वन विभाग की कार्रवाई से नाराज 35 गांवों के आदिवासी आएंगे भोपाल, सीएम को दिखाएंगे जमीन के कागजात
Sourabh Bhatnagar | Oct 15, 2026, 12:18 IST
वन विभाग की कार्रवाई से नाराज 35 गांवों के आदिवासी करेंगे भोपाल कूच, CM मोहन यादव को दिखाएंगे जमीन के कागजात
मध्यप्रदेश के सीहोर जिले में वन विभाग की कार्रवाई के खिलाफ आदिवासियों का गुस्सा बढ़ता जा रहा है। कोसमी गांव में 12 परिवारों के मकान तोड़े जाने के बाद अब 35 से ज्यादा गांवों के आदिवासी गुरुवार, 15 अक्टूबर को भोपाल आने की तैयारी कर रहे हैं। वे मुख्यमंत्री मोहन यादव से मिलकर अपनी परेशानी बताएंगे। वहीं प्रशासन का कहना है कि वन भूमि पर अवैध कब्जा किया गया था।
दरअसल, पिछले दिनों कोसमी गांव में वन विभाग ने अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई की थी। आदिवासी समाज के मुताबिक, इस दौरान 12 परिवारों के मकान तोड़ दिए गए और एक कुएं को मिट्टी से भर दिया गया। इससे कई परिवारों के सामने रहने और रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है।
इस कार्रवाई के बाद केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान (Shivraj Singh Chouhan) भी कोसमी गांव पहुंचे थे। उन्होंने वन विभाग की कार्रवाई पर नाराजगी जताई थी। शिवराज ने कहा था कि उनके क्षेत्र में जुल्म और अन्याय की इंतहा हो गई है।
तीन दिन से
कोसमी गांव में वन विभाग की कार्रवाई के विरोध में आदिवासी समाज का धरना तीन दिन से जारी है। प्रदर्शनकारी वन विकास निगम के डिपो के बाहर बैठकर अपनी मांगें उठा रहे हैं।
आंदोलन में शामिल रमेश बारेला ने बताया कि जिन अधिकारी-कर्मचारियों ने यह कार्रवाई की है, उन्हें तत्काल हटाया जाए। साथ ही उनके खिलाफ कार्रवाई भी होनी चाहिए।
प्रदर्शनकारियों की मांग है कि जिन परिवारों के मकान तोड़े गए हैं, उनके रहने, खाने और इलाज की व्यवस्था की जाए। इसके अलावा बर्बाद हुई फसलों का मुआवजा भी दिया जाए।
आदिवासी समाज का कहना है कि वे बाहर से आकर जंगल में नहीं बसे हैं। उनके परिवार कई पीढ़ियों से इसी इलाके में रहते आए हैं। जंगल और खेती से ही उनकी रोजी-रोटी चलती है।
रमेश बारेला के मुताबिक, परिवार वर्षों से जिस जमीन पर खेती कर रहे हैं और जहां उन्होंने कुएं बनाए हैं, उसका वैध पट्टा दिया जाना चाहिए।
आदिवासियों का आरोप है कि वन विभाग की कार्रवाई से 12 परिवार बेघर हो गए हैं। अब उनके सामने रहने के साथ परिवार चलाने की भी परेशानी खड़ी हो गई है।
आदिवासी समाज का आरोप है कि खिवनी अभयारण्य के आसपास बसे 35 से ज्यादा गांवों के जनजातीय किसानों को खेती करने से रोका जा रहा है। इनमें कोसमी, इटावा खुर्द, जामुल झील पानी, पांगरी, छापरी, सनकोटा, नवलगांव, भीलखेड़ा, कुरी गांव शामिल हैं।
साथ ही बसंतपुर, लावापानी, बोरपानी, सिराली, बावड़ी खेड़ा, अमीरगंज, सुरई, खजूरी, आमाझिर, ढाबा, भिलाई और सेवनिया समेत भी शामिल हैं।
समाज का कहना है कि खेती नहीं कर पाने से आदिवासी परिवारों की रोजी-रोटी पर संकट आ गया है। उनकी कमाई का मुख्य जरिया खेती ही है। ऐसे में समाज ने सरकार से जमीन से जुड़े मामलों की जांच कराने और किसानों की समस्या दूर करने की मांग की है।
आदिवासी समाज ने केवल सीहोर ही नहीं, बल्कि विदिशा जिले में भी जमीन से जुड़े मामलों की शिकायत की है।
समाज का दावा है कि जून 2025 में खिवनी क्षेत्र में 50 से ज्यादा परिवारों के मकान तोड़े गए थे। बुधनी के यार नगर में 18 परिवारों के जमीन के पट्टे अमान्य किए जाने की शिकायत भी सामने आई थी।
वहीं विदिशा के ग्यारसपुर में करीब 115 लोगों की फसलें नष्ट करने का आरोप है। इसके अलावा मेहंदीपुर, डगरवाड़ा, बदनपुर, शमशाबाद, लटेरी और सिरोंज क्षेत्र से भी जमीन को लेकर शिकायतें की गई हैं।
