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Photograph: (the sootr)
BHOPAL. सवाल सिर्फ पद का नहीं, फैसलों की ताकत का है प्रदेश में मानव अधिकार आयोग, महिला आयोग और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड जैसे अहम संस्थान लंबे समय से पूर्णकालिक अध्यक्ष के बिना चल रहे हैं। कहीं कार्यवाहक व्यवस्था है, तो कहीं सिर्फ सचिव के भरोसे काम चल रहा है। नतीजा यह कि हजारों शिकायतें अटकी हुई हैं और नीतिगत फैसलों की रफ्तार धीमी पड़ गई है।
क्यों जरूरी होता है अध्यक्ष?
अध्यक्ष किसी भी आयोग का सिर्फ औपचारिक चेहरा नहीं होता, बल्कि वही अंतिम निर्णय लेने की शक्ति रखता है। कार्यवाहक व्यवस्था में फाइलें तो आगे बढ़ती हैं, लेकिन बड़े और संवेदनशील मामलों में निर्णायक आदेश देना मुश्किल हो जाता है। इसी कारण इन संस्थाओं की प्रभावशीलता धीरे-धीरे कमजोर पड़ती दिख रही है। प्रदेश महिला आयोग में 2020 से अध्यक्ष की नियुक्ति नहीं हुई है।
कमलनाथ सरकार के दौरान शोभा ओझा अध्यक्ष थीं, लेकिन सरकार गिरने के बाद से यह पद खाली है। इस समय आयोग में 27 हजार से अधिक शिकायतें दर्ज हैं, जिन पर सुनवाई लंबित है। सचिव शिकायतों के आधार पर रिपोर्ट मंगाकर फाइल तैयार कर लेते हैं, लेकिन उन्हें सुनवाई और अंतिम निर्णय का अधिकार नहीं है। ऐसे में पीड़ित महिलाओं को न्याय मिलने की प्रक्रिया लंबी होती जा रही है।
मानव अधिकार आयोग: 4500 से ज्यादा मामले पेंडिंग
मानव अधिकार आयोग में अक्टूबर 2022 से पूर्णकालिक अध्यक्ष नहीं है। पूर्व अध्यक्ष जस्टिस जेके जैन का कार्यकाल समाप्त होने के बाद से यहां कार्यवाहक अध्यक्ष व्यवस्था संभाल रहे हैं। आयोग में 4500 से अधिक मामले लंबित बताए जा रहे हैं। नियमों के अनुसार आयोग में एक अध्यक्ष और दो सदस्य होना चाहिए, लेकिन फिलहाल एक सदस्य का पद भी लंबे समय तक खाली रहा। हाल ही में एपी सिंह को सदस्य नियुक्त किया गया है।
पूर्व कार्यवाहक अध्यक्ष मनोहर ममतानी के मुताबिक, कई मामलों में दो सदस्यों के बीच विचार-विमर्श से ही निर्णय संभव होता है। एक सदस्य के भरोसे काम करना कठिन हो जाता है।
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड: नीतिगत फैसलों पर असर
प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड में भी पिछले पांच वर्षों से स्थायी अध्यक्ष की नियुक्ति नहीं हो सकी है। कमलनाथ सरकार के दौरान नियुक्त अध्यक्ष को हटाए जाने के बाद से यह पद खाली है।
सदस्य सचिव अच्युतानंद मिश्रा के सेवानिवृत्त होने के बाद उन्हें संविदा पर रखा गया है। पर्यावरण और प्रदूषण से जुड़े मामलों में अध्यक्ष की भूमिका बेहद अहम होती है, क्योंकि वही नीति निर्माण औरतकनीकी निर्णयों में सरकार का मार्गदर्शन करता है।
अध्यक्ष नहीं होने से कई नीतिगत फैसले प्रभावित
महिला आयोग में 27,000 से अधिक शिकायतें लंबित। मानव अधिकार आयोग में 4,500+ मामले पेंडिंग। महिला आयोग में 2020 से अध्यक्ष का पद खाली है। मानव अधिकार आयोग में अक्टूबर 2022 से पूर्णकालिक अध्यक्ष नहीं है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड में लगभग 5 वर्षों से स्थायी अध्यक्ष नहीं,कई संस्थान कार्यवाहक व्यवस्था पर निर्भर है।
व्यवस्था कब होगी दुरुस्त?-
इन तीनों संस्थाओं का सीधा संबंध आम जनता के अधिकार, सुरक्षा और पर्यावरण से है। जब नेतृत्व ही स्थायी नहीं होगा, तो फैसलों की गति और गुणवत्ता दोनों प्रभावित होंगी।
अब सवाल यह है कि सरकार इन अहम संस्थानों में पूर्णकालिक नियुक्तियां कब तक करेगी, ताकि लंबित मामलों का तेजी से निपटारा हो सके और संस्थाओं की साख बहाल हो सके।
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