LokSabha Election: Congress-BJP का बढ़ा टेंशन, उम्मीदवार देंगे झटका !

मध्यप्रदेश में बसपा अगर चुनावी मैदान में उतरती है तो इसका नुकसान किसे होगा कांग्रेस को, बीजेपी को या दोनों को। तो, एक ही रटारटाया जवाब कि नुकसान कांग्रेस को होगा ये कहना गलत भी हो सकता है क्योंकि नुकसान बीजेपी को भी हो सकता है। आइए बताते हैं कैसे...

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Jitendra Shrivastava
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BHOPAL. मध्यप्रदेश लोकसभा चुनाव ( LokSabha Elections ) में अपनी मस्ती में मदमस्त हाथी जब चुनावी सड़क से गुजरेगा तब किसी रोंदेगा और किसके ताज का सफर आसान बनाएगा। चुनावी सीजन में इस सवाल के बहुत से मायने हैं। खासतौर से मध्यप्रदेश की राजनीति के संदर्भ में। वैसे ये हाथी फिलहाल सोया पड़ा है या सुस्त है। जिसकी चाल अब तक सियासी सड़क पर नजर नहीं आई है, लेकिन एक बार चिंघाड़ जरूर चुका है। अब अगर ये हाथी मध्यप्रदेश का रुख कर ही लेगा तो कमल का फूल माथे पर सजाएगा या हाथ थामेगा। ये देखना बहुत दिलचस्प होगा। क्योंकि बदले हुए सियासी सिनेरियो में तीसरी पार्टी की मौजूदगी कांग्रेस से ज्यादा अब बीजेपी को नुकसान पहुंचा सकती है। 

मायावती की देरी कहीं सही समय आने का इंतजार तो नहीं

हाथी से आप ये सो समझ ही गए होंगे कि बात बीएसपी यानी कि बहुजन समाज पार्टी की हो रही है। वैसे तो बहन मायावती की तरह उनका हाथी भी कुछ समय से सुस्त है। चुनावी घमासान शुरू होने से पहले ही मायावती ने बीजेपी और कांग्रेस दोनों से एक वाजिब दूरी बना कर रखी है। वो दूसरे विपक्षी दलों की तरह इंडिया गठबंधन का हिस्सा नहीं बनी और न ही अभी बीजेपी नीत एनडीए में शामिल हुई हैं। हो सकता है अभी तेल देखो तेल की धार देखो की तर्ज पर सही समय आने पर फैसला लेने का इंतजार कर रही हों। लेकिन पिछले दिनों ये साफ कर चुकी हैं कि उनकी पार्टी मध्यप्रदेश में पूरी 29 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ेगी। वो भी अकेले अपने दम पर। हालांकि, बसपा ने लोकसभा उम्मीदवारों की जो लिस्ट जारी की है उसमें अब तक मध्यप्रदेश का कोई नाम शामिल नहीं है। लेकिन ऐलान हुआ है तो गाहे बगाहे उनका हाथी सड़क पर उतर ही सकता है।

इस बार बीजेपी को भी बीएसपी से डरने की जरूरत है

फिलहाल ये बात करते हैं कि बसपा अगर चुनावी मैदान में उतरती है तो इसका नुकसान किसे भुगतना पड़ सकता है कांग्रेस को, बीजेपी को या दोनों को। इस बात को बहुत गहराई से सोच कर जवाब दीजिएगा। क्योंकि सियासी समीकरण और हालात दोनों काफी हद तक बदल चुके हैं। तो, एक ही रटारटाया जवाब कि नुकसान कांग्रेस को होगा ये कहना गलत भी हो सकता है। बीजेपी को भी बसपा की मौजूदगी नुकसान पहुंचा सकती है। अगर मैं ये कहूं कि यही वो पार्टी है जिसकी आमद से बीजेपी भी फिक्रमंद होती है और कांग्रेस भी खौफ खाती है तो भी कुछ गलत नहीं होगा। देखिए कांग्रेस के लिए सपा का टेंशन अब पूरी तरह खत्म हो चुका है। समाजवादी पार्टी गठबंधन में है और उसे एक लोकसभा सीट मिल चुकी है। अब समाजवादी पार्टी सिर्फ खजुराहो तक सिमट कर रह गई है। बाकी सीटों पर कांग्रेस को उसका डर नहीं है, लेकिन बीएसपी तनाव देने के लिए मौजूद है। हालिया चुनाव की बात छोड़ दें तो बीएसपी एक ऐसी पार्टी है जो बीते कुछ चुनाव में टफ फाइट दे चुकी है। खुद भले ही सीटें न जीती हों, लेकिन किसी न किसी पार्टी के टिकट जरूर काटे हैं। एक जनरल ट्रेंड यही रहा है कि बीएसपी के आने से कांग्रेस को खासा नुकसान उठाना पड़ता है, लेकिन जिस तरह से यूपी में मायावती की पार्टी ने टिकट दिए हैं उसे देखकर लगता है कि इस बार बीजेपी को भी बीएसपी से डरने की जरूरत पड़ जाएगी। अब इस नए ट्रेंड को समझने की कोशिश करिए। जिसे बीएसपी इस बार फॉलो कर रही है। 

