सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद हरकत में आया जबलपुर प्रशासन, अब हट रहे मदन महल पहाड़ियों के अतिक्रमण

Neel Tiwari | Mar 07, 2026, 18:38 IST
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Photograph: (the sootr)

सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद जबलपुर प्रशासन जागा। मदन महल पहाड़ियों से अवैध कब्जे हटाने का काम शुरू हो गया है। प्रदेश के मुख्य सचिव ने जून 2026 की डेडलाइन दी है।

News in Short

  • मदन महल पहाड़ियों से अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद शुरू।
  • 2018 में हाईकोर्ट ने अतिक्रमण हटाने के खिलाफ दायर याचिका खारिज कर दी थी।
  • सुप्रीम कोर्ट ने भी 2018 में हस्तक्षेप से इनकार करते हुए अनुपालन रिपोर्ट मांगी थी।
  • 2019 से सुप्रीम कोर्ट लगातार स्टेटस रिपोर्ट मांगता रहा, लेकिन प्रशासन टालता रहा।
  • फरवरी 2026 में मुख्य सचिव की कोर्ट में पेशी के बाद कार्रवाई तेज हुई।

Intro

जबलपुर की ऐतिहासिक मदन महल पहाड़ियों पर वर्षों से फैले अतिक्रमण को हटाने की कार्रवाई आखिरकार शुरू हो गई है। प्रशासन इसे सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का पालन बता रहा है, लेकिन हकीकत यह है कि इस मामले को सालों तक टालने के बाद अब अदालत की सख्ती के चलते कार्रवाई की जा रही है।

करीब आठ साल से चल रहे इस कानूनी संघर्ष में हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक कई आदेश हुए, लेकिन प्रशासनिक सुस्ती के कारण जमीन पर काम नहीं हुआ। अब जब सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया और शीर्ष अधिकारियों को तलब किया, तब जाकर प्रशासन सक्रिय हुआ है।

News in detail

तीन दशक से लंबित है पहाड़ियों का अतिक्रमण विवाद

मदन महल की पहाड़ियां लंबे समय से अतिक्रमण के विवाद का केंद्र रही हैं। शहर के मास्टर प्लान में इस क्षेत्र को पर्यावरण पार्क, हरित क्षेत्र, उद्यान और सार्वजनिक उपयोग के लिए आरक्षित किया गया है। इसके बावजूद वर्षों में यहां बड़ी संख्या में अतिक्रमण हो गए। आपको बता दें कि हाईकोर्ट के द्वारा इस मामले में साल 1996 में ही स्पष्ट आदेश दे दिया गया था। उसके बाद सुप्रीम कोर्ट के लगातार निर्देशों के बाद भी यह अतिक्रमण बढ़ते ही चले गए।

दरअसल, इस इलाके से अतिक्रमण हटाने के आदेश पहली बार 1996 में दिए गए थे। इसके बाद 2012 में भी अदालत ने इस दिशा में कार्रवाई के निर्देश दिए। इसके बावजूद जमीन पर अतिक्रमण पूरी तरह खत्म नहीं हुआ और समय के साथ यह और बढ़ता गया।



2018 में हाईकोर्ट ने खारिज कर दी थी याचिका

साल 2018 में शांति बाई शर्मा और अन्य लोगों ने अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के खिलाफ मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि उन्हें जो पट्टे दिए गए हैं, वे उन्हें भूमि स्वामी का अधिकार देते हैं और उन्हें हटाया नहीं जा सकता।

लेकिन 22 अक्टूबर 2018 को हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने यह याचिका खारिज कर दी। अदालत ने स्पष्ट कहा कि मास्टर प्लान में आरक्षित सार्वजनिक भूमि को पट्टे के माध्यम से स्थायी स्वामित्व में नहीं बदला जा सकता। अदालत ने यह भी माना कि अतिक्रमण हटाना पूरी तरह से जनहित में है।

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सुप्रीम कोर्ट ने भी नहीं दी राहत

हाईकोर्ट से निराश याचिकाकर्ता सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। वहां भी उन्हें राहत नहीं मिली। 31 अक्टूबर 2018 को सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने विशेष अनुमति याचिका खारिज कर दी और कहा कि इस मामले में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता।

साथ ही अदालत ने हाईकोर्ट के आदेश के पालन की रिपोर्ट दो महीने के भीतर प्रस्तुत करने का निर्देश दिया। यही वह बिंदु था जहां से सुप्रीम कोर्ट की निगरानी शुरू हुई। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में स्वतः संज्ञान ले लिया।

