एमपी में पुलिस के भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाएगी 53 साल पुरानी CID की इंटरनल विजलेंस विंग!

Sanjay Sharma | Mar 31, 2026, 21:05 IST
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Photograph: (the sootr)

मध्य प्रदेश में पुलिस भ्रष्टाचार रोकने के लिए 53 साल पुरानी CID इंटरनल विजलेंस विंग फिर शुरू होगी। सीएम की मंजूरी के बाद दागी पुलिसवालों पर नकेल कसी जाएगी।

News in Short :

  • सिवनी और गुना में भ्रष्टाचार के मामलों के बाद विजलेंस विंग सक्रिय किया गया।
  • 1973 में गठित विजलेंस विंग को अब फिर से सक्रिय किया जा रहा है।
  • पुलिस भ्रष्टाचार की शिकायतें बढ़ रही हैं, जांच लोकायुक्त और ईओडब्ल्यू कर रहे हैं।
  • जांच और अभियोजन में देरी के कारण दोषी सजा से बच रहे हैं।
  • सिवनी और गुना में पैसे की वसूली से पुलिस महकमे को शर्मिंदगी झेलनी पड़ी।

Intro

BHOPAL. सिवनी और गुना जिलों में पुलिस के भ्रष्टाचार और करोड़ों की वसूली के खुलासे के बाद इस पर कसावट की तैयारी की जा रही है। वर्दी को दागदार कर रहे पुलिसकर्मियों पर अंकुश लगाने एक बार फिर इंटरनल विजलेंस विंग पर मंथन शुरू हो गया है। सीएम की स्वीकृति के बाद एक बार फिर इंटरनल विजलेंस विंग रिश्वतखोरी, अवैध गतिविधियों के जरिए कमाई करने वाले पुलिसकर्मियों की नकेल कसेगी। पंकज श्रीवास्तव स्पेशल डीजी सीईडी ने 1973 में गठित और अब निष्क्रिय पड़ी इस विंग को फिर सक्रिय करने का प्रस्ताव तैयार कर लिया है। इस विंग के लिए ईमानदार और साफ- सुथरे सर्विस रिकॉर्ड वाले पुलिस अधिकारी और जवानों की तैनाती की जाएगी।

News in Detail :

आमतौर पर पुलिस की ईमानदारी पर वैसे ही सवाल उठते हैं। रिश्वत की वसूली के साथ ही आपराधिक तत्वों से साठगांठ के मामलों की फेहरिस्त इंतनी लंबी है कि नाम गिनना भी मुश्किल है। बीते छह माह में सिवनी और गुना जिलों में करोड़ों की वसूली में पुलिस की भूमिका ने सरकार को हिला दिया है। पुलिस मुख्यालय में भी बदनामी के इन दागों ने हलचल मचा दी है। इसके साथ ही अब पुलिस महकमे में वसूलीबाज और रिश्वतखोरों पर शिकंजा कसने व्यवस्था बनाई जा रही है। महकमे की चिंता को देखते हुए सीआईडी अपनी 53 साल पुरानी विंग को सक्रिय करने जा रही है।

सीएम की सहमति का इंतजार

सीआईडी के स्पेशल डीजी पंकज श्रीवास्तव के निर्देशन में इंटरनल विजलेंस विंग को नया आकार देने का प्रस्ताव तैयार किया गया है। इंटरनल विजलेंस विंग को आधुनिक संसाधनों से लैस करते हुए उसे अधिकारसंपन्न बनाया जाएगा। इसके लिए विजलेंस थाने की व्यवस्था को भी मजबूत करने की योजना है। मुख्यमंत्री की सहमति मिलते ही सीआईडी की यह स्पेशल विंग भ्रष्टाचार में शामिल पुलिस अधिकारी से लेकर सिपाही तक कसावट करेगी। रिश्वत और आपराधिक तत्वों की मिलीभगत से काली कमाई करने वाले पुलिसकर्मियों पर केस दर्ज करने से लेकर जांच भी इसी यूनिट के हाथ में होगी।

फिर आकार लेगी विजलेंस विंग

मध्य प्रदेश में सीआईडी की इंटरनल विंग का गठन 1973 में हुआ था। साल 1982 में मध्य प्रदेश में लोकायुक्त की स्थापना के चलते पुलिस की यह इकाई धीरे- धीरे निष्क्रिय होती चली गई। साल 1989 में राज्य आर्थिक अपराध ब्यूरो जिसे अब ईओडब्ल्यु कहा जाता है उस)के अस्तित्व में आने के बाद सीआईडी की इंटरनल विंग ने काम बंद कर दिया। अब लोकायुक्त और ईओडब्ल्यु की कार्रवाईयों की प्रक्रिया और जांच में लग रहे समय को देखते हुए सीआईडी ने इंटरनल विजलेंस विंग को फिर सक्रिय करने का प्रस्ताव बनाया है।

