जज साहब ने बिना लिखित आदेश आरोपी को किया बरी, फिर हाईकोर्ट ने लगा दी क्लास
Neel Tiwari | May 01, 2025, 15:08 IST
jablpur hc
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने बिना लिखित आदेश आरोपियों को बरी करने पर एक सिविल जज की बर्खास्तगी को उचित ठहराया, इसे न्यायिक गरिमा का घोर उल्लंघन बताया।
MP News:न्यायपालिका की गरिमा और जवाबदेही को लेकर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक टिप्पणी करते हुए कहा है कि बिना लिखित आदेश के आरोपी को बरी करना न्याय नहीं, न्याय का मखौल है। यह टिप्पणी हाईकोर्ट ने उस सिविल जज की याचिका को खारिज करते हुए की, जिन्हें बिना निर्णय दर्ज किए आरोपियों को बरी करने के गंभीर आरोपों के चलते सेवा से बर्खास्त किया गया था।
खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि कोई भी न्यायिक अधिकारी केवल व्यक्तिगत परिस्थितियों या काम के बोझ के आधार पर अपने संवैधानिक दायित्वों से मुंह नहीं मोड़ सकता। यह न सिर्फ न्यायिक प्रणाली में जनता के विश्वास को डगमगाता है, बल्कि आरोपी, वादी और समाज – सभी के लिए अन्यायपूर्ण स्थिति पैदा करता है।
जज महेंद्र सिंह ताराम ने अपने पक्ष में तर्क दिया कि वे उस समय निजी समस्याओं से जूझ रहे थे और मानसिक दबाव के कारण उनसे गलतियां हुईं। उन्होंने यह भी कहा कि कुछ अन्य जजों को केवल वेतनवृद्धि रोकने की सजा दी गई, जबकि उन्हें सीधा नौकरी से निकाल दिया गया। लेकिन हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा यह कोई सामान्य लापरवाही नहीं, बल्कि न्यायिक दायित्व की खुली उपेक्षा है। नौकरी से निकालने का निर्णय सही है।
यह भी पढ़ें...डाबर का 100% फ्रूट जूस दावा गलत, FSSAI ने दिल्ली हाईकोर्ट में दी सफाई
यह मामला न केवल एक न्यायिक अधिकारी की चूक का उदाहरण है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि न्यायपालिका अपने आंतरिक आचरण और जवाबदेही को लेकर कितनी गंभीर है। कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि जज होना केवल अधिकार नहीं, अपार जिम्मेदारी भी है और उसमें ज़रा सी भी लापरवाही पूरे सिस्टम पर प्रश्नचिह्न लगा सकती है।
यह भी पढ़ें...गुटखा किंग किशोर वाधवानी पर हाईकोर्ट की 20 हजार की कास्ट, किया लॉ का मिसयूज
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का यह फैसला न्यायिक प्रशासन में पारदर्शिता और उत्तरदायित्व की मिसाल पेश करता है। यह संदेश स्पष्ट है – न्यायिक प्रक्रिया में लापरवाही की कोई जगह नहीं है, चाहे वह किसी भी स्तर का अधिकारी क्यों न हो।
एमपी हाईकोर्ट | MP High Court News
बिना आदेश पारित किए बरी करना गंभीर चूक
चीफ जस्टिस सुरेश कुमार कैत और जस्टिस विनय जैन की खंडपीठ ने पूर्व सिविल जज महेंद्र सिंह ताराम द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए साफ कहा कि वे सीरियस प्रोफेशनल मिसकंडक्ट यानी अनैतिक व्यवहार के दोषी हैं। न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत रिकॉर्ड के अनुसार, विजिलेंस निरीक्षण के दौरान यह उजागर हुआ कि साल 2012 में उन्होंने तीन आपराधिक मामलों में बिना कोई अंतिम आदेश लिखे आरोपियों को बरी कर दिया, और दो मामलों में बिना आदेश ही कार्यवाही स्थगित कर दी थी।
न्यायिक उत्तरदायित्व से किया गया खिलवाड़
हाईकोर्ट ने कहा– बर्खास्तगी का निर्णय पूरी तरह सही
यह भी पढ़ें...डाबर का 100% फ्रूट जूस दावा गलत, FSSAI ने दिल्ली हाईकोर्ट में दी सफाई
न्यायपालिका की गरिमा सर्वोपरि: हाईकोर्ट
यह भी पढ़ें...गुटखा किंग किशोर वाधवानी पर हाईकोर्ट की 20 हजार की कास्ट, किया लॉ का मिसयूज
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का यह फैसला न्यायिक प्रशासन में पारदर्शिता और उत्तरदायित्व की मिसाल पेश करता है। यह संदेश स्पष्ट है – न्यायिक प्रक्रिया में लापरवाही की कोई जगह नहीं है, चाहे वह किसी भी स्तर का अधिकारी क्यों न हो।
- मध्य प्रदेश की खबरें पढ़ने यहां क्लिक करें
- छत्तीसगढ़ की खबरें पढ़ने यहां क्लिक करें
- रोचक वेब स्टोरीज देखने के लिए करें क्लिक
एमपी हाईकोर्ट | MP High Court News
MP कर्मचारी प्रमोशन: 10 साल बाद पदोन्नति, अब 4 साल की छूट पर अटका मामला, राज्य कर्मचारी संघ ने सीएम मोहन यादव से की मांग
By Atul Dwivedi
एमपी भाजपा में 30 सितंबर को तीन दिग्गजों की एकसाथ आमद, 236 दिन बाद मिला प्रदेश संगठन महामंत्री
By Ramanand Tiwari
मध्य प्रदेश भाजपा में अब लक्ष्मण रेखा कौन खींचेगा? चंद्रशेखर की होगी असली परीक्षा
By Ramanand Tiwari
मध्य प्रदेश के किसानों को बड़ी राहत: मिनी ट्रैक्टर पर मिलेगी 50 प्रतिशत तक सब्सिडी, ऑनलाइन पोर्टल पर ऐसे करें आवेदन
By Jitendra Shrivastava
mp-top-news: खबरें काम की... ब्राह्मणों ने कभी शासन नहीं किया, नरोत्तम मिश्रा बोले खामोशी को कमजोरी न समझें
By Sanjay Dhiman
झाबुआ संयुक्त कलेक्टर अक्षय सिंह की नौकरी खतरे में, फर्जी जाति प्रमाणपत्र में ऐसे घिरे
By Sanjay Gupta
बस्तर में बाढ़ का जायजा लेने पहुंचे CM साय, प्रभावित परिवारों से मिले, 10 हजार रुपए अतिरिक्त सहायता की घोषणा
By Arun Tiwari