आदिवासी समाज चाहता है कि इन सभी मामलों की निष्पक्ष जांच हो। साथ ही पुराने पट्टों व जमीन के दस्तावेजों की पड़ताल की जाए।
दूसरी ओर वन विकास निगम और प्रशासन का पक्ष अलग है। सीहोर कलेक्टर की जांच रिपोर्ट के मुताबिक, संबंधित लोगों ने वन भूमि पर अवैध कब्जा किया था।
रिपोर्ट में कहा गया है कि दूसरे जिलों से आए लोगों ने जंगल की जमीन पर कब्जा कर सागौन के पौधे काटे। साथ ही खेती के लिए झोपड़ियां बना ली थीं।
प्रशासन के मुताबिक, वर्ष 2020 में 186.960 हेक्टेयर वन भूमि सामान्य वन मंडल से वन विकास निगम के सीहोर परियोजना मंडल को दी गई थी।
इसके बाद वर्ष 2021 में निगम ने 135 हेक्टेयर जमीन पर 3 लाख 37 हजार 500 सागौन के पौधे लगाए थे।
जांच रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इनमें से 78 हजार 700 पौधे काट दिए गए। इसके बाद 31.48 हेक्टेयर जमीन पर कब्जा कर लिया गया।
प्रशासन ने अपनी रिपोर्ट में गूगल अर्थ (Google Earth) की पुरानी तस्वीरों को भी आधार बनाया है। रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2021 तक संबंधित वन भूमि खाली दिखाई दे रही थी। इसके बाद 2022 से वहां झोपड़ियां बनाकर खेती शुरू किए जाने के संकेत मिले। रिपोर्ट में सुनील पिता शैतान समेत 12 लोगों का उल्लेख किया गया है।
भैंरोंदा के अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) के हवाले से रिपोर्ट में बताया गया है कि, कार्रवाई के दौरान 9 कब्जाधारियों को हटाया गया था। उनके मूल गांव सिंधपुर और हल्लीबन नगर में पहले से पक्के मकान हैं। प्रशासन के मुताबिक इन मकानों के नंबर और वोटर आईडी कार्ड भी दर्ज हैं।
हालांकि, आदिवासी समाज प्रशासन के इन दावों से सहमत नहीं है। साथ ही जमीन पर अपना पुराना अधिकार बता रहा है।
प्रशासन की रिपोर्ट के मुताबिक 11 अक्टूबर को कोसमी बीट में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई की गई थी। इस दौरान रिजर्व फॉरेस्ट के कंपार्टमेंट नंबर 426 से 9 झोपड़ियां हटाई गईं। संबंधित जमीन को मलबे से भरा गया। प्रशासन का कहना है कि पूरी कार्रवाई की ड्रोन से वीडियोग्राफी भी कराई गई।
रिपोर्ट के अनुसार इस कार्रवाई से भैंरोंदा तहसील के लाड़कुई परिक्षेत्र में 31.48 हेक्टेयर वन भूमि को कब्जे से मुक्त कराया गया है।
आदिवासी समाज के लोग वन विभाग की कार्रवाई के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं। साथ ही अब भोपाल पहुंचकर मुख्यमंत्री मोहन यादव से मिलने की तैयारी में हैं।
वे मुख्यमंत्री को जमीन से जुड़े पुराने दस्तावेज दिखाएंगे। साथ ही बेदखली की कार्रवाई की जांच, जमीन के पट्टे, प्रभावित परिवारों के पुनर्वास और फसलों के नुकसान का मुआवजा देने की मांग करेंगे।
रमेश बारेला ने बताया कि इस पदयात्रा (Protest March) में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान के शामिल होने की कोई जानकारी नहीं है। उनके मुताबिक, आदिवासी समाज के लोग ही पदयात्रा करेंगे।
फिलहाल एक तरफ आदिवासी परिवार जमीन पर अपना पुराना अधिकार बता रहे हैं. दूसरी तरफ प्रशासन इसे अवैध कब्जा मान रहा है। अब आदिवासी समाज मुख्यमंत्री के सामने अपना पक्ष रखने की तैयारी में है।
इस कार्रवाई के बाद केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान (Shivraj Singh Chouhan) भी कोसमी गांव पहुंचे थे। उन्होंने वन विभाग की कार्रवाई पर नाराजगी जताई थी। शिवराज ने कहा था कि उनके क्षेत्र में जुल्म और अन्याय की इंतहा हो गई है।
तीन दिन से धरने पर बैठे आदिवासी
आंदोलन में शामिल रमेश बारेला ने बताया कि जिन अधिकारी-कर्मचारियों ने यह कार्रवाई की है, उन्हें तत्काल हटाया जाए। साथ ही उनके खिलाफ कार्रवाई भी होनी चाहिए।
