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Photograph: (the sootr)
थक गया हूं अपनी ही जिंदगी की कशमकश से,
ऐ मौत! तू ही बता, क्या यही है मुकाम मेरा?
ये चंद पंक्तियां किसी कवि सम्मेलन की नहीं थीं, न ही किसी साहित्यिक पत्रिका की भूमिका। ये वे शब्द थे, जो एक युवा ने अपने सोशल मीडिया स्टेटस पर लिखे थे। मुझे थोड़ी चिंता हुई तो मैंने उसे फोन किया। उधर से जवाब आया कि अंकल, सब चंगा है।
फोन कट गया, लेकिन मेरे भीतर एक सवाल देर तक गूंजता रहा। अगर सब चंगा है तो मौत से यह संवाद क्यों? अगर जिंदगी ठीक चल रही है तो यह हताशा क्यों है भाई?
यहीं से आज के समाज की सबसे खतरनाक सच्चाई सामने आती है। हम एक ऐसी पीढ़ी तैयार कर चुके हैं, जो बाहर से ऑल इज वेल दिखती है, लेकिन भीतर से लगातार टूट रही है। जिसके चेहरे पर फिल्टर है, लेकिन मन पर नहीं। जिसकी प्रोफाइल चमकदार है, लेकिन मन थका हुआ है। उस युवा के एक स्टेटस के बाद जब मैंने घटनाओं और खबरों को जोड़कर देखा तो समझ आया कि यह कोई इक्का-दुक्का मामला नहीं है। यह एक गहरी सामाजिक बीमारी है, जो धीरे-धीरे पूरी पीढ़ी को खोखला कर रही है।
आज मैं आपके सामने एक गंभीर और विचारणीय मुद्दा रख रहा हूं।
हाल के दिनों में पहली खबर सामने आई कि मशहूर कॉमेडियन जाकिर खान काम से ब्रेक लेने जा रहे हैं। वजह साफ है कि उनका मन जवाब दे चुका है। उन्होंने यह माना है कि इतने सालों तक बैक टु बैक काम ने उनकी सेहत पर असर डाला है। दूसरी खबर है कि अरिजीत सिंह अब प्लेबैक सिंगिंग से दूरी बनाएंगे और खुद को समय देंगे। कुछ अलग और मन का करेंगे।
इन खबरों की प्रकृति अलग-अलग है, लेकिन इनका स्रोत एक ही है...थकान। फर्क सिर्फ इतना है कि कहीं यह थकान समय रहते पहचान ली गई और कहीं यह अनदेखी होकर विनाश में बदल गई।
तीसरी खबर लखनऊ से आई। एक पति ने पत्नी को मजाक में बंदरिया कह दिया। बात यहीं खत्म हो जानी चाहिए थी, लेकिन खत्म जिंदगी हो गई। उस एक शब्द के बाद पत्नी ने खुदकुशी कर ली।
चौथी खबर मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले के थांदला से आई, जहां सोशल मीडिया की सनक खून में उतर गई। इंस्टाग्राम रील बनाने से रोकने पर एक पत्नी ने अपने ही पति की गला घोंटकर हत्या कर दी।
साथियों, इन चारों खबरों को अलग-अलग पढ़ा जाए तो ये सामान्य अपराध या सेलिब्रिटी न्यूज लग सकती हैं। लेकिन जब इन्हें एक साथ रखा जाए तो एक डरावनी तस्वीर उभरती है। यह समाज शारीरिक रूप से नहीं, मानसिक रूप से थक चुका है।
पहली और दूसरी खबर थोड़ी राहत देती हैं। यह उम्मीद जगाती हैं कि शायद लोग अब समय रहते रुकना सीख रहे हैं। लेकिन यही खबरें एक सवाल भी खड़ा करती हैं कि अगर शोहरत, पैसा, पहचान और प्रशंसा के शिखर पर बैठे लोग भी टूट रहे हैं तो आम युवा किस हाल में होंगे?