बीएसपी ने इस बार भी सोशल इंजीनियरिंग से उम्मीदवार चुने हैं

मायावती की पार्टी बसपा ने पहली लिस्ट जारी की 12 मार्च को जिसमें चार उम्मीदवारों के नामों का ऐलान किया। ये चारों उम्मीदवार यूपी की चार लोकसभा सीट पर उतारे गए। ये चार उम्मीदवार हैं पीलीभीत से अनीश अहमद खान, मुरादाबाद से इरफान सैफी, कन्नौज से अकील अहमद पट्टा और अमरोहा से डॉ. मुजाहिद हुसैन। इन चारों नामों से ये साफ नजर आ रहा है कि मायावती का फोकस मुस्लिम वोटर्स पर ज्यादा है। इसका सीधा सा चुनावी अर्थ ये है कि मायावती अपने भतीजे अखिलेश यादव और राहुल गांधी की मुश्किलें बढ़ा सकती हैं। इन सीटों पर मुस्लिम मतदाता विभाजित हो सकता है। इस लिस्ट तक तो ठीक था, लेकिन दूसरी लिस्ट आते ही बीएसपी ने चौंका दिया। अब दोनों लिस्ट का आकलन करें तो बीएसपी अब तक यूपी में 14 उम्मीदवारों का ऐलान कर चुकी है। इन 14 उम्मीदवारों में से 5 मुस्लिम, 4 ब्राह्मण, 1 जाट, 1 गुर्जर, 1 ओबीसी, 1 क्षत्रिय और एक दलित उम्मीदवार हैं। ये साफ संकेत है इस बात का कि बीएसपी जिस तरह सोशल इंजीनियरिंग कर उम्मीदवार चुनती है। उसी तर्ज पर इस बार भी टिकट बांट रही है।

बीएसपी के सवर्ण उम्मीदवार उतारने से वोटर्स को विकल्प मिलेगा

अब एक बार फिर मध्यप्रदेश पर आते हैं। इस खबर की स्क्रिप्ट फाइनल होने तक बीएसपी ने मप्र में किसी उम्मीदवार के नाम का ऐलान नहीं किया था, लेकिन ये साफ कर चुकी है कि पार्टी इस बार सिर्फ मुस्लिम या दलितों तक सिमटी नहीं रहेगी। बीएसपी की निगाह इस बार सवर्ण प्रत्याशियों पर भी है। साथ ही जोर ये भी है कि पढ़े लिखे प्रत्याशी आगे आएं और बीएसपी से टिकट पाएं। अगर ऐसा होता है तो बीएसपी हर सीट पर सिर्फ कांग्रेस के ही वोट नहीं काटेगी बल्कि, बीजेपी के लिए भी खतरा बनेगी। जहां-जहां बीएसपी सवर्ण उम्मीदवार, ब्राह्मण उम्मीदवार चुनती है, वहां-वहां मतदाताओं को एक नया विकल्प मिल सकता है। खासतौर से कांग्रेस का कोर वोटर जो मजबूरी में बीजेपी में शिफ्ट हो रहा था। हो सकता है कि वो तीसरा विकल्प देख, बीजेपी में जाने की जगह बीएसपी को चुन ले और बीजेपी को इसका नुकसान उठाना पड़े। ये बात महज हवाबाजी नहीं हैं। हालिया चुनावों को छोड़ दें तो इससे पहले तक बीएसपी की धमक मध्यप्रदेश की चुनावी जमीन पर खूब सूनी जाती रही है। बीएसपी की ताकत को फिलहाल विधानसभा के चुनावी आंकड़ों से कुछ यूं समझिए कि साल 2008 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने 143, कांग्रेस ने 71 और बसपा ने सात सीटें जीती थीं। तब बीजेपी का वोट शेयर 37 प्रतिशत और कांग्रेस का 32 प्रतिशत था। बसपा ने 9 प्रतिशत वोट हासिल किए थे। अब तक के चुनाव इतिहास में ये बीएसपी सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन रहा था।

