70 करोड़ का भ्रष्टाचार: हाईकोर्ट का सख्त संदेश, MPMKVVCL के पूर्व AGM को नहीं मिली कोई राहत

Neel Tiwari | Jan 16, 2026, 16:15 IST
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जबलपुर हाईकोर्ट ने बिजली विभाग के रिटायर्ड अधिकारी पर 70 करोड़ की अनुपातहीन संपत्ति के आरोपों पर दायर याचिका खारिज की है। आरोपों की सच्चाई अब ट्रायल कोर्ट में तय होगी।

News in Short

  • लोकायुक्त जांच में आय से करीब 70 करोड़ रुपए अधिक संपत्ति पाए जाने का आरोप।
  • हाईकोर्ट ने FIR रद्द करने और डिस्चार्ज की मांग ठुकराई।
  • अभियोजन स्वीकृति को लेकर उठाए गए सभी तर्क अस्वीकार।
  • कोर्ट ने कहा- मंजूरी की वैधता ट्रायल में तय होगी।
  • अब आरोपी को ट्रायल कोर्ट में मुकदमे का सामना करना होगा।

News in detail

जबलपुर हाईकोर्ट से बिजली विभाग के एक वरिष्ठ रिटायर्ड अधिकारी को तगड़ा झटका लगा है। जस्टिस विवेक कुमार सिंह और जस्टिस अजय कुमार निरंकारी की डिविजनल बेंच ने मध्यप्रदेश विद्युत वितरण कंपनी लिमिटेड (MPMKVVCL) के पूर्व अतिरिक्त महाप्रबंधक (क्लास-I) प्रदीप चौधरी की याचिका को खारिज कर दिया।



यह मामला लोकायुक्त पुलिस द्वारा दर्ज उस FIR से जुड़ा है, जिसमें प्रदीप चौधरी पर अपने ज्ञात आय स्रोतों से लगभग 70 करोड़ रुपए अधिक की संपत्ति अर्जित करने का गंभीर आरोप है। लोकायुक्त ने साल 2014 में FIR दर्ज की थी और लंबी जांच के बाद 2022 में विशेष न्यायालय में चार्जशीट पेश की गई।





मंजूरी को लेकर क्या था विवाद?

याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में दलील दी थी कि उनके खिलाफ अभियोजन की मंजूरी एक अक्षम प्राधिकारी द्वारा दी गई है। उनका कहना था कि उन्हें सेवा से हटाने का अधिकार केवल कंपनी के प्रबंध संचालक (MD) को है। जबकि अभियोजन स्वीकृति संयुक्त निदेशक (Joint Director) के हस्ताक्षर से जारी हुई, जो उनके समकक्ष पद पर है। इसी आधार पर उन्होंने पूरी आपराधिक कार्यवाही को अवैध घोषित करने की मांग की थी।



हाईकोर्ट ने आदेश में दिया साफ रुख

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद स्पष्ट किया कि, भले ही आदेश पर संयुक्त निदेशक के हस्ताक्षर हों। लेकिन यह मंजूरी सक्षम प्राधिकारी यानी प्रबंध संचालक के अनुमोदन के बाद ही दी गई थी। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन स्वीकृति कोई महज औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह लोक सेवकों को निराधार और दुर्भावनापूर्ण मुकदमों से बचाने का सुरक्षा कवच है।



हालांकि, कोर्ट ने यह भी साफ किया कि उपलब्ध तथ्यों और दस्तावेजों के आधार पर इस मामले को झूठा या द्वेषपूर्ण नहीं कहा जा सकता। ऐसे में इस स्तर पर हाईकोर्ट का हस्तक्षेप न्यायोचित नहीं है।



482 CrPC की सीमाएं भी बताईं

डिविजनल बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के तहत निहित शक्तियों का प्रयोग किसी वैध और विधिसम्मत अभियोजन को बीच में रोकने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। कोर्ट ने यह भी कहा कि इस चरण पर कोई टिप्पणी आरोपी के बचाव को प्रभावित कर सकती है, इसलिए सभी मुद्दों का फैसला ट्रायल कोर्ट में साक्ष्यों के आधार पर ही होगा।



अब आगे क्या?

हाईकोर्ट द्वारा याचिका खारिज किए जाने के बाद अब यह स्पष्ट हो गया है कि प्रदीप चौधरी को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत चल रहे मुकदमे का सामना करना ही होगा। 70 करोड़ रुपए की कथित अनुपातहीन संपत्ति से जुड़े इस हाई-प्रोफाइल मामले की सच्चाई अब ट्रायल कोर्ट में गवाहों और दस्तावेजी सबूतों के आधार पर सामने आएगी।



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