Point Of View With Anand : बच्चे बनाम सोशल मीडिया... एक खतरनाक जाल, जिसे हमने खुद अपने घरों में बुला लिया

सोशल मीडिया बच्चों के बचपन पर संकट बन चुका है। मोबाइल और शॉर्ट वीडियो से उनका ध्यान और आत्मविश्वास प्रभावित हो रहा है। thesootr के एडिटर इन चीफ आनंद पांडे के लेख से जानें, रील की दुनिया में फंसे बच्चों की हकीकत...

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Anand Pandey
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Photograph: (thesootr)

बच्चे मन के सच्चे, सारे जग की आंख के तारे,
ये वो नन्हे फूल हैं, जो भगवान को लगते प्यारे।

कभी ये पंक्तियां ऐसी सच्चाई थीं, जिस पर समाज की पूरी नींव टिकी थी। बच्चे मासूम थे, निर्मल थे और उनके मन में छल-कपट या दिखावे की कोई जगह नहीं होती थी। वे झगड़ते थे, लेकिन अगले ही पल गले मिल जाते थे। उनके लिए कोई पराया नहीं होता था, कोई दुश्मन नहीं होता था, पर आज सवाल यह है कि क्या यह सच अब भी बचा है? क्या आज के बच्चे वैसे ही हैं, जैसे कभी हुआ करते थे या फिर सोशल मीडिया ने उनके मन, उनकी सोच और उनके बचपन को अपने शिकंजे में जकड़ लिया है? हां, यही सच है।

नमस्कार, मैं हूं आनंद और आप पढ़ रहे हैं ‘द सूत्र’ का बेहद खास आर्टिकल Point of View. आज सवाल है... क्या सोशल मीडिया बच्चों का बचपन छीन रहा है? क्योंकि... पूरे समाज ने बच्चों के मन की सच्चाई को अपने ही हाथों से स्क्रीन में कैद कर दिया है।

आज के बच्चे मैदान में नहीं, मोबाइल में खेल रहे हैं। वह दोस्तों से नहीं, एल्गोरिद्म से बात कर रहे हैं। उनकी उंगलियां अब किताब के पन्ने नहीं पलटतीं, बल्कि सोशल मीडिया ऐप्स पर अंतहीन वीडियो पलटती रहती हैं और सबसे खतरनाक बात है कि हम सबको यह न्यू नॉर्मल मतलब, आज के जमाने का सामान्य लगने लगा है।

पैरेंट्स खुद ही खुश होते हैं कि देखो... बच्चा कितना तेज है, जो मोबाइल चला लेता है। मैं कहता हूं यह शाबाशी या वाहवाही वाली बात कतई नहीं है, यह तो बचपन को कैद करना है। यह एक खतरनाक संक्रमण है, जो बच्चों के मन, मस्तिष्क और भविष्य को धीरे-धीरे खोखला कर रहा है।

आज इस खतरे की गंभीरता को समझने के लिए केवल भावनाओं की नहीं, बल्कि तथ्यों की जरूरत है। मेटा के आंतरिक सर्वे ने जो सच दिखाया है, वह डराने वाला है।

पांच में से एक बच्चा देख रहा आपत्तिजनक कंटेंट

देश-दुनिया में 13 से 15 साल का हर पांच में से एक बच्चा इंस्टाग्राम पर आपत्तिजनक या कहें अश्लील तस्वीरें और वीडियो देख रहा है। यानी जिस उम्र में बच्चों को नैतिकता, संवेदनशीलता और सीख की जरूरत होती है, उसी उम्र में उन्हें अश्लीलता, फूहड़ता, दिखावा और झूठी दुनिया परोसी जा रही है।

सर्वे में यह भी पता चला है कि टीनएजर्स को सोशल मीडिया पर ज्यादा तवज्जो मिल रही है। वे नए यूजर्स को प्रभावित करते हैं। यानी सोशल मीडिया कंपनियां के लिए बच्चे यूजर नहीं, प्रोडक्ट हैं। उनका ध्यान, उनका वक्त, उनकी मानसिकता...सब कुछ बेचा जा रहा है।

एल्गोरिद्म को इस तरह बनाया गया है कि बच्चे एक बार अंदर जाएं तो बाहर न निकल सकें। हर स्क्रॉल के साथ उन्हें और ज्यादा बांध लिया जाता है। यह डिजिटल नशा है और यह नशा खुलेआम बेचा जा रहा है। यह एक सोचा समझा जाल है, जहां बच्चे खुद शिकार भी हैं और अनजाने में शिकारी का काम भी कर रहे हैं।

