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मध्यप्रदेश के सरकारी महकमों में एक बड़ा घोटाला सामने आया है। यह घोटाला निजी सिक्योरिटी एजेंसी के जरिए किया गया था। एजेंसी ने करोड़ों का कांट्रैक्ट पाने के लिए एक आईपीएस अफसर के जाली हस्ताक्षर किए थे।
अफसर का निधन दो साल पहले हो चुका था। यह सिर्फ कागजों की हेराफेरी नहीं, बल्कि टैक्स चोरी भी है। इससे सरकारी खजाने को भी भारी नुकसान हुआ है।
2015 में मौत, फिर भी 2017 में हस्ताक्षर
एक अखबार में छपी खबर के अनुसार, इस पूरे घोटाले (Scam) की जड़ें 'क्लासिक सिक्योरिटी सर्विस एंड कंसलटेंट' नामक एजेंसी से जुड़ी हैं। एजेंसी के संचालक आरके पांडे को 12 मई 2012 को गृह विभाग से पसारा लाइसेंस जारी हुआ था।
इसकी वैधता 11 मई 2017 तक थी। खेल तब शुरू हुआ जब 2017 में लाइसेंस के नवीनीकरण की बारी आई। जांच में सामने आया कि 2017-2022 की अवधि वाले लाइसेंस पर तत्कालीन आईजी (लॉ एंड ऑर्डर) एसके पांडे के हस्ताक्षर थे।
वहीं, जबकि उनकी मृत्यु 2015 में ही हो चुकी थी। इसका मतलब, एक मृत अफसर के नाम पर फर्जी दस्तावेज तैयार किए गए थे। इस तरह से पांच साल तक सरकार को धोखा दिया गया।
14 दफ्तरों में पहरा और करोड़ों का भुगतान
फर्जी लाइसेंस के दम पर इस एजेंसी ने संस्कृति विभाग के 14 बड़े कार्यालयों की सुरक्षा का ठेका ले लिया। इनमें रवींद्र भवन, एमपी संस्कृति परिषद और पंजाबी साहित्य अकादमी जैसे अहम संस्थान शामिल थे।
2017 से 2022 तक एजेंसी ने न सिर्फ अपनी सेवाएं जारी रखीं, बल्कि इस दौरान 8 करोड़ रुपए से ज्यादा का भुगतान भी ले लिया थे। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि 2022 में लाइसेंस फर्जी पाए जाने के बाद गार्ड तो हटा दिए गए, लेकिन भुगतान की प्रक्रिया पर कोई सख्त रोक नहीं लगाई गई थी।
जीएसटी के नाम पर भी सरकारी खजाने में सेंध
जालसाजी का यह सिलसिला सिर्फ लाइसेंस तक नहीं थमा है। जांच में पता चला कि एजेंसी को 1 अगस्त 2017 को जीएसटी रजिस्ट्रेशन मिला था। वहीं, एजेंसी ने जुलाई 2017 से ही बिलों में 18 प्रतिशत टैक्स जोड़कर वसूली शुरू कर दी थी।
सितंबर 2017 से जून 2022 तक एजेंसी ने करीब 90 लाख 60 हजार रुपए जीएसटी के नाम पर वसूले थे। वहीं, यह राशि सरकारी खाते में जमा नहीं की गई थी। अनियमितताओं के चलते नवंबर 2022 में विभाग ने एजेंसी का जीएसटी नंबर रद्द कर दिया गया था।
कागजों पर फौज, हकीकत में सिर्फ 7 कर्मचारी
एजेंसी की कार्यप्रणाली का एक और चौंकाने वाला पहलू सामने आया है। जहां एक ओर 14 सरकारी दफ्तरों में सुरक्षा देने का दावा किया जा रहा था, वहीं ईएसआई पोर्टल पर एजेंसी के केवल 7 कर्मचारी ही रजिस्टर मिले हैं।
इसके साथ ही, संचालक आरके पांडे का ट्रैक रिकॉर्ड भी संदिग्ध पाया गया है। इनके खिलाफ भोपाल के विभिन्न थानों में 9 आपराधिक मामले पहले से दर्ज हैं।
विभाग की सफाई और आरोपी का पक्ष
इस मामले पर संस्कृति विभाग के संचालक एनपी नामदेव का कहना है कि दस्तावेजों की जांच जारी है। रिपोर्ट के आधार पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी। वहीं, आरोपी संचालक आरके पांडे ने इन आरोपों को बेबुनियाद बताया है।
उनका कहना है कि उन्होंने कोई फर्जी दस्तावेज नहीं तैयार किए हैं। उन्हें साजिश के तहत फंसाया जा रहा है। पांडे के मुताबिक, 2017 से 2022 तक जो भुगतान मिला, वह अन्य प्रकार की मैन पावर सप्लाई के बदले था।
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