प्रमोशन रुके, बड़े विभाग जूनियर अफसरों के भरोसे, करोड़ों के फैसले अब अस्थायी सिस्टम पर

Ramanand Tiwari | May 23, 2026, 23:53 IST
mp department
मध्य प्रदेश के तकनीकी विभागों में प्रशासनिक ढांचा अब प्रभारी मॉडल पर चल रहा है। बड़े पद नियमित अधिकारियों के बजाय जूनियर अफसरों के भरोसे हैं। इससे फाइल क्लियरेंस, टेंडर मंजूरी और करोड़ों की परियोजनाओं की मॉनिटरिंग पर असर बढ़ा है।

मध्य प्रदेश में सरकारी विभागों का प्रशासनिक ढांचा अब प्रभारी मॉडल पर चल रहा है। यह स्थिति केवल जल संसाधन विभाग तक सीमित नहीं है। PWD, नगरीय प्रशासन, नगर निगम, NBDA, RES और अन्य तकनीकी विभागों में भी बड़े पद नियमित अधिकारियों के बजाय अतिरिक्त प्रभार पर चल रहे हैं। लंबे समय से प्रमोशन अटके होने के कारण जूनियर अधिकारियों को वरिष्ठ पदों की जिम्मेदारी दी जा रही है। इससे फाइल क्लियरेंस, टेंडर मंजूरी, तकनीकी फैसलों और करोड़ों की परियोजनाओं की मॉनिटरिंग पर असर की चर्चा बढ़ गई है।



सिस्टम में बढ़ रहा वन मैन-टू पोस्ट मॉडल

प्रदेश के कई विभागों में एक ही अधिकारी दो-दो और तीन-तीन जिम्मेदारियां संभाल रहे हैं। कहीं कार्यपालन यंत्री अधीक्षण यंत्री का काम देख रहा है, तो कहीं अधीक्षण यंत्री को मुख्य अभियंता का अतिरिक्त चार्ज दिया गया है। सूत्रों के मुताबिक सरकार की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वरिष्ठ स्तर के पद लगातार खाली होते जा रहे हैं। लेकिन नियमित पदोन्नति प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पा रही। इसका असर अब प्रशासनिक फैसलों की गति पर दिखने लगा है।



इन विभागों पर असर ज्यादा

प्रमोशन रुकने और वरिष्ठ पद खाली होने का असर इन विभागों में ज्यादा दिखाई दे रहा है। इसमें शामिल हैं- लोक निर्माण विभाग, नगरीय प्रशासन विभाग, नगर निगम और विकास प्राधिकरण, NBDA और बड़ी प्रोजेक्ट एजेंसियां, ग्रामीण यांत्रिकी सेवा, जल संसाधन विभाग और सिंचाई और बांध परियोजनाएं। इन विभागों में करोड़ों की परियोजनाएं चल रही हैं, लेकिन कई जगह स्थायी तकनीकी नेतृत्व ही नहीं है।



प्रभारी अफसर क्यों बन रहे सरकार की मजबूरी?

करीब दस साल से विभागीय प्रमोशन समय पर नहीं हो पाए। सीनियरिटी विवाद, कोर्ट केस, आरक्षण और विभागीय आपत्तियों ने पूरी प्रक्रिया को उलझा दिया। अब सरकार के सामने दो विकल्प थे। या तो पद खाली छोड़ दिए जाएं या जूनियर अधिकारियों को अतिरिक्त प्रभार देकर सिस्टम चलाया जाए। सरकार ने दूसरा रास्ता चुना। लेकिन अब यही मॉडल विवाद की वजह बन रहा है।