इसकी कीमत भी मासूम बच्चे ही चुका रहे हैं। उनकी एकाग्रता खत्म हो रही है। पढ़ाई से उनका ध्यान हट रहा है। उनका आत्मविश्वास लाइक्स और फॉलोअर्स पर निर्भर हो गया है। वे खुद की तुलना नकली दुनिया से कर रहे हैं, जहां सब कुछ सुंदर, सफल और परफेक्ट दिखता है और नतीजा...बस असंतोष, अवसाद और अकेलापन।

एक स्टडी कहती है कि बहुत ज्यादा शॉर्ट वीडियो देखने से बच्चों का ध्यान और फोकस कमजोर हो सकता है। यह पुख्ता किया है। वैज्ञानिकों ने कुछ युवाओं पर एक टेस्ट किया और उनके दिमाग की गतिविधि EEG मशीन से मापी। उन्होंने देखा कि जो बच्चे और युवा ज्यादा शॉर्ट वीडियो देखते हैं, उनमें पढ़ाई या किसी काम पर लंबे समय तक ध्यान लगाना मुश्किल होता है। Self control कम हो जाता है, यानी बार-बार मोबाइल देखने का मन करता है। दिमाग का वह हिस्सा, जो फोकस और सही फैसले लेने में मदद करता है, वह कम सक्रिय हो जाता है। अब इसका मतलब क्या है? इस मतलब सीधा सा है कि यदि कोई बच्चा हर वक्त शॉर्ट वीडियो देखता है तो उसका दिमाग जल्दी-जल्दी बदलने वाली चीजों का आदी हो जाता है। फिर किताब पढ़ना, पढ़ाई करना या किसी एक काम पर ध्यान देना कठिन लगने लगता है।

इस खतरे को दुनिया के कई देशों ने गंभीरता से लिया है। ऑस्ट्रेलिया ने ऐतिहासिक कदम उठाते हुए 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बैन लगा दिया है। अब सोशल मीडिया कंपनियों के लिए यह अनिवार्य कर दिया गया है कि वे यूजर्स की उम्र की पुष्टि करें और कम उम्र के बच्चों के अकाउंट बंद करें।

फ्रांस ने भी इसी दिशा में कदम बढ़ाए हैं। फ्रांसीसी संसद के निचले सदन ने एक बिल को मंजूरी दी है, जिसके तहत 15 साल से कम उम्र के बच्चों की सोशल मीडिया तक पहुंच रोकने का प्रस्ताव है। हालांकि इसे अभी सीनेट की मंजूरी मिलनी बाकी है, लेकिन यह संकेत है कि दुनिया इस खतरे को समझ चुकी है।

फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों कहते हैं कि जो चीज असल दुनिया में बच्चों के लिए स्वीकार्य नहीं है, वह इंटरनेट पर भी उपलब्ध नहीं होनी चाहिए। उनके शब्दों में, बच्चों की सुरक्षा केवल नियमों का विषय नहीं है, बल्कि सभ्यता का सवाल है।

हाल ही में इंडिया AI इम्पैक्ट समिट के दौरान फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने 15 साल से कम उम्र के बच्चों पर सोशल मीडिया बैन की वकालत भी की है। उन्होंने उम्मीद जताई है कि भारत भी इस पहल से जुड़ेगा। उधर, ग्रीस, स्पेन और दूसरे यूरोपीय देश भी इसी दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। यानी पूरी दुनिया बच्चों के बचपन को बचाने की लड़ाई लड़ रही है।

भारत में भी इस मुद्दे पर बहस तेज हो रही है। कई राज्यों के मंत्री ऑस्ट्रेलिया के कानून की स्टडी करा रहे हैं। आंध्र प्रदेश में तेलुगु देशम पार्टी के विधायक एलएसके देवरायलु ने विधानसभा में प्राइवेट मेंबर बिल पेश किया है, जिसमें 16 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक लगाने का प्रस्ताव है।

हालांकि, यह सरकार की आधिकारिक नीति नहीं है और इसके कानून बनने की संभावना कम है, लेकिन इसने बहस को दिशा जरूर दी है। आंध्र प्रदेश सरकार ने मेटा, एक्स, गूगल और शेयरचैट जैसी कंपनियों को चर्चा के लिए बुलाया है, लेकिन इन कंपनियों ने अभी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है।

आंध्र के ही आईटी मंत्री नारा लोकेश का कहना है कि बच्चे सोशल मीडिया के लगातार और बेलगाम इस्तेमाल में फंसते जा रहे हैं और इसका असर उनकी एकाग्रता और पढ़ाई पर पड़ रहा है।

