच में यूरिया निकला
इस जब्त ड्रग को अप्रैल 2025 में भोपाल सेंट्रल लैब (सीएफएसएल) भेजा गया। जहां जून 2025 में रिपोर्ट आई कि यह ड्रग नहीं है बल्कि पोटेशियम नाइट्रेट (यूरिया) है। इसके बाद दोबारा जांच के लिए हैदराबाद सीएफएसएल भेजा गया।
यहां दिसंबर 2025 में रिपोर्ट आई कि यह पोटेशियम नाइट्रेट है। यानी वहां भी जांच में यूरिया निकला। इसके बाद पुलिस ने केस खात्मा का आवेदन लगाया जहां विशेष न्यायाधीश नरसिंह बघेल ने इसे स्वीकार कर लिया।
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तीन-तीन IPS क्या कर रहे थे?
इस पूरे केस के समय थाना तेजाजीनगर के टीआई प्रोबेशन पर आए आईपीएस आदित्य सिंघानिया थे। वहीं आजादनगर एरिया के एसीपी आईपीएस करणदीप सिंह थे। जोन के डीसीपी आईपीएस विनोद कुमार मीणा थे। यानी फील्ड पुलिस अधिकारियों के ऊपर एक नहीं बल्कि तीन-तीन आईपीएस स्तर के अधिकारी मौजूद थे। इसके बाद भी इस केस में ड्रग की पूरी जांच नहीं की गई। बिना टेस्टिंग किट के जब्त पाउडर को खुशबू और स्वाद के आधार पर ड्रग बताकर केस दर्ज किया गया। निर्दोषों को जेल भेज दिया गया।
क्या प्रसिद्धी, अवार्ड के लिए यह किया ?
इस पूरे मामले में गंभीर आरोप लग रहे हैं। आरोपी बनाए गए निर्दोषों के अधिवक्ता रोहित सिरतुरे और नितिन पाराशर ने इसे द्वेष पूर्ण कार्रवाई बताया। साथ ही कहा कि इसमें मुआवजे की मांग और सही जांच, दोषितों को दंडित करने को लेकर हाईकोर्ट में याचिका लगाई है। इसमें सभी पुलिस अधिकारियों को इसमें पक्षकार बनाया गया है।
अधिवक्ता पाराशर ने कहा कि टीआई आदित्य सिंघानिया ने ट्रेनिंग पीरियड में अपनी ख्याति बढ़ाने के लिए यह किया गया। आरोपी बनाए गए शहनावज के खिलाफ उनकी पत्नी ने पुलिस को आवेदन दिया था जिस पर एसीपी करण सिंह ने शहनवाज को गिरफ्तार कराया। इसके बाद फिर इस ड्रग केस के लिए पूरी साजिश की गई, ताकि प्रसिद्धि मिल सके।
शहनवाज से ही इसमें आरक्षक लखन गुप्ता का नाम लिया गया और फिर उसे भी ड्रग केस में आरोपी बनाकर गिरफ्तार किया गया। वकील सिरतुरे ने कहा कि यह गंभीर लापरवाही का केस है। पहले भी पुलिस के पाकेट गवाह जैसे मामले सामने आ चुके हैं।
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साथियों ने बदला लेने के लिए मुझे फंसाया: आरक्षक
इस मामले में आरक्षक गुप्ता का कहना है कि मेरा इस केस से कोई लेना-देना नहीं था। कुछ दिन पहले ही मेरा एक अधिकारी से विवाद हुआ था क्योंकि उन्होंने मुझे गाली दी थी और मैंने आपत्ति ली थी। इसके कुछ दिन बाद ही मुझे ड्रग केस में आरोपी बनाकर गिरफ्तार कर लिया। यह सभी द्वेषपूर्ण तरीके से किया गया केस था।
इस मामले में 'द सूत्र' की तरफ से आईपीएस करनदीप सिंह और आदित्य सिंघानिया को फोन किया गया। मैसेज भी किया गया, लेकिन उनका जवाब नहीं आया।
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