MP की बिजली का छिपा मास्टरप्लान: 88 हजार MW का लक्ष्य, असली खतरा ग्रिड और खर्च का

Ramanand Tiwari | Sept 03, 2026, 08:45 IST
MP की बिजली का छिपा मास्टरप्लान
मध्यप्रदेश की अगले 10 साल की बिजली योजना में सबसे बड़ा बदलाव सोलर और स्टोरेज का है। क्षमता 88 हजार 206 मेगावॉट तक ले जाने का लक्ष्य है, लेकिन इसके पीछे हजारों करोड़ का निवेश, ग्रिड का विस्तार और रात की बिजली का इंतजाम बड़ी चुनौती बन सकता है।

मध्यप्रदेश में बिजली को लेकर अगले दस साल का जो मास्टरप्लान सामने आया है, उसकी असली कहानी सिर्फ सोलर बढ़ाने की नहीं है। योजना 2036-37 तक उत्पादन क्षमता 88 हजार 206 मेगावॉट तक ले जाने की है, जबकि मौजूदा क्षमता करीब 23 हजार 800 मेगावॉट बताई गई है।



यानी करीब 3.7 गुना क्षमता का लक्ष्य। लेकिन इस बड़े आंकड़े के पीछे जमीन, निवेश, ट्रांसमिशन, स्टोरेज और रात की बिजली का सवाल छिपा है। प्लान कागज पर बड़ा है, अब देखना है कि इसका बोझ आखिर किस पर पड़ेगा।



असली खबर सोलर नहीं, उसके पीछे का खर्च है

मप्र विद्युत नियामक आयोग ने 2025-26 से 2036-37 के लिए केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण की संसाधन पर्याप्तता योजना को मंजूरी दी है। पहली नजर में सबसे आकर्षक आंकड़ा 88 हजार 206 मेगावॉट का है। लेकिन इतनी क्षमता खड़ी करना सिर्फ प्लांट लगाने का काम नहीं है।



इसके लिए जमीन, निवेश, ट्रांसमिशन नेटवर्क, सब-स्टेशन, ग्रिड क्षमता और बिजली को जरूरत के समय उपलब्ध कराने की व्यवस्था भी चाहिए। यहीं से इस पूरे प्लान की असली चुनौती शुरू होती है।



दिन में बिजली की भरमार, रात में असली परीक्षा

भविष्य की सबसे बड़ी हिस्सेदारी सौर ऊर्जा की होगी। योजना में सोलर क्षमता 38 हजार 787 मेगावॉट तक ले जाने का लक्ष्य है। लेकिन सोलर का उत्पादन सूरज निकलने पर निर्भर है। शाम होते ही तस्वीर बदल जाती है।



यानी दिन में बिजली ज्यादा और रात में जरूरत के समय उत्पादन कम- इस अंतर को भरने के लिए स्टोरेज जरूरी होगा। इसीलिए 11 हजार 525 मेगावॉट बैटरी और पंप स्टोरेज का लक्ष्य रखा गया है। यही इस मास्टरप्लान का सबसे महंगा और सबसे महत्वपूर्ण टेस्ट बन सकता है।



11,525 MW स्टोरेज, लेकिन सवाल लागत का

बैटरी और पंप स्टोरेज सिर्फ क्षमता लिख देने से तैयार नहीं हो जाते। इन परियोजनाओं के लिए बड़ा निवेश, जमीन, तकनीक, ट्रांसमिशन कनेक्टिविटी और समय पर निर्माण जरूरी होगा।



यदि सोलर क्षमता तेजी से बढ़ गई लेकिन स्टोरेज और ग्रिड पीछे रह गए, तो दिन की अतिरिक्त बिजली का पूरा फायदा उठाना मुश्किल हो सकता है। इसलिए आने वाले वर्षों में सिर्फ यह देखना पर्याप्त नहीं होगा कि कितने सोलर प्लांट लगे। यह भी देखना होगा कि रात के पीक समय बिजली कहां से आएगी।



कोयला पीछे जाएगा, लेकिन खत्म नहीं होगा

योजना में कोयले की हिस्सेदारी मौजूदा करीब 53 प्रतिशत से घटकर 2036-37 तक करीब 26 प्रतिशत रहने का अनुमान है।



यह बदलाव ऊर्जा क्षेत्र की दिशा बदल सकता है। लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है। जब सोलर उत्पादन मौसम और दिन के समय पर निर्भर होगा, तब स्थिर बिजली आपूर्ति के लिए दूसरे स्रोतों की भूमिका बनी रहेगी।



इसलिए कोयले को पूरी तरह हटाना आसान नहीं होगा। बल्कि आने वाले वर्षों में सोलर, कोयला, पवन, जल विद्युत और स्टोरेज के बीच संतुलन बनाना बड़ी चुनौती होगी।