बढ़ रहा असंतोष, अंदर ही अंदर नाराज हैं अफसर

सूत्र बताते हैं कि कई विभागों में सीनियर अधिकारियों को सुपरसीड कर जूनियर अफसरों को बड़े पदों का चार्ज दिया जा रहा है। इसी वजह से विभागों में अंदरूनी नाराजगी और खींचतान बढ़ रही है। कई मामलों में शिकायतें, प्रतिनिधित्व और कानूनी चुनौतियां भी सामने आने लगी हैं। अफसरों का कहना है कि लंबे समय तक “प्रभारी व्यवस्था” से सेवा संरचना कमजोर होती है और निर्णय प्रक्रिया पर भी असर पड़ता है।



dbb12838-ed8


करोड़ों के फैसले, लेकिन जिम्मेदारी अस्थायी

सबसे बड़ा सवाल वित्तीय अधिकारों को लेकर उठ रहा है। सरकार जिन अधिकारियों को प्रभारी मुख्य अभियंता या समकक्ष पद दे रही है उन्हें बड़े वित्तीय अधिकार भी दिए जा रहे हैं। इसमें टेंडर मंजूरी, प्रोजेक्ट अप्रूवल, तकनीकी स्वीकृति और भुगतान और बजट फैसले शामिल हैं। अब यह सभी अस्थायी व्यवस्था के तहत हो रहे हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि लंबे समय तक यह मॉडल चला तो जवाबदेही तय करना मुश्किल हो सकता है।



NBDA और बड़े प्रोजेक्ट विभागों में भी दबाव

प्रदेश में बड़ी नदी, बांध और शहरी विकास परियोजनाओं से जुड़े विभागों में भी अधिकारी संकट गहराता जा रहा है। NBDA जैसी एजेंसियों में तकनीकी और प्रशासनिक स्तर पर अनुभवी अधिकारियों की कमी का असर प्रोजेक्ट गति पर पड़ने की चर्चा है। सूत्रों का दावा है कि कई परियोजनाओं में निर्णय लेने की प्रक्रिया धीमी हुई है क्योंकि स्थायी पदस्थापन नहीं हो पा रहे।



43f5a0d1-fbe


प्रभारी मॉडल अब अस्थायी व्यवस्था नहीं

मध्य प्रदेश में तकनीकी विभागों की मौजूदा स्थिति यह संकेत दे रही है कि प्रशासनिक ढांचे की सबसे कमजोर कड़ी अब प्रमोशन और कैडर मैनेजमेंट बन चुकी है। सरकार फिलहाल अतिरिक्त प्रभार देकर व्यवस्था संभाल रही है लेकिन लंबे समय तक यही स्थिति बनी रही तो असर केवल अफसरशाही तक सीमित नहीं रहेगा।



इसका सीधा प्रभाव सड़कों, शहरी विकास, सिंचाई, बांध, जल प्रबंधन और इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं की गुणवत्ता और गति पर दिखाई दे सकता है। अपर मुख्य सचिव राजेश राजौरा का कहना है कि प्रदेश में लंबे समय से विभागीय पदोन्नति प्रक्रियाएं न्यायिक और प्रशासनिक कारणों से प्रभावित रही हैं। विभागों के कामकाज और परियोजनाओं की निरंतरता बनाए रखने के लिए आवश्यकतानुसार अधिकारियों को प्रभार सौंपे जाते हैं। यह व्यवस्था प्रशासनिक जरूरतों को देखते हुए की जाती है ताकि किसी भी स्तर पर काम प्रभावित न हो।



ये खबरें भी पढ़ें...

MP राज्यसभा चुनाव 2026: अब मचेगा बड़ा सियासी घमासान! BJP की तीसरी सीट पर नजर



तीन सीनियर IPS ऑफिसर्स को मिलेगा प्रमोशन, अगले कैबिनेट में मिल सकती है मंजूरी



सरकारी कर्मचारियों को प्रमोशन का अधिकार नहीं, पुरानी वैकेंसी भी नहीं देती गारंटी - सुप्रीम कोर्ट



SC-ST केस में आरोपी TI डेढ़ साल से फरार, लेकिन नौकरी जारी, प्रमोशन तक मिल गया





Tags:
  • मध्य प्रदेश
  • प्रमोशन
  • जल संसाधन विभाग
  • PWD
  • जल संसाधन