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Photograph: (the sootr)
BHOPAL.मध्यप्रदेश विधानसभा में लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग की अनुदान मांगों पर चर्चा के दौरान प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर कई गंभीर सवाल उठे। एंबुलेंस होने के बावजूद ड्राइवर नहीं, करोड़ों की मशीनें बिना ऑपरेटर पड़ीं, आयुष्मान योजना में गड़बड़ियों के आरोप और दवा खरीदी पर भ्रष्टाचार के मुद्दे ने बहस को केंद्र में ला दिया। सत्ता और विपक्ष दोनों ने अपनी-अपनी तरफ से सुझाव और आरोप रखे।
विधानसभा में गूंजे ये प्रमुख मुद्दे
- कई अस्पतालों में एंबुलेंस हैं, लेकिन ड्राइवर नहीं।
- डीजल के लिए बजट की कमी की शिकायत।
- आयुष्मान कार्ड से इलाज में अग्रिम राशि मांगने के आरोप।
- करोड़ों की मशीनें बिना ऑपरेटर वर्षों से बंद।
- दवा खरीदी में 20-30% भ्रष्टाचार के आरोप।
- नर्सिंग कॉलेजों की स्थिति और पुराने घोटालों का जिक्र।
- मेडिकल कॉलेजों के निर्माण में पात्रता को लेकर सवाल।
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“MBBS के बाद 2 साल ग्रामीण सेवा अनिवार्य हो”
कांग्रेस विधायक भंवर सिंह शेखावत ने सुझाव दिया कि एमबीबीएस की डिग्री तभी मिले जब डॉक्टर कम से कम दो साल ग्रामीण क्षेत्र में सेवा दें। उनका तर्क था कि गांवों में डॉक्टरों की भारी कमी है और इस शर्त से स्वास्थ्य सेवाओं में संतुलन आ सकता है। उन्होंने कहा कि सिर्फ भवन बनाने से अस्पताल बेहतर नहीं हो जाते, वहां पर्याप्त डॉक्टर, नर्स और स्टाफ भी होना चाहिए।
एंबुलेंस खड़ी, पर चलाने वाला नहीं
शेखावत ने सदन में कहा कि कई अस्पतालों में एंबुलेंस उपलब्ध हैं, लेकिन ड्राइवर नहीं हैं। कहीं डीजल के लिए राशि नहीं है। ऐसे में आपातकालीन सेवा का दावा जमीनी हकीकत से मेल नहीं खाता। उनका कहना था कि पांच साल की ऑडिट हो जाए तो पूरी तस्वीर साफ हो जाएगी।
आयुष्मान योजना: पहले पैसा, बाद में रिफंड?
आयुष्मान कार्ड के उपयोग को लेकर भी सवाल उठे। आरोप है कि अस्पतालों में पहले मरीजों से पैसा जमा कराया जाता है और बाद में योजना का भुगतान आने पर लौटाने की बात कही जाती है। विधायकों ने कहा कि अगर 94% कार्ड बन चुके हैं, तो लाभ भी बिना बाधा मिलना चाहिए। इसमें पारदर्शिता और निगरानी जरूरी है।
मशीनें करोड़ों की, ऑपरेटर नहीं
स्वास्थ्य ढांचे की एक बड़ी खामी यह बताई गई कि अस्पतालों में महंगी मशीनें तो हैं, लेकिन उन्हें चलाने के लिए प्रशिक्षित ऑपरेटर नहीं हैं। 6 करोड़ की मशीन छह साल तक उपयोग में नहीं आ सकी। सवाल यह है कि संसाधन होने के बाद भी सेवा क्यों नहीं मिल पा रही?
डॉक्टर सरकारी अस्पतालों में क्यों नहीं रुकते?
चर्चा के दौरान यह मुद्दा भी उठा कि डॉक्टर सरकारी अस्पतालों में लंबे समय तक काम क्यों नहीं करना चाहते। सुझाव आया कि केवल भवन निर्माण से व्यवस्था मजबूत नहीं होगी। पैरामेडिकल स्टाफ और नर्सिंग व्यवस्था की भी समीक्षा होनी चाहिए। नर्सिंग कॉलेजों के पुराने मामलों का भी जिक्र हुआ, जिनमें कई संस्थान न्यायालय के अधीन बताए गए।
प्राइवेट डॉक्टरों को सरकारी अस्पतालों में बुलाने का सुझाव
भाजपा विधायक अर्चना चिटनीस ने सुझाव दिया कि यदि सरकारी डॉक्टर बाहर जाकर गंभीर मरीजों का इलाज कर सकते हैं, तो प्राइवेट डॉक्टरों को भी सरकारी अस्पतालों में बुलाकर सेवाएं ली जा सकती हैं। उनका मानना है कि इससे डॉक्टरों की कमी कुछ हद तक दूर हो सकती है, लेकिन इसके लिए मजबूत मॉनिटरिंग सिस्टम जरूरी होगा।
दवा खरीदी और जहरीली सिरप पर आरोप
कांग्रेस विधायक ओमकार सिंह मरकाम ने दवा खरीदी में 20-30 प्रतिशत भ्रष्टाचार का आरोप लगाया। उन्होंने छिंदवाड़ा में जहरीली सिरप से बच्चों की मौत का मामला उठाते हुए कहा कि दवाओं की बिक्री पर निगरानी सरकार की जिम्मेदारी है। डिप्टी सीएम राजेंद्र शुक्ला ने स्पष्ट किया कि संबंधित दवा सरकार ने नहीं खरीदी थी। लेकिन विपक्ष का कहना था कि ड्रग इंस्पेक्टर और निगरानी तंत्र सरकार के अधीन हैं, इसलिए जवाबदेही तय होनी चाहिए।
आयुष्मान में टेस्ट का खर्च अलग?
मरकाम ने कहा कि आयुष्मान योजना में इलाज का प्रावधान है, लेकिन कई जांच (टेस्ट) का खर्च मरीजों से लिया जाता है। इससे गरीब परिवारों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ता है। उन्होंने मेडिकल कॉलेज निर्माण में पात्रता और जांच के मुद्दे भी उठाए।
पेस्टिसाइड्स पर भी चिंता
अर्चना चिटनीस ने प्रदेश में बढ़ते पेस्टिसाइड्स उपयोग को लेकर चिंता जताई। उनका कहना था कि यह केवल स्वास्थ्य विभाग का नहीं, बल्कि कृषि विभाग का भी विषय है। उन्होंने चेतावनी दी कि समय रहते नियंत्रण नहीं हुआ तो भविष्य में गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है।
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इमारत से ज्यादा ज़रूरी है सिस्टम
विधानसभा की चर्चा ने साफ कर दिया कि स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार के लिए सिर्फ बजट या भवन पर्याप्त नहीं हैं। जरूरत है-मानव संसाधन की नियुक्ति, पारदर्शी दवा खरीदी,आयुष्मान योजना की निगरानी की।
ग्रामीण क्षेत्रों में डॉक्टरों की उपलब्धता,उपकरणों के संचालन की जिम्मेदारी तय करना अब देखना यह होगा कि चर्चा के बाद जमीनी स्तर पर कितने ठोस कदम उठते हैं। क्योंकि सवाल केवल सिस्टम का नहीं, सीधे जनता की सेहत का है।
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