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मध्यप्रदेश के रीवा जिले में भगवान भोलेनाथ का एक ऐसा शिवालय है, जिसकी महिमा पूरे संसार में निराली है। रीवा किला परिसर के भीतर स्थित महामृत्युंजय मंदिर अपनी अद्भुत बनावट और आध्यात्मिक शक्ति के लिए जाना जाता है।
यहां विराजमान शिवलिंग विश्व का एकमात्र ऐसा शिवलिंग है, जिसमें 1001 छिद्र बने हुए हैं। मान्यताओं के मुताबिक, इस स्वयंभू शिवलिंग के दर्शन मात्र से ही मनुष्य की अकाल मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है।
ये मंदिर सोलहवीं शताब्दी में बघेल राजाओं द्वारा बनवाया गया था। महाशिवरात्रि से लेकर शिव पूजा तक, आज भी यहां आस्था का सैलाब उमड़ता है।
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शिवलिंग के बदलते रंग का रहस्य
मान्यताओं के मुताबिक, इस मंदिर में स्थापित शिवलिंग का रंग प्राकृतिक रूप से सफेद और श्वेत रहता है। सबसे हैरान करने वाली बात ये है कि यह शिवलिंग मौसम के साथ अपना रंग बदलता रहता है।
विश्व के किसी भी अन्य कोने में 1001 छिद्रों वाला ऐसा दिव्य शिवलिंग देखने को नहीं मिलता है। शिव पुराण में इस सफेद शिवलिंग की चर्चा विशेष रूप से महामृत्युंजय के रूप में की गई है। भक्तों का मानना है कि यहां जल चढ़ाने से जीवन के सभी बड़े संकट दूर हो जाते हैं।
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शिवलिंग की पौराणिक लोककथा
इस मंदिर की स्थापना के पीछे एक बहुत ही रोचक और पौराणिक लोककथा प्रचलित है। बघेल राजवंश के महाराजा विक्रमादित्य एक बार शिकार के लिए जंगल में निकले हुए थे। उन्होंने देखा कि एक बाघ एक चीतल का पीछा कर रहा था। लेकिन वो उसे मार नहीं पाया।
जैसे ही चीतल एक विशेष स्थान पर पहुंचा, बाघ उसके पास आकर भी वापस लौट गया। महाराजा ने उस स्थान पर खुदाई करवाई तो गर्भ से यह दिव्य सफेद शिवलिंग प्रकट हुआ। इसके बाद राजा ने उसी स्थान पर इस भव्य मंदिर का निर्माण करवाया था।
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रोगों से मुक्ति और महामृत्युंजय मंत्र की महिमा
महादेव ने महासंजीवनी महामृत्युंजय मंत्र का गुप्त रहस्य केवल माता पार्वती को ही बताया था। मान्यता है कि, रीवा के इस मंदिर में इस मंत्र का जाप करने से असाध्य रोगों से मुक्ति मिलती है।
सावन के महीने में यहां लाखों श्रद्धालु अपनी लंबी आयु की कामना लेकर पहुंचते हैं। माना जाता है कि महामृत्युंजय भगवान के आशीर्वाद से रीवा कभी किसी का गुलाम नहीं रहा। चाहे मुगलों का दौर हो या अंग्रेजों का, रीवा पर शिव की कृपा सदैव बनी रही।
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दिन में तीन बार विशेष पूजा
महामृत्युंजय मंदिर में प्रतिदिन भगवान शिव का तीन बार विशेष अभिषेक और श्रृंगार किया जाता है। सुबह की पहली आरती सूरज की किरणों के साथ साढ़े पांच बजे संपन्न होती है। इसके बाद दोपहर और फिर शाम को भव्य आरती के साथ मंदिर के पट बंद होते हैं।
महादेव को बेलपत्र, धतूरा, मदार के फूल और शहद अर्पित करना अत्यंत शुभ माना जाता है। महाशिवरात्रि पर्व और सोमवार के दिन यहां भक्तों की इतनी भीड़ होती है कि सुरक्षा के कड़े इंतजाम करने पड़ते हैं।
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