एमपी भाजपा का मिशन 2028, कमजोर विधानसभा सीटों पर तैनात होंगे निगम-मंडलों के नए पदाधिकारी
Aman Vaishnav | May 22, 2026, 10:39 IST
mp bjp election 2028 strategy no home turf formula
मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव 2028 के लिए बीजेपी ने अभी से तैयारी शुरू कर दी है। निगम-मंडल के नए पदाधिकारियों को कमजोर और हारी हुई सीटों की जिम्मेदारी मिलेगी, वो भी बिना मनपसंद क्षेत्र के।
5 प्वाइंट में समझें क्या है पूरा मामला
- मध्य प्रदेश में साल 2028 में होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए बीजेपी ने रणनीति बनानी शुरू कर दी है।
- निगम-मंडल और प्राधिकरणों में नियुक्त नेताओं को हारी हुई सीटों को मजबूत करने का जिम्मा सौंपा जाएगा।
- पार्टी इस बार नो-होम-टर्फ का फॉर्मूला लागू करने जा रही है।
- किसी भी नेता को गृह क्षेत्र या उसकी पसंद की विधानसभा सीट काम करने के लिए नहीं दी जाएगी।
- शुरुआत में इन नेताओं को कैबिनेट या राज्यमंत्री का दर्जा भी नहीं मिलेगा।
आमतौर पर पार्टियां चुनाव से छह महीने या सालभर पहले एक्टिव होती हैं। वहीं बीजेपी ने साल 2026 में ही अपने नेताओं को मैदान में उतारने का मन बना लिया है।
हाल ही में राज्य के अलग-अलग निगम, मंडल और विकास प्राधिकरणों में जिन पदाधिकारियों की नियुक्तियां हुई हैं। इन्हें संगठन अब एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी देने जा रहा है।
इन सभी नेताओं को राज्य की उन विधानसभा सीटों पर भेजा जाएगा, जहां बीजेपी कमजोर है या पिछला चुनाव हार चुकी है।
हर एक पदाधिकारी को ऐसी एक-एक सीट गोद दी जाएगी, जहां उन्हें अगले ढाई साल तक रहकर पार्टी की जमीन मजबूत करनी होगी।
बीजेपी का नो-होम-टर्फ फॉर्मूला?
पार्टी ने यह फैसला एक खास वजह से लिया है। दरअसल जब नेताओं को उनके घर की या मनपसंद सीट मिल जाती है, तो वे खुद ही वहां से चुनाव लड़ने की दावेदारी ठोकने लगते हैं।
इससे उस सीट पर पहले से मौजूद पार्टी के नेताओं और नए नेता के बीच गुटबाजी का खतरा बढ़ जाता है। नया और बाहरी क्षेत्र मिलने से नेता अपने कम्फर्ट जोन से बाहर निकलेंगे।
साथ ही बिना किसी स्थानीय दबाव या भेदभाव के निष्पक्ष होकर संगठन के लिए काम कर पाएंगे।
मंत्री पद का दर्जा अभी नहीं, पहले काम करके दिखाओ
मुख्यमंत्री मोहन यादव ने 18 मई को सुशासन संस्थान में हुई ट्रेनिंग के दौरान इसके साफ संकेत भी दे दिए थे। उन्होंने नेताओं से कहा था कि कोई दर्जा मिले या ना मिले, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है।
नेताओं को पहले जमीन पर काम करके दिखाना होगा। इससे नेताओं की लीडरशिप निखारने के साथ-साथ पार्टी के प्रति उनकी वफादारी की भी परीक्षा होगी।
बड़े चेहरों की प्रतिष्ठा दांव पर
संगठन के कामों में भी देना होगा समय
राज्य वित्त आयोग के अध्यक्ष जयभान सिंह पवैया, अनुसूचित जनजाति आयोग के रामलाल रौतेल और महिला आयोग की अध्यक्ष रेखा यादव को संगठन के कामों में भी समय देना होगा।
वहीं विकास प्राधिकरणों के अध्यक्ष जैसे ग्वालियर के मधुसूदन भदौरिया, उज्जैन के रविन्द्र सोलंकी और जबलपुर के संदीप जैन को भी चुनाव की तैयारियों में लगाया जाएगा।
इसके अलावा निगम और मंडल के अध्यक्ष, जैसे वन विकास निगम के रामनिवास रावत और लघु उद्योग निगम के सत्येन्द्र भूषण सिंह को भी नई विधानसभाओं की जिम्मेदारी संभालनी होगी।
कुल मिलाकर सभी बड़े पदों वाले नेता अब नो होम टर्फ नीति के तहत सरकारी और संगठन दोनों कामों में जुटेंगे।
पार्टी को मजबूत बनाना सबकी जिम्मेदारी
भाजपा में कार्यकर्ताओं की ताकत बढ़ाई जाती है। साथ ही उनकी क्षमता के अनुसार ही उन्हें संगठन में जिम्मेदारी दी जाती है।
FAQ
- भाजपा का नो-होम-टर्फ फॉर्मूला क्या है?
नो-होम-टर्फ फॉर्मूले का मतलब है कि निगम-मंडल और प्राधिकरणों के नए पदाधिकारियों को काम करने के लिए उनका गृह क्षेत्र या उनकी पसंद की विधानसभा सीट नहीं दी जाएगी। उन्हें किसी दूसरे और चुनौतीपूर्ण क्षेत्र में जाकर पार्टी को मजबूत करना होगा।
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