नर्मदा का पानी एमपी के हिस्से में, फिर भी पूरी क्षमता का उपयोग क्यों नहीं?
समझें क्या है पूरा मामला
- मध्य प्रदेश को 18.25 एमएएफ नर्मदा जल मिला है।
- अभी करीब 10 एमएएफ पानी उपयोग में लिया जा रहा है।
- नर्मदा जल उपयोग बढ़ाने पर सरकार काम कर रही है।
- मिशन के लिए करीब 40 परियोजनाएं तैयार हैं।
- 2031 तक पूरे जल उपयोग का लक्ष्य तय है।
मध्यप्रदेश के हिस्से में नर्मदा का सबसे बड़ा जल हिस्सा आया, लेकिन उसे पूरी तरह इस्तेमाल करने की कहानी अभी अधूरी है। राज्य करीब 10 एमएएफ पानी का ही उपयोग कर पा रहा है, जबकि आवंटन 18.25 एमएएफ का है। अब सरकार ने इस पुराने अंतर को खत्म करने के लिए 2031 की समयसीमा तय की है। इसके लिए करीब 40 परियोजनाओं को आगे बढ़ाया जा रहा है। यानी अब सवाल पानी के आवंटन का नहीं, उसे खेत तक पहुंचाने वाली व्यवस्था की रफ्तार का है।
नर्मदा का हिस्सा बड़ा
1979 में नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण के फैसले के तहत चार राज्यों के बीच उपयोग योग्य पानी का बंटवारा हुआ था। मध्यप्रदेश को 18.25 एमएएफ का सबसे बड़ा हिस्सा मिला।
इसके बावजूद चार दशक से ज्यादा समय बाद भी राज्य अपने पूरे आवंटन को उपयोग में नहीं ला सका है। मौजूदा उपयोग करीब 10 एमएएफ बताया जा रहा है।
यही अंतर अब सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। पानी उपलब्ध होने के बावजूद उसका पूरा फायदा तभी मिलेगा, जब उसे सिंचाई नेटवर्क और जरूरी ढांचे के जरिए जमीन तक पहुंचाया जा सके।
अब परियोजनाओं की रफ्तार पर नजर
सरकार ने करीब 40 परियोजनाओं को 2031 के लक्ष्य से जोड़ा है। इनमें 36 परियोजनाओं की लागत 20 हजार करोड़ रुपए से अधिक बताई गई है। कई योजनाओं में 60 से 70 प्रतिशत तक काम होने का दावा है। वहीं आठ परियोजनाओं के टेंडर भी आगे बढ़ाए जाने हैं।
कागज पर यह पूरा प्लान बड़ा दिखाई देता है। लेकिन चुनौती यह है कि जिन परियोजनाओं से पानी का उपयोग बढ़ना है, वे तय समय में पूरी होकर वास्तव में पानी पहुंचाने की स्थिति में आएं।
150 परियोजनाओं का नेटवर्क
नर्मदा घाटी से संबंधित अलग-अलग विभागों की करीब 150 परियोजनाएं शुरू की गई हैं। इनमें नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण की 72 जल परियोजनाएं शामिल हैं। इनका उद्देश्य नए इलाकों में सिंचाई पहुंचाने के साथ नर्मदा जल के राज्य के हिस्से का अधिकतम उपयोग करना है। लेकिन परियोजनाओं की संख्या अपने आप में सफलता की गारंटी नहीं है। अंतिम कसौटी यही होगी कि निर्माण पूरा होने के बाद पानी कितनी जमीन तक और कितनी नियमितता से पहुंचता है।
चार बड़े क्षेत्रों में काम का खाका
नर्मदा से जुड़ी योजनाओं को अपर नर्मदा, रानी अवंतीबाई लोधी सागर, इंदिरा सागर और निचली नर्मदा क्षेत्रों में आगे बढ़ाया जा रहा है। जहां सामान्य नहरों से पानी पहुंचाना कठिन है, वहां माइक्रो और लिफ्ट सिंचाई मॉडल पर जोर है।