प्रदर्शनकारियों की मांग है कि जिन परिवारों के मकान तोड़े गए हैं, उनके रहने, खाने और इलाज की व्यवस्था की जाए। इसके अलावा बर्बाद हुई फसलों का मुआवजा भी दिया जाए।
आदिवासी बोले- हमारे पूर्वज भी यहीं रहते थे
रमेश बारेला के मुताबिक, परिवार वर्षों से जिस जमीन पर खेती कर रहे हैं और जहां उन्होंने कुएं बनाए हैं, उसका वैध पट्टा दिया जाना चाहिए।
आदिवासियों का आरोप है कि वन विभाग की कार्रवाई से 12 परिवार बेघर हो गए हैं। अब उनके सामने रहने के साथ परिवार चलाने की भी परेशानी खड़ी हो गई है।
35 से ज्यादा गांवों में खेती रोकने का आरोप
साथ ही बसंतपुर, लावापानी, बोरपानी, सिराली, बावड़ी खेड़ा, अमीरगंज, सुरई, खजूरी, आमाझिर, ढाबा, भिलाई और सेवनिया समेत भी शामिल हैं।
समाज का कहना है कि खेती नहीं कर पाने से आदिवासी परिवारों की रोजी-रोटी पर संकट आ गया है। उनकी कमाई का मुख्य जरिया खेती ही है। ऐसे में समाज ने सरकार से जमीन से जुड़े मामलों की जांच कराने और किसानों की समस्या दूर करने की मांग की है।
विदिशा में भी जमीन से बेदखली की शिकायत
समाज का दावा है कि जून 2025 में खिवनी क्षेत्र में 50 से ज्यादा परिवारों के मकान तोड़े गए थे। बुधनी के यार नगर में 18 परिवारों के जमीन के पट्टे अमान्य किए जाने की शिकायत भी सामने आई थी।
वहीं विदिशा के ग्यारसपुर में करीब 115 लोगों की फसलें नष्ट करने का आरोप है। इसके अलावा मेहंदीपुर, डगरवाड़ा, बदनपुर, शमशाबाद, लटेरी और सिरोंज क्षेत्र से भी जमीन को लेकर शिकायतें की गई हैं।
आदिवासी समाज चाहता है कि इन सभी मामलों की निष्पक्ष जांच हो। साथ ही पुराने पट्टों व जमीन के दस्तावेजों की पड़ताल की जाए।
प्रशासन बोला- वन भूमि पर किया था कब्जा
रिपोर्ट में कहा गया है कि दूसरे जिलों से आए लोगों ने जंगल की जमीन पर कब्जा कर सागौन के पौधे काटे। साथ ही खेती के लिए झोपड़ियां बना ली थीं।
प्रशासन के मुताबिक, वर्ष 2020 में 186.960 हेक्टेयर वन भूमि सामान्य वन मंडल से वन विकास निगम के सीहोर परियोजना मंडल को दी गई थी।
इसके बाद वर्ष 2021 में निगम ने 135 हेक्टेयर जमीन पर 3 लाख 37 हजार 500 सागौन के पौधे लगाए थे।
जांच रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इनमें से 78 हजार 700 पौधे काट दिए गए। इसके बाद 31.48 हेक्टेयर जमीन पर कब्जा कर लिया गया।
गूगल अर्थ की तस्वीरों से की जांच
भैंरोंदा के अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) के हवाले से रिपोर्ट में बताया गया है कि, कार्रवाई के दौरान 9 कब्जाधारियों को हटाया गया था। उनके मूल गांव सिंधपुर और हल्लीबन नगर में पहले से पक्के मकान हैं। प्रशासन के मुताबिक इन मकानों के नंबर और वोटर आईडी कार्ड भी दर्ज हैं।
हालांकि, आदिवासी समाज प्रशासन के इन दावों से सहमत नहीं है। साथ ही जमीन पर अपना पुराना अधिकार बता रहा है।
11 अक्टूबर को हटाई गई थीं 9 झोपड़ियां
रिपोर्ट के अनुसार इस कार्रवाई से भैंरोंदा तहसील के लाड़कुई परिक्षेत्र में 31.48 हेक्टेयर वन भूमि को कब्जे से मुक्त कराया गया है।
अब मुख्यमंत्री से मिलकर रखेंगे अपना पक्ष
वे मुख्यमंत्री को जमीन से जुड़े पुराने दस्तावेज दिखाएंगे। साथ ही बेदखली की कार्रवाई की जांच, जमीन के पट्टे, प्रभावित परिवारों के पुनर्वास और फसलों के नुकसान का मुआवजा देने की मांग करेंगे।
रमेश बारेला ने बताया कि इस पदयात्रा (Protest March) में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान के शामिल होने की कोई जानकारी नहीं है। उनके मुताबिक, आदिवासी समाज के लोग ही पदयात्रा करेंगे।
फिलहाल एक तरफ आदिवासी परिवार जमीन पर अपना पुराना अधिकार बता रहे हैं. दूसरी तरफ प्रशासन इसे अवैध कब्जा मान रहा है। अब आदिवासी समाज मुख्यमंत्री के सामने अपना पक्ष रखने की तैयारी में है।
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