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रिश्वतखोरी पर अंकुश की जरूरत

मध्य प्रदेश में पुलिसकर्मियों के रिश्वत के मामलों का ग्राफ बीते कुछ सालों में उछला है। इससे न केवल पुलिस महकमा दागदार हुआ है बल्कि सरकार पर भी बदनामी के छींटे गिरे हैं। ईओडब्ल्यू में साल 2025 में पुलिस अधिकारी से सिपाही स्तर तक 249 मामले पहुंचे थे। वहीं, लोकायुक्त पुलिस की छापेमारी में प्रदेश में सैंकड़ा भर पुलिसकर्मी और अधिकारी पकड़े गए हैं। लोकायुक्त और ईओडब्ल्यू की पकड़ में आए इन पुलिस जवान और अधिकारियों के पास करोड़ों की आय से अधिक संपत्ति भी मिली है। इन दोनों इकाइयों पर सरकारी विभागों से संबंधित मामलों की बढ़ती संख्या ने कार्रवाई की रफ्तार धीमी कर दी है।

बढ़ रहा पुलिस का भ्रष्टाचार

ईओडब्ल्यू के पास बीते पांच साल में 19775 शिकायतें पहुंची थी, जिनमें से 566 में केस दर्ज हुए हैं। आधी शिकायतों को जांच के बाद समाप्त किया गया है और बाकी पर जांच अब भी चल ही रही है। लोकायुक्त पर भी भ्रष्टाचार की शिकायतों का दबाव है। हर दूसरे दिन लोकायुक्त की संभागीय इकाइयों से लेकर प्रदेश मुख्यालय तक ढेरों शिकायतें आती है।

ईओडब्ल्यू-लोकायुक्त पर केस का भार

EOW के मामलों में 57 प्रतिशत में ही भ्रष्टाचारियों को सजा हुई है। हांलाकि जांच और अभियोजन स्वीकृति से लेकर फैसला आने में लगे समय का औसत साढ़े 13 साल से ज्यादा है। वहीं लोकायुक्त की जांच के बाद दर्ज मामलों में भी सालों तक अभियोजन स्वीकृति नहीं मिलने से केस एक से दो दशकों तक खींच रहे हैं। इसी देरी के कारण दोषी भी सजा से बचने में कामयाब हो जाते हैं। लोकायुक्त के 134 मामले कई सालों से अभियोजन स्वीकृति के इंतजार में कोर्ट ही नहीं पहुंच पाए हैं। ईओडब्ल्यू के पास भी 250 से ज्यादा मामलों को कोर्ट पहुंचाने के लिए विभागों की सहमति का इंतजार है।

पुलिस के भ्रष्टाचार के मामलों ने वर्दी को किया दागदार

सिवनी :

महाराष्ट से हवाला के करोड़ों रुपए ले जा रहे वाहन को रोककर सिवनी पुलिस ने 1.45 करोड़ रुपए वसूल किए थे। यह मामला पूरे प्रदेश में कई दिनों तक चर्चा में रहा था। इसमें एसडीओपी पूजा पांडेय, बंडोल थाना प्रभारी एसआई अर्पित भैराम सहित कुल 11 पुलिसकर्मियों पर केस दर्ज किया गया है। इस मामले में जिले के बड़े पुलिस अधिकारियों के नाम भी चर्चा में रहे थे और पुलिस महकमे से लेकर सरकार को भी शर्मिंदगी झेलनी पड़ी थी।

गुना :

गुजरात से आए वाहन से हवाला की एक करोड़ की रकम मिलने के बाद गुना के धरनावदा थाना में वसूली के आरोप सामने आए थे। मामला सोशल मीडिया पर उछलने के बाद डीआईजी ग्वालियर अमित सांघी ने गुना पहुंचकर थाना प्रभारी प्रभात कटारे, रुठियाई चौकी प्रभारी साजिद हुसैन सहित चार पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया था। इस केस में पुलिस द्वारा हवाला कारोबारी से 20 लाख की वसूली के आरोप लगे हैं। जिसकी जांच करैरा एसडीओपी आयुष जाखड़ कर रहे हैं।

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विधानसभा में भी गूंजा था मामला

मध्य प्रदेश विधानसभा में पेश हुए आंकड़े भी चिंताजनक हैं। कांग्रेस विधायक पंकज उपाध्याय और भंवर सिंह शेखावत के सवालों के जवाब में सरकार ने जो आंकड़े पेश किए हैं, वे पूरे प्रशासनिक सिस्टम की स्थिति उजागर करने वाले हैं। 2020 से 2025 के बीच ईओडब्ल्यू के 70 आपराधिक मामलों में फैसला हुआ है। इनमें 40 मामलों में सजा हुई और 30 में आरोपी बरी हो गए। इन 70 मामलों में फैसला आने में औसतन13 साल और 7 महीने लगे। कुछ मामलों में तो न्याय मिलने में तीन दशक लग गए।

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