समझें क्या है पूरा मामला...
- महिला एवं बाल विकास विभाग में नोटिस को लेकर विवाद खड़ा हुआ है।
- आयुक्त ने एक ही तारीख में 62 अफसरों को नोटिस भेजा है।
- निलंबित अफसर और डायरेक्टरेट में पदस्थ अफसर को भी नोटिस मिला है।
- अफसरों ने इसे हड़ताल के बदले की कार्रवाई बताया है।
- आयुक्त ने आरोप को गलत बताते हुए इसे रूटीन प्रक्रिया कहा है।
मध्य प्रदेश के महिला एवं बाल विकास विभाग में इन दिनों बड़ा विवाद चल रहा है। विभाग की आयुक्त निधि निवेदिता ने एक ही तारीख और एक जैसी भाषा में 62 अफसरों को नोटिस थमा दिया है। इस जल्दबाजी में निलंबित अफसर और डायरेक्टरेट में पदस्थ अफसर को भी नोटिस मिल गया है। अफसरों में इसे लेकर नाराजगी साफ दिख रही है। मामला अब राज्य स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है।
नोटिस को लेकर क्या विवाद है
विभाग में 62 अधिकारियों को एक साथ नोटिस जारी करने पर सवाल उठे हैं। सभी नोटिस एक ही तारीख के हैं और भाषा भी लगभग एक जैसी है। अधिकारियों का कहना है कि यह महज इत्तेफाक नहीं हो सकता। उनका आरोप है कि यह नोटिस जानबूझकर एक साथ भेजे गए हैं। इससे उनके बीच डर का माहौल बनाने की कोशिश बताई जा रही है।
हड़ताल के बाद भेजे गए नोटिस
अधिकारियों का दावा है कि यह पूरा मामला हड़ताल से जुड़ा है। 17 और 18 अगस्त को अधिकारियों ने संयुक्त निदेशक के खिलाफ हड़ताल की थी। इसके ठीक बाद 20 अगस्त को विभाग के व्हाट्सएप ग्रुप डीपीओ ओनली पर नोटिस डाल दिए गए। सभी नोटिस एक साथ ग्रुप में भेजे गए। अधिकारियों को शक है कि यह बदले की कार्रवाई है। आयुक्त ने हालांकि इस आरोप को पूरी तरह गलत बताया है।
निलंबित अफसर को भी नोटिस
जल्दबाजी में निलंबित अधिकारी दिनेश दुबे को भी नोटिस जारी हो गया। इसी तरह संचालनालय में पदस्थ अधिकारी ललित डेहरिया का नाम भी नोटिस सूची में आ गया। यह दोनों मामले विभाग की लापरवाही की तरफ इशारा करते हैं। इससे साफ है कि नोटिस भेजने से पहले पूरी जांच नहीं की गई। दमोह जिले में तो और भी अजीब स्थिति सामने आई है। वहां बिना नाम के ही नोटिस जारी कर दिया गया। यानी विभाग को यह भी पता नहीं कि दमोह में जिला कार्यक्रम अधिकारी कौन है।
राजपत्रित अधिकारी संघ का पक्ष
राजपत्रित अधिकारी संघ से जुड़े सुरेश तोमर ने भी इस मामले पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि 12 अगस्त को डिस्पैच बताए गए नोटिस पहले किसी को नहीं मिले थे। न ई-मेल पर आए और न ही विभागीय पोर्टल पर दिखे। तोमर के मुताबिक नोटिस शौचालय निर्माण से जुड़े मामलों को लेकर हैं। जबकि शौचालय निर्माण की पूरी जिम्मेदारी संबंधित निर्माण एजेंसी की होती है। संघ ने यह भी सवाल उठाया कि नोटिस में सर्विस रूल का जिक्र तक नहीं है। संघ का कहना है कि क्लास वन अधिकारियों पर दंडात्मक कार्रवाई का अधिकार आयुक्त के पास नहीं है।
आयुक्त ने क्या सफाई दी
विभाग की आयुक्त निधि निवेदिता ने पूरे मामले पर अपनी बात रखी है। उनका कहना है कि विभाग की योजनाओं और कार्यक्रमों का रिव्यू रूटीन में होता रहता है। यदि तय लक्ष्य के मुताबिक काम नहीं होता तो नोटिस जारी किए जाते हैं। आयुक्त के मुताबिक उनके कार्यकाल में पहले भी कई बार नोटिस जारी हो चुके हैं। इनमें 2 मार्च 2026, 15 मई, 2 जून, 29 जून और 17 जुलाई 2026 शामिल हैं। ताजा नोटिस भी इसी सिलसिले की अगली कड़ी है।
किन मुद्दों पर हुआ रिव्यू
आयुक्त आईएएस निधि निवेदिता ने बताया कि एसएनसीयू (Sick Newborn Care Unit) में कम स्कोर वाले मामलों की समीक्षा की गई है। पोषण अभियान और एनएफएचएस (National Family Health Survey) के तहत कम्युनिटी बेस्ड इवेंट्स की भी जांच हुई है। इसके अलावा बकरी, भैंस और भारत सरकार से जुड़े खर्च का भी रिव्यू किया गया है। आयुक्त के मुताबिक कई बार निर्देशों के बाद भी तय काम पूरा नहीं होता। ऐसे मामलों में पूछताछ की जाती है, जो पूरी तरह रूटीन प्रक्रिया है।
शौचालय निर्माण पर आयुक्त की सफाई
आयुक्त ने शौचालय निर्माण से जुड़े नोटिस पर भी जवाब दिया है। उनके मुताबिक यह नोटिस काम की प्रगति देखने के बाद ही जारी किए गए हैं। विभागीय मॉनिटरिंग में कमी पाए जाने पर ही कार्रवाई हुई है। आयुक्त ने कहा कि निर्माण भले ही कोई दूसरी एजेंसी करा रही हो। लेकिन इससे मैदानी अधिकारियों की जवाबदेही खत्म नहीं होती। उनका कहना है कि योजनाओं की समयबद्ध प्रगति सुनिश्चित करना जरूरी है। आयुक्त ने साफ कहा कि कर्मचारी आंदोलन और रूटीन कार्रवाई को जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए।
आगे क्या हो सकता है
फिलहाल विभाग में यह विवाद थमता नजर नहीं आ रहा है। अधिकारी संघ इस मामले में आगे भी सवाल उठा सकता है। वहीं आयुक्त अपने रुख पर कायम हैं और इसे प्रक्रिया का हिस्सा बता रही हैं। आने वाले दिनों में इस मामले में और स्पष्टता सामने आ सकती है। कर्मचारियों की नजर अब विभाग के अगले कदम पर टिकी है।
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