मायावती लोकसभा चुनावों में MP में लोहा मनवा चुकी हैं

मध्य प्रदेश के ग्वालियर, चंबल, बुंदेलखंड के साथ ही बघेलखंड क्षेत्र में बहुजन समाज पार्टी का काफी प्रभाव है। इन क्षेत्रों में बहुजन समाज पार्टी के प्रत्याशी कई बार दूसरी और तीसरी स्थिति में रहे हैं। उत्तर प्रदेश की सीमा से लगे हुए मध्य प्रदेश की विधानसभा सीटों में बहुजन समाज पार्टी काफी दमखम भी रखती है। साल 2018 के विधानसभा चुनाव में भिंड विधानसभा और दमोह जिले की पथरिया विधानसभा सीट से बहुजन समाज पार्टी के विधायक जीत कर आए थे। बाद में भिंड विधायक संजीव सिंह बीजेपी में शामिल हो गए। संजीव सिंह भले ही बीजेपी में शामिल हो गए हो, लेकिन भिंड क्षेत्र में आज भी बहुजन समाज पार्टी अपना दबदबा रखती है। 

ये तो हुई विधानसभा चुनाव की बात। मायावती की पार्टी लोकसभा चुनावों में भी मध्यप्रदेश में अपना लोहा मनवा चुकी हैं। 

BJP की आंधी में भी BSP ने वोटबैंक बचाए रखा 

विंध्य की चार लोकसभा सीटों में से सतना में एक बार और रीवा में तीन बार जीत दर्ज कर चुकी है। बीएसपी ने 1991 में रीवा सीट से भीम सिंह पटेल को टिकट दिया था। उनकी जीत हुई और वो पूरे देश में बीएसपी के पहले सांसद बने थे। उन्होंने सफेद शेर के नाम से मशहूर श्रीनिवास तिवारी को हराकर ये जीत हासिल की थी। इसके बाद साल 1996 और 2009 में भी बीएसपी ने यहां से जीत दर्ज की। सतना सीट पर बीएसपी को तीसरी बार में कामयाबी मिली थी। साल 1996 के चुनाव में बीएसपी ने सुखलाल कुशवाहा को मैदान में उतारा था। उनके सामने मैदान में पूर्व मुख्यमंत्री वीरेंद्र कुमार सखेलचा और अर्जुन सिंह मैदान में थे। दोनों को ही हराकर बीएसपी के कुशवाहा संसद में पहुंचे थे। बीएसपी की पुरानी जमीन एमपी में अब भी मजबूत है। बीजेपी की भयानक आंधी के बीच भी बीएसपी अपना वोटबैंक काफी हद तक बचाने में कामयाब रही है। पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस यूपी में एक सीट पर सिमटकर रह गई थी जबकी बीएसपी दस सीटें जीतने में कामयाब रही थी।

हाथी भी एकाध सीट खींचकर ले जा सकता है

हालांकि, इस बार मायावती की गरज जरा कमजोर है, लेकिन पार्टी अगर सही उम्मीदवार चुन लेती है तो मतदाताओं की आस का नया केंद्र बन सकती है। बीएसपी की आमद से कांग्रेस और बीजेपी दोनों के डर की वजह भी यही है कि वो कभी भी हैरान करने वाले नतीजे दे सकती है। कांग्रेस से नाउम्मीद और बीजेपी से नाखुश मतदाता बीएसपी में उम्मीद की नई किरण देख सकता है। ठीक वैसे ही जैसे यूपी में बीजेपी नेता सच्चिदानंद पांडेय को बीजेपी में घुटन महसूस हुई तो वो बीएसपी में शामिल हो गए और अब अयोध्या से चुनाव भी लड़ेंगे। कहने को तो ये सिर्फ एक ही उदाहरण है, लेकिन शुरुआत एक से ही होती है। रास्ता कोई एक दिखाता है। इसी तरह मतदाताओं को भी अगर हाथी के कदम दमदार लगे तो बीजेपी की आंधी के बीच भी वो एकाध सीट खींचकर ले जा सकता है।

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