इंदौर क्षेत्र में 53 माइक्रो सिंचाई परियोजनाओं में 24 पूरी होने की जानकारी दी गई है। 11 ओपन चैनल परियोजनाएं भी पूरी बताई गई हैं। इन योजनाओं के जरिए करीब 31.75 लाख हेक्टेयर भूमि को सिंचाई सुविधा देने का लक्ष्य रखा गया है।
करोड़ों की परियोजनाएं, बड़ा दांव
अपर नर्मदा बहुउद्देश्यीय परियोजना की अनुमानित लागत करीब 7,500 करोड़ रुपए है और इससे 1.05 लाख हेक्टेयर सिंचाई क्षमता प्रस्तावित है। राघवपुर परियोजना पर करीब 5,300 करोड़ और बसानिया परियोजना पर करीब 3,900 करोड़ रुपए खर्च होने हैं।
मां रेवा माइक्रो लिफ्ट परियोजना से 45 हजार हेक्टेयर और धार माइक्रो लिफ्ट परियोजना से 38 हजार हेक्टेयर सिंचाई क्षमता विकसित करने का लक्ष्य है। इतने बड़े निवेश के बीच समय पर काम पूरा होना इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि देरी का मतलब सिर्फ समय बढ़ना नहीं, बल्कि अपेक्षित सिंचाई लाभ का आगे खिसकना भी है।
नई योजनाएं भी कतार में
वर्ष 2024-25 में नर्मदा कछार में नौ नई परियोजनाओं के लिए करीब 11,645 करोड़ रुपए की योजना सामने रखी गई थी। इनसे 3.51 लाख हेक्टेयर अतिरिक्त सिंचाई क्षमता विकसित करने का लक्ष्य है।
यानी सरकार पुराने प्रोजेक्ट के साथ नए इलाकों को भी नेटवर्क में जोड़ने की दिशा में आगे बढ़ रही है। अब निगाह इस बात पर रहेगी कि नई योजनाएं पुराने अधूरे काम का बोझ बढ़ाती हैं या वास्तव में नर्मदा जल के उपयोग का अंतर कम करती हैं।
एनवीडीए के सदस्य इंजीनियर धन्नालाल वर्मा के मुताबिक करीब 40 परियोजनाओं पर काम चल रहा है और आठ के टेंडर जल्द आगे बढ़ेंगे। उनके अनुसार बड़ी अड़चन नहीं आई तो 2031 तक MP अपने 18.25 एमएएफ हिस्से के पूरे उपयोग की स्थिति में पहुंच सकता है।
2031 का लक्ष्य अब असली कसौटी
सरकार के सामने अब समय सीमित है। टेंडर, भूमि, निर्माण, तकनीकी मंजूरी और परियोजनाओं की लागत—हर मोर्चे पर रफ्तार बनाए रखना जरूरी होगा। क्योंकि दशकों पहले पानी का हिस्सा तय हो गया था। अब जिम्मेदारी उस हिस्से को वास्तविक उपयोग में बदलने की है।
नतीजा पानी की बूंद से तय होगा
नर्मदा परियोजनाओं का असली असर फाइलों में दर्ज लागत या परियोजनाओं की संख्या से नहीं, बल्कि खेत तक पहुंचे पानी से दिखाई देगा।
अगर परियोजनाएं समय पर पूरी होती हैं तो सिंचाई का दायरा बढ़ सकता है और उन क्षेत्रों को फायदा मिल सकता है जहां अभी पानी की पहुंच सीमित है। लेकिन यदि टेंडर, निर्माण या दूसरी अड़चनों के कारण समय खिसका तो 2031 का लक्ष्य भी आगे जा सकता है।
इसलिए मिशन 2031 अब सिर्फ विकास परियोजनाओं का पैकेज नहीं है। यह सरकार की क्रियान्वयन क्षमता और जवाबदेही की परीक्षा भी है कि मध्यप्रदेश अपने हिस्से के नर्मदा जल को आखिर कब पूरी तरह जमीन तक पहुंचा पाता है।
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