2019 में सुप्रीम कोर्ट ने कलेक्टर को किया था तलब

जब आदेशों के बावजूद कार्रवाई नहीं हुई तो सुप्रीम कोर्ट ने 2019 में कड़ा रुख अपनाया। अदालत ने उस समय के जबलपुर कलेक्टर को अदालत में उपस्थित होने का निर्देश दिया था।

कलेक्टर की ओर से अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई की रिपोर्ट भी पेश की गई, लेकिन अदालत ने उसमें कई सवाल उठाए। कोर्ट ने पूछा कि अतिक्रमण चुनिंदा तरीके से क्यों हटाए जा रहे हैं और पूरी स्थिति पर शपथ पत्र दाखिल करने का निर्देश दिया।

बार-बार टलती रही स्टेटस रिपोर्ट

सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद राज्य सरकार और प्रशासन ने लंबे समय तक स्टेटस रिपोर्ट दाखिल नहीं की। अदालत में यह तर्क दिया जाता रहा कि इस मामले की निगरानी हाईकोर्ट भी कर रहा है।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि मामले की अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करना अनिवार्य है। इसके बावजूद रिपोर्ट जुलाई 2021 में जाकर दाखिल की गई, यानी लगभग दो साल बाद।

तीन साल तक और मामला ठंडे बस्ते में

2021 में स्टेटस रिपोर्ट दाखिल होने के बाद मामला लगभग तीन साल तक सुप्रीम कोर्ट में सूचीबद्ध ही नहीं हुआ। इस दौरान प्रशासन भी लगभग निष्क्रिय बना रहा। इस बीच अतिक्रमण कई बार चिन्हित तो किए गए लेकिन हटाने की कोई बड़ी कार्रवाई नहीं हुई और उल्टा कई जगह नए अतिक्रमण भी बढ़ते रहे। लगातार प्रशासन पर आरोप लगाते रहे की अतिक्रमण जिम्मेदारों की शह पर हुआ।

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सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य सचिव को किया तलब

फरवरी 2025 में जब मामला फिर अदालत में आया तो सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार के रवैये पर नाराजगी जताई। अदालत ने कहा कि कई अवसर दिए जाने के बावजूद आदेशों का पालन नहीं किया गया है। इसके बाद अदालत ने मध्य प्रदेश के मुख्य सचिव अनुराग जैन को अगली सुनवाई में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से उपस्थित रहने का आदेश दिया।

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मुख्य सचिव की पेशी के बाद प्रशासन सक्रिय

फरवरी 2026 में हुई सुनवाई के दौरान मुख्य सचिव अनुराग जैन ने अदालत को बताया कि सरकारी और ग्रीन बेल्ट भूमि से अतिक्रमण हटाने की पूरी प्रक्रिया जून 2026 तक पूरी कर ली जाएगी। SC ने इस संबंध में शपथ पत्र दाखिल करने के निर्देश दिए और मामले की अगली सुनवाई जुलाई 2026 के लिए तय कर दी।

कार्रवाई पर भी उठ रहे हैं सवाल

अब जब मदन महल की पहाड़ियों पर अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई शुरू हुई है तो उस पर भी सवाल उठने लगे हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि कार्रवाई केवल छोटे और कमजोर वर्ग के अतिक्रमणकारियों तक सीमित दिखाई दे रही है।

बताया जा रहा है कि ग्रीन बेल्ट की जमीन पर कई बड़े निर्माण भी मौजूद हैं। इस क्षेत्र में कुछ ऐसे भी निर्माण हैं जो खुद प्रशासन ने कराए है, साथ ही कुछ प्रसिद्ध धार्मिक स्थल भी यहां मौजूद है। लेकिन फिलहाल प्रशासन की कार्रवाई मुख्य रूप से झुग्गी और छोटे मकानों पर ही केंद्रित है।

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क्या सभी अतिक्रमण हटेंगे या होगी खानापूर्ति

मदन महल की पहाड़ियां शहर की प्राकृतिक धरोहर मानी जाती हैं और पर्यावरण संरक्षण के लिए अतिक्रमण हटाना जरूरी भी है। लेकिन सवाल यह है कि क्या प्रशासन हर तरह के अतिक्रमण के खिलाफ समान कार्रवाई करेगा या फिर यह अभियान केवल कागजी कार्रवाई बनकर रह जाएगा।

आने वाले महीनों में यह स्पष्ट हो जाएगा कि यह अभियान वास्तव में पहाड़ियों को अतिक्रमण मुक्त करने की गंभीर कोशिश है या फिर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद शुरू हुई एक दिखावटी मजबूरी भरी प्रशासनिक कवायद।

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