एमपी में खुदाई में निकली 1000 साल पुरानी वैष्णवी-माहेश्वरी मूर्ति, देश की इकलौती
समझें क्या है पूरा मामला...
- 1000 साल बाद जमीन से निकली अनोखी देवी मूर्ति।
- एक ही मूर्ति में शिव और विष्णु की शक्ति।
- सीहोर की खुदाई ने इतिहास बदल दिया।
- परमार काल की यह मूर्ति देश में इकलौती है।
- 3D प्रिंटिंग से दुनिया देख सकेगी यह धरोहर।
मध्य प्रदेश के सीहोर जिले के देवबड़ला में खुदाई के दौरान एक हजार साल पुरानी दुर्लभ देवी मूर्ति मिली है। यह मूर्ति 11वीं-12वीं सदी की परमार काल की है। इसमें एक ही मूर्ति में शिव और विष्णु दोनों की शक्तियां समाहित हैं।
देश में ऐसी कोई दूसरी संयुक्त महिला देवी की मूर्ति अब तक नहीं मिली है। इसे भोपाल में बनने वाले हेरिटेज 3D प्रिंटिंग सेंटर का मुख्य चेहरा बनाया जाएगा।
सीहोर की धरती ने दिया हजार साल पुराना खजाना
सीