साल भर सोया PWD, अब जांच के नाम पर लीपापोती? 90 डिग्री ब्रिज कांड में जवाबदेही पर बड़े सवाल
BHOPAL. भोपाल के चर्चित 90 डिग्री ब्रिज मामले में लगभग सालभर का समय होने को है। PWD अब विभागीय जांच (DE) बैठाने जा रहा है। इंजीनियर पहले ही सस्पेंड किए जा चुके हैं। मंत्री राकेश सिंह की समीक्षा बैठकों के बावजूद कार्रवाई टलती रही। प्रमुख इंजीनियर KPS राणा के नेतृत्व पर सवाल उठ रहे हैं। अब सवाल यह है कि यह जांच दोष तय करने के लिए है या मामले पर पर्दा डालने की तैयारी?
लगभग साल भर बाद जागा विभाग
भोपाल के ऐशबाग ROB को लेकर मचा बवाल देशभर में चर्चा बना, लेकिन PWD की नींद अब जाकर खुली है। इंजीनियरों को तुरंत सस्पेंड कर दिया गया, पर विभागीय जांच एक साल तक लटकी रही। अब अचानक DE बैठाने की तैयारी हो रही है, जिससे विभाग की मंशा पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
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समीक्षा बनाम जमीनी हकीकत
मंत्री राकेश सिंह लगातार समीक्षा बैठकों और सख्ती के दावे करते रहे। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि बिना जांच के ही इंजीनियरों को लंबे समय तक सस्पेंड रखा गया। अगर कार्रवाई करनी थी, तो उसी वक्त क्यों नहीं हुई जब मामला सुर्खियों में था?
क्यों जरूरी है विभागीय जांच ?
सरकारी प्रक्रिया के अनुसार, पहले जांच से दोष तय होता है, फिर कार्रवाई होती है। लेकिन यहां उल्टा हुआ पहले सस्पेंशन, फिर लगभग साल भर बाद जांच।
अब DE इसलिए जरूरी हो गई है क्योंकि:
- सस्पेंड कर्मचारियों का दोष तय करना अनिवार्य है।
- बिना जांच सजा कानूनी रूप से अधूरी मानी जाती है।
- भविष्य में बहाली या दंड का आधार यही जांच बनेगी।
क्या इंजीनियरों को बनाया गया बलि का बकरा?
सूत्रों के मुताबिक, PWD ने अपनी जिम्मेदारी छुपाने के लिए जल्दबाजी में इंजीनियरों को सस्पेंड किया। इसके बाद पूरे साल परीक्षण और फाइलिंग का खेल चलता रहा। अब सवाल यह है। क्या प्रमुख इंजीनियर KPS राणा समेत शीर्ष स्तर के तत्कालीन जिम्मेदार अफसरों तक जांच पहुंचेगी?
रेलवे vs PWD: गड़बड़ी की असली जड़
इस पूरे मामले में रेलवे और PWD के बीच तालमेल की कमी सामने आई। शुरुआत में सहमति बनी, लेकिन बाद में जमीन और डिजाइन को लेकर विवाद बढ़ा। रेलवे ने आपत्तियां उठाईं, फिर भी काम चलता रहा। नतीजा—एक ऐसा ब्रिज जो डिजाइन और जमीन के बीच फंसा रहा।
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तकनीकी गड़बड़ी या सिस्टम फेल?
जहां सर्कुलर पिलर बनना था, वहां दीवार जैसी संरचना बना दी गई। रेलवे लगातार पत्र लिखता रहा, लेकिन PWD ने समय पर सुधार नहीं किया। अप्रैल 2024 में रेलवे ने साफ कहा डिजाइन सुरक्षित नहीं है, फिर भी काम जारी रहा। यह पूरी प्रक्रिया PWD की निगरानी और शीर्ष नेतृत्व की भूमिका पर सवाल खड़े करती है। अब DE क्यों? कार्रवाई या फाइल बंद करने की तैयारी?
दो संभावनाएं सामने हैं
वास्तविक कार्रवाई: जांच के बाद दोषियों पर सख्त दंड।
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हाईकोर्ट और एक्सपर्ट रिपोर्ट ने क्या कहा
MANIT की रिपोर्ट में ब्रिज का एंगल लगभग 118-119° बताया गया। यानी जो 90° का विवाद था, वह तकनीकी रूप से अलग निकला। लेकिन इससे बड़ा सवाल यह है। डिजाइन और सुरक्षा की चूक आखिर हुई कैसे, और इसकी जिम्मेदारी किस स्तर तक जाती है?
कार्रवाई का ब्यौरा (अब तक)
सात इंजीनियर सस्पेंड
दो एजेंसियां ब्लैकलिस्ट
रिटायर्ड अफसर भी जांच के दायरे में
सुधार कार्य के लिए नई कमेटी
अंतिम सवाल: जिम्मेदारी किसकी?
क्या सिर्फ इंजीनियर ही दोषी हैं?
या फिर मंत्री राकेश सिंह से लेकर प्रमुख इंजीनियर KPS राणा तक जवाबदेही तय होगी? जब एक साल तक विभाग चुप रहा, तो अब अचानक सक्रियता क्यों?
भोपाल का 90° ब्रिज सिर्फ एक तकनीकी गलती नहीं, बल्कि सिस्टम फेलियर की मिसाल बन चुका है। अब देखना होगा कि विभागीय जांच सच्चाई सामने लाती है या फिर यह मामला भी फाइलों में दफन हो जाता है।