मांग भी बढ़ेगी, दबाव भी बढ़ेगा

प्लान का सबसे कम चर्चा वाला लेकिन अहम हिस्सा बिजली की बढ़ती मांग है। अनुमान के मुताबिक बिजली की मांग हर साल करीब 5.7 प्रतिशत की दर से बढ़ सकती है। 2036-37 तक पीक डिमांड करीब 36 हजार 418 मेगावॉट तक पहुंचने की संभावना है।



मतलब सरकार को सिर्फ बिजली बनानी नहीं है। उसे उस वक्त भी बिजली उपलब्ध रखनी होगी जब प्रदेश में सबसे ज्यादा मांग हो। यहीं सिस्टम की असली क्षमता सामने आएगी।



किसान, उद्योग और ई-वाहन बढ़ाएंगे दबाव

ई-वाहनों के चार्जिंग स्टेशन, सोलर पंप, सिंचाई योजनाएं और औद्योगिक विस्तार बिजली की मांग को और बढ़ा सकते हैं।



इसका फायदा भी है। पर्याप्त बिजली मिलने पर उद्योग और कारोबार को बेहतर आपूर्ति मिल सकती है। लेकिन मांग बढ़ने के साथ वितरण नेटवर्क पर दबाव भी बढ़ेगा।



अगर उत्पादन क्षमता बढ़ी और स्थानीय वितरण व्यवस्था उसी रफ्तार से नहीं बढ़ी, तो बड़ी उत्पादन क्षमता का फायदा उपभोक्ता तक पूरी तरह पहुंचना मुश्किल हो सकता है।



सस्ती बिजली का दावा अभी पक्का नहीं

सौर ऊर्जा की लागत लंबे समय में प्रतिस्पर्धी हो सकती है। इससे भविष्य में बिजली की लागत नियंत्रित रखने में मदद मिल सकती है। लेकिन उपभोक्ता का बिल सिर्फ बिजली बनाने की लागत से तय नहीं होता।



नई परियोजनाओं, स्टोरेज, ट्रांसमिशन नेटवर्क और वितरण ढांचे पर होने वाला खर्च भी महत्वपूर्ण है। इसलिए अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि 88 हजार 206 मेगावॉट की क्षमता बनने के बाद घरेलू उपभोक्ता का बिल निश्चित रूप से कम होगा।



निजी कंपनियां आएंगी, निगरानी भी जरूरी

इतनी बड़ी क्षमता तैयार करने में निजी कंपनियों के साथ समझौते अहम हो सकते हैं। यहीं सरकार के सामने एक और चुनौती खड़ी होगी- परियोजनाओं की समयसीमा, लागत और गुणवत्ता की निगरानी।



बड़े पावर प्रोजेक्ट अगर समय पर पूरे नहीं हुए तो मांग और उपलब्धता के बीच अंतर बढ़ सकता है। इसलिए इस मास्टरप्लान की सफलता का पैमाना सिर्फ घोषित निवेश नहीं, बल्कि समय पर तैयार हुई वास्तविक क्षमता होगी।



अतिरिक्त बिजली बेचने का सपना कितना आसान?

कम मांग वाले समय में अतिरिक्त बिजली दूसरे राज्यों को बेचने की संभावना भी है। उत्तर प्रदेश, बिहार और पंजाब जैसे राज्यों को बिजली बेचकर राजस्व कमाने का विकल्प सामने रखा जा सकता है।



लेकिन इसके लिए पहले अतिरिक्त बिजली उपलब्ध होनी चाहिए और उसे दूसरे राज्यों तक पहुंचाने के लिए पर्याप्त ट्रांसमिशन क्षमता भी होनी चाहिए। वरना बिजली उत्पादन बढ़ाने के बावजूद बिक्री की संभावनाएं सीमित रह सकती हैं।



असली लड़ाई 88 हजार MW की नहीं

मध्यप्रदेश के बिजली मास्टरप्लान का सबसे बड़ा संदेश सिर्फ इतना नहीं है कि प्रदेश में सोलर बढ़ेगा और कोयला घटेगा। असल लड़ाई बिजली बनाने से ज्यादा बिजली संभालने की होगी।



दिन में पैदा हुई सोलर बिजली को रात तक पहुंचाना, पीक डिमांड संभालना, ग्रिड मजबूत करना, निजी निवेश लाना और लागत को नियंत्रित रखना- यही अगले दस साल की असली परीक्षा है।



88 हजार 206 मेगावॉट का आंकड़ा सुनने में बड़ा है। अब सवाल यह है कि इस लक्ष्य के साथ बिजली का सिस्टम भी उतना ही बड़ा और मजबूत बनाया जाएगा या नहीं।



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