गोवा, कर्नाटक, बिहार और केरल जैसे राज्यों ने भी इस मुद्दे पर चिंता जताई है। कर्नाटक ने ‘डिजिटल डिटॉक्स’ कार्यक्रम शुरू किया है, जिसमें करीब 3 लाख छात्र और 1 लाख शिक्षक शामिल किए जा रहे हैं। बिहार सरकार स्क्रीन टाइम के दुष्प्रभावों पर नियंत्रण के लिए नीति बना रही है। केरल सरकार बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग को सीमित करने के लिए कड़े नियमों पर विचार कर रही है।
लेकिन सवाल वही है, क्या यह पर्याप्त है? या फिर यह केवल चर्चा तक सीमित रह जाएगा?

मैं समझता हूं कि इस संकट की जड़ केवल सोशल मीडिया नहीं है, बल्कि हमारा बदलता हुआ पारिवारिक ढांचा भी है। आज परिवार एकाकी हो गए हैं। माता-पिता दोनों नौकरी या बिजनेस में बिजी हैं। उनके पास बच्चों के लिए वक्त नहीं है।

बच्चों को चुप रखने के लिए उन्हें मोबाइल दे दिया जाता है। यह एक आसान समाधान लगता है, लेकिन यह धीरे-धीरे बच्चों को डिजिटल कैद में धकेल देता है। बच्चा अब अपनी समस्याएं माता-पिता से नहीं, बल्कि स्क्रीन से साझा करता है। वह अपने भावनात्मक विकास के लिए परिवार पर नहीं, बल्कि एल्गोरिद्म पर निर्भर हो गया है।

बच्चों को ज्ञान और संस्कार देने वाले स्कूल अब गैजेट्स के माध्यम बनते जा रहे हैं। अमेरिका इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। वहां साल 2024 में स्कूलों में किताबों की जगह लैपटॉप और टैबलेट पर 2.72 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च किए गए हैं। ये बात देखने में भले प्रोग्रेसिव लगे, लेकिन एक्सपर्ट इसे ठीक नहीं मानते। न्यूरोसाइंटिस्ट जेरेड कूनी होर्वाथ का कहना है कि तकनीक तक अभूतपूर्व पहुंच के बावजूद जेनरेशन-जेड यानी Gen G पिछली पीढ़ियों की तुलना में कम सक्षम दिख रही है और उनके टेस्ट स्कोर गिर रहे हैं।

सैन डिएगो स्टेट यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर जीन ट्वेंगे के अनुसार ज्यादा स्क्रीन टाइम बच्चों की एकाग्रता को खत्म कर रहा है, जो सीखने की प्रक्रिया के लिए बेहद हानिकारक है।अब यहां यह समझना बेहद जरूरी है कि सोशल मीडिया कोई मासूम प्लेटफॉर्म नहीं है। इसे जानबूझकर इस तरह डिजाइन किया गया है कि यूजर ज्यादा से ज्यादा वक्त उस पर बिताएं।

नवंबर 2025 की एक स्टडी के मुताबिक, टिकटॉक अपने सहज और आकर्षक इंटरफेस के कारण सबसे ज्यादा लत लगाने वाला प्लेटफॉर्म साबित हुआ है। यह लत केवल वक्त बर्बाद नहीं करती, बल्कि बच्चों में अवसाद और मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं को बढ़ा रही है। यही वजह है कि मेटा जैसे प्लेटफॉर्म्स के खिलाफ 1 हजार 600 से ज्यादा परिवारों और स्कूलों ने मुकदमे दर्ज कराए हैं।

स्थिति इतनी गंभीर है कि जब सरकारें सोशल मीडिया पर बैन की बात करती हैं तो टेक कंपनियां इसके खिलाफ लॉबिंग शुरू कर देती हैं। यूरोपीय यूनियन में अमेरिकी टेक कंपनियों ने सांसदों को प्रभावित करने और अपने पक्ष में माहौल बनाने के लिए पिछले वर्ष 1615 करोड़ रुपए खर्च किए हैं। बड़े होर्डिंग लगाए गए, राजनेताओं को प्रभावित किया गया और कानूनों को रोकने की कोशिश की गई। यह बताता है कि इन कंपनियों के लिए बच्चों की सुरक्षा नहीं, बल्कि उनका मुनाफा प्राथमिकता है।

भारत में सोशल मीडिया का बढ़ता खतरा नया नहीं है। करीब 13 वर्ष पहले अगस्त 2013 में दिल्ली हाईकोर्ट ने आदेश दिया था कि नाबालिग बच्चे सोशल मीडिया जॉइन नहीं कर सकते और कंपनियों की जिम्मेदारी है कि वे उम्र की सही जांच करें। तब अदालत ने माना था कि सोशल मीडिया बच्चों की मानसिक सेहत, पढ़ाई और सुरक्षा के लिए खतरा बन सकता है।