जाकिर खान और अरिजीत सिंह कमजोर नहीं हुए हैं। उन्होंने सिर्फ यह स्वीकार किया है कि लगातार प्रदर्शन, परफेक्शन का दबाव और चौबीसों घंटे खुद को साबित करने की होड़ इंसान को भीतर से निचोड़ देती है। आज ब्रेक लेना कमजोरी नहीं, मानसिक स्वच्छता का तरीका बन रहा है, जो मैं समझता हूं अच्छी बात है।
लेकिन तीसरी और चौथी खबर हमें उस खाई के मुहाने पर ले जाकर खड़ा कर देती हैं, जहां से गिरने के बाद लौटने का रास्ता नहीं होता।
आज का युवा आलोचना और अपमान, मजाक और तंज, सलाह और नियंत्रण... इन सबके बीच का फर्क खो चुका है। उसे हर बात व्यक्तिगत हमला लगती है। और जब आत्मसम्मान का आधार रील बन जाए तो प्रतिक्रिया संयमित नहीं रहती हैं।
मानसिक रूप से थका हुआ आज का युवा
आज रील सिर्फ वीडियो नहीं है। रील पहचान है। लाइक सामाजिक स्वीकृति है और फॉलोअर्स अस्तित्व का सर्टिफिकेट बन चुके हैं। जब यह आभासी पहचान खतरे में पड़ती है तो तर्क पीछे छूट जाते हैं। प्रतिक्रिया संयमित नहीं रहती है। कभी आत्मविनाश की ओर जाती है तो कभी हिंसा की ओर।
इन घटनाओं का साझा निचोड़ साफ है। आज का युवा शारीरिक रूप से नहीं, मानसिक रूप से सबसे ज्यादा थका हुआ है। वह सुनने से पहले प्रतिक्रिया देता है, समझने से पहले टूट जाता है।
इंटरनेट के आंकड़े बेहद चौंकाने वाले हैं। exploding topics समेत तमाम रिपोर्ट्स कहती हैं कि दुनिया में गूगल पर हर दिन करीब 16.4 बिलियन यानी 1 हजार 640 करोड़ सर्च होते हैं। गूगल प्रति सेकंड 1 लाख 89 हजार 815 सर्च रिजल्ट को प्रोसेस करता है।
बताइए, अब क्या कहेंगे आप?
मैं कहता हूं कि इंटरनेट के इस दौर में हम ऐसे समाज में बदल रहे हैं, जहां रफ्तार तेज है, पर संवेदनशीलता घटती जा रही है। संवाद की जगह अहंकार ने ले ली है। समझदारी की जगह भावनाओं का उफान है। असल संकट नौकरी का नहीं है, शादी का नहीं है, सोशल मीडिया का भी नहीं है। असल संकट मानसिक संतुलन का है। यदि तो वो कारण है कि अब हम सड़कों पर झगड़े देखते हैं। रोड रेज की ये घटनाएं इस बात का प्रमाण हैं कि संवेदनशीलता, सहनशीलता खत्म हो रही है।
इस संकट की जड़ और गहरी है। हमने एक पूरी पीढ़ी को यह सिखा दिया है कि रील लाइफ ही रियल लाइफ है। इंटरनेट और सोशल मीडिया पर ऐसा कंटेंट लगातार परोसा जा रहा है, जो हिंसा, अपमान और उन्माद को सामान्य बनाता है। महिलाओं की पिटाई, सार्वजनिक बेइज्जती, फब्तियां, धार्मिक उत्तेजना...सब कुछ मनोरंजन के रूप में परोसा जा रहा है। रील के लिए सड़क पर कानून टूट रहे हैं, रिश्ते टूट रहे हैं, मर्यादाएं टूट रही हैं और समाज इसे सामान्य मानकर आगे बढ़ रहा है।
कामकाजी आबादी को ‘रैबिट होल’ में खींच रहा इंटरनेट
इंटरनेट एक बड़ी कामकाजी आबादी को ‘रैबिट होल’ में खींच रहा है, जहां गैरजरूरी जानकारियों और अंतहीन वीडियो के जाल में लोग फंसते चले जा रहे हैं। इस मायाजाल से आगाह करने वाला कोई प्रभावी सामाजिक तंत्र हमारे पास नहीं है। स्कूल और कॉलेज यह नहीं सिखाते कि डिजिटल दुनिया से दूरी कैसे बनाई जाए, समय की कीमत क्या है। हम तो यूजीसी जैसे विवादास्पद नियम लाकर समाज को एक दूसरे ही अंधकार में धकेलने की कोशिश कर रहे हैं।
आज मोबाइल में डिजिटल वेलबीइंग जैसे फीचर हैं, जो बताते हैं कि आपने किस ऐप पर कितना वक्त गंवाया। ये
आंकड़े कई बार चौंकाते हैं, डराते हैं। लेकिन रील की दुनिया यह नहीं सिखाती कि समय जीवन का सबसे मूल्यवान संसाधन है और इसकी कीमत पर जो भी कमाया जाएगा, उसका नुकसान उससे कहीं बड़ा होगा।
