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आज (3 फरवरी) भारत में चंद्रग्रहण लगने जा रहा है। चंद्रग्रहण 3 मार्च को दोपहर 3:20 बजे शुरू होगा और शाम 6:46 बजे समाप्त होगा। इस दौरान देश के लगभग सभी बड़े मंदिरों के पट बंद रहते हैं। सूतक काल लगने के कारण देवी-देवताओं की पूजा भी रोक दी जाती है। लेकिन मध्यप्रदेश के खंडवा में एक बहुत ही अद्भुत मंदिर स्थित है।
यहां चंद्रग्रहण या सूर्य ग्रहण का कोई भी प्रभाव नहीं माना जाता है। इस मंदिर के द्वार श्रद्धालुओं के लिए हमेशा चौबीसों घंटे खुले रहते हैं। भक्त यहां बिना किसी रोक-टोक के दर्शन और पूजन कर सकते हैं।
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दादाजी धूनीवाले मंदिर की परंपरा
ये मंदिर संत दादाजी धूनीवाले महाराज को पूरी तरह समर्पित है। खंडवा स्थित इस दरबार में ग्रहण काल के नियम लागू नहीं होते। यहां बड़े दादाजी और छोटे दादाजी की समाधि के दर्शन निरंतर होते हैं। साल 1942 में छोटे दादाजी महाराज ने समाधि ली थी। उनका पार्थिव शरीर प्रयागराज कुंभ से खंडवा लाया गया।
सेवादार हर दिन की तरह समाधि का स्नान और श्रृंगार करते हैं। आरती और पूजन का सिलसिला यहां एक पल के लिए नहीं रुकता। ग्रहण के समय भी यहां का माहौल भक्ति और शक्ति से भरा रहता है। दूर-दराज से आए भक्त यहां श्रद्धा के साथ अपनी हाजिरी लगाते हैं।
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क्यों नहीं होता यहां ग्रहण का असर
मंदिर ट्रस्ट के मुताबिक, यहां छोटे दादाजी के बनाए नियम चलते हैं। उनके समय की प्रसिद्ध पुस्तक केशव विनय में इसका उल्लेख मिलता है। इसमें दादाजी धूनीवाले को भगवान दत्तात्रय का साक्षात स्वरूप माना गया है। भगवान दत्तात्रय ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों देवों के संयुक्त अवतार और गुरुओं के गुरु माने जाते हैं।
इनमें सभी देवी-देवताओं का वास एक साथ माना जाता है। परमात्मा के सामने सूर्य, चंद्र और नवग्रहों की शक्ति पूरक मानी जाती है। इसी कारण इस पवित्र स्थान पर ग्रहों के गोचर का प्रभाव नहीं पड़ता। यहां की आध्यात्मिक ऊर्जा भक्तों को हर बाधा से सुरक्षित रखती है।
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चमत्कारी कहानियां
दादाजी धूनीवाले महाराज के समय से ही यहां अखंड हवन की परंपरा चली आ रही है। ग्रहण में भी इस पवित्र हवन कुंड की अग्नि नहीं बुझती। धूनी माई की सेवा और दर्शन यहां लगातार जारी रहते हैं। मंदिर में भोग और भंडारे की व्यवस्था भी सामान्य दिनों जैसी रहती है।
ट्रस्टी सुभाष नागोरी बताते हैं कि यहां ग्रहण का सूतक नहीं लगता। भक्त बिना किसी संकोच के दरबार में आकर माथा टेक सकते हैं। यह स्थान करोड़ों लोगों की अटूट आस्था का बहुत बड़ा केंद्र है। चंद्र ग्रहण सूतक काल
दरबार में दिन भर में चार बार भव्य आरती का आयोजन होता है। समाधि पर चढ़ी पवित्र चादरें भी दिन में दो बार बदली जाती हैं। यहां की सबसे अद्भुत परंपरा अखंड चूल्हा है। इसकी अग्नि कभी नहीं बुझती। इसी चूल्हे पर भक्तों के लिए शाम का विशेष भोग तैयार होता है।
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