इस आदेश का कभी सख्ती से पालन ही नहीं हुआ। न कंपनियों ने उम्र जांच की व्यवस्था लागू की, न सरकार ने निगरानी की। नतीजा यह है कि बच्चे आसानी से गलत उम्र डालकर अकाउंट अब भी बना रहे हैं। यह प्रशासनिक विफलता नहीं है, यह तो एक पूरी पीढ़ी के साथ किया गया अन्याय है।

इसका बड़ा और चिंताजनक नुकसान यह है कि ऐसी लापरवाहियों की कीमत अब बच्चे अपनी जान देकर चुका रहे हैं। आज हम हर दिन खबरों में देखते हैं कि रील बनाने के चक्कर में बच्चों और युवाओं की जान जा रही है। बच्चे खुद को घरों में कैद कर रहे हैं। उनका सामाजिक जीवन खत्म हो रहा है। वे वास्तविक दुनिया से कटते जा रहे हैं और एक आभासी दुनिया में जी रहे हैं।

दरअसल, चाहे बच्चे हों या युवा उनका आत्मविश्वास लाइक्स और फॉलोअर्स पर निर्भर हो गया है। उनका आत्मसम्मान एल्गोरिद्म के हाथों गिरवी रखा जा चुका है। मैं इसे तकनीक का नहीं, सभ्यता का संकट मानता हूं। हमारे समाज ने अपनी एक पूरा पीढ़ी को सुरक्षित रखने के बजाय उन्हें एक ऐसे डिजिटल जंगल में अकेला छोड़ दिया है, जहां हर कदम पर खतरा है। हमने उन्हें मोबाइल देकर खुद को मुक्त समझ लिया, लेकिन सच यह है कि हमने उन्हें एक ऐसे जाल में धकेल दिया है, जहां से निकलना उनके लिए आसान नहीं है।

बच्चे ही नहीं बड़े-बड़े भी मोबाइल के जाल में फंस रहे हैं। हाल ही में एक वाक्या मध्यप्रदेश के शहडोल जिले में घटा है। जहां ऑनलाइन गेम में लाखों रुपए हारने और कर्ज से लदे शख्स ने कोल्ड्रिंक में जहर मिलाकर पी लिया। फिर अपनी पत्नी और बेटी को भी जहर पिलाया। इस मामले में पिता-पुत्री की मौत हो गई है, जबकि पत्नी अभी अस्पताल में भर्ती है। यानी मोबाइल ने एक पूरा परिवार खत्म कर दिया। सोचिए, ये कितना खतरनाक है।

बच्चों और युवाओं को सोशल मीडिया के मकड़जाल से बाहर निकालने के लिए सरकारों को कठोर कानून बनाने होंगे। सोशल मीडिया कंपनियों को जवाबदेह बनाना होगा। उम्र की सख्त जांच व्यवस्था लागू करनी होगी। लेकिन इससे भी ज्यादा जिम्मेदारी माता-पिता और समाज की है। उन्हें बच्चों को समय देना होगा। उन्हें स्क्रीन से बाहर की दुनिया दिखानी होगी। उन्हें यह समझाना होगा कि जीवन लाइक्स और फॉलोअर्स से कहीं बड़ा है। क्योंकि बचपन बचाना ही भविष्य बचाना है। बच्चे आज भी मन के सच्चे हैं। उनका मन अभी भी कोमल है। वे जो सीखते हैं, वही आगे करते हैं।

अगर वे स्क्रीन से सीखेंगे तो उनका भविष्य स्क्रीन तय करेगी। अगर वे परिवार, समाज और किताबों से संस्कार सीखेंगे तो उनका भविष्य वे खुद तय करेंगे। यह चुनाव हमारा है। यदि हमने अभी भी आंखें बंद रखीं तो आने वाली पीढ़ी हमें माफ नहीं करेगी। क्योंकि तब इतिहास यह लिखेगा कि हमने अपने बच्चों का बचपन तकनीक के हाथों बेच दिया और हम चुपचाप देखते रहे।

point of view with anand | Anand Pandey | Journalist Anand Pandey | आनंद पांडे | प्वाइंट ऑफ व्यू। मध्‍य प्रदेश। देश दुनिया

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बच्चों की सुरक्षा बचपन प्वाइंट ऑफ व्यू आनंद पांडे Anand Pandey Journalist Anand Pandey सोशल मीडिया point of view with anand
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