सोशल मीडिया की आभासी लोकप्रियता और जमीनी हकीकत का फर्क महाराष्ट्र चुनाव में साफ दिखाई दिया था। मुंबई की वर्सोवा सीट से बिग बॉस फेम अभिनेता एजाज खान चुनाव लड़े। नतीजा यह रहा कि उनकी जमानत जब्त हो गई। उन्हें सिर्फ 155 वोट मिले, जबकि इंस्टाग्राम पर उनके 56 लाख फॉलोअर्स हैं। यह उदाहरण बताता है कि रील पर मिलने वाली तालियां धरातल पर काम में नहीं आती हैं। युवा ये बात जितनी जल्द समझें उतनी बेहतर है।
लगातार बढ़ती आत्महत्याएं मानसिक दबाव का प्रमाण
इन सबके बीच युवा आजकल हताशा में जो कदम उठा रहे हैं, वह रोंगटे खड़े कर देने वाले हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो(NCRB) के मुताबिक 1995 से 2021 तक 1 लाख 34 हजार से ज्यादा युवाओं ने आत्महत्या की। 26 वर्षों में देश में लगभग 33 लाख आत्महत्याएं हुईं, जिनमें 40 प्रतिशत युवा थे। 2022 में यह संख्या बढ़कर 1 लाख 70 हजार से अधिक हो गई। तब से ये सिलसिला लगातार बढ़ता ही जा रहा है। ये आंकड़े सिर्फ आत्महत्या के नहीं हैं। ये उस मानसिक दबाव का प्रमाण हैं, जो दिखने में रील जैसा हल्का लगता है, लेकिन भीतर से जानलेवा होता है।
महाराष्ट्र, तमिलनाडु, मध्यप्रदेश, कर्नाटक और पश्चिम बंगाल युवाओं की आत्महत्या के मामलों में शीर्ष पर हैं। यूनियन टेरिटरी में दिल्ली आगे है। आत्महत्या की वजहें समाज की सामूहिक विफलता को उजागर करती हैं। पारिवारिक समस्याएं, बीमारी, नशे की लत, वैवाहिक तनाव और प्रेम संबंध...ये सभी संकेत हैं कि हमारा समाज युवाओं को जीना सिखाने में चूक रहा है।
देखिए, 31.70% युवाओं ने पारिवारिक समस्याओं से आहत होकर अपनी जान दी है। 18.40% बीमारी या स्वास्थ्य संबंधी कारणों से परेशान थे। 6.80% नशे की लत का शिकार थे। 4.80% विवाह संबंधी तनाव और 4.50% प्रेम संबंधों के कारण जिंदगी हार गए।
राजस्थान का कोटा इस संकट का सबसे निर्मम चेहरा है। फेल होने का डर और परिवार का दबाव हर साल छात्रों की जान ले रहा है। 2024 में 17 और 2023 में यहां 26 बच्चों ने अपनी जीवन लीला खत्म की। दरअसल, इसके पीछे सबसे बड़ी वजह यह है कि हमारा समाज बच्चों को यह सिखाने में नाकाम रहा है कि कि तनाव, असफलता और रिजेक्शन से कैसे निपटा जाए। बच्चा यह मान बैठा है कि उसकी पहचान उसकी परीक्षा है। वह तैयारी छोड़ने को तैयार नहीं, लेकिन जीवन छोड़ने को तैयार हो जाता है।
दबाव में टूट रहे हैं बच्चे
बच्चे मेधा में कमजोर नहीं हैं। वे दबाव में टूट रहे हैं। अकेलापन बढ़ रहा है और जो पढ़ाई-लिखाई कर आगे बढ़ जाते हैं, वे रिश्तों के मोर्चे पर लड़खड़ा रहे हैं। यही वजह है कि देश में तलाक के बढ़ रहे हैं। सिंगल लाइफ और डिंक कपल्स का चलन तेज हो रहा है। डेटिंग ऐप बम्बल के मुताबिक 81 प्रतिशत भारतीय महिलाएं सिंगल रहना चाहती हैं। इन्वेस्टोपेडिया के अनुसार 65 प्रतिशत नए शादीशुदा दंपति बच्चे नहीं चाहते है। वहीं, तलाक की बात करें तो इसकी दर में साल दर साल बढ़ोतरी हो रही है।
मैं फिर कहूंगा कि रील लाइफ कभी रियल लाइफ नहीं हो सकती। रील में कट होता है, रियल में नहीं। रील में गलती डिलीट हो जाती है, रियल में उसकी कीमत चुकानी पड़ती है। और जब समाज यह फर्क भूल जाता है, तब सबसे खतरनाक लड़ाइयां सीमाओं पर नहीं, घरों के भीतर और दिमागों के अंदर लड़ी जाती हैं।
समापन बेला में मैं इतना ही कहूंगा कि..
मंजिलें उन्हीं को मिलती हैं जिनके सपनों में जान होती है,
पंखों से कुछ नहीं होता, हौसलों से उड़ान होती है।
हौसला बनाए रखें, मंजिल जरूर मिलेगी।
Point Of View With Anand Pandey ( प्वाइंट ऑफ व्यू विद आनंद पांडे) :
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Anand Pandey | Journalist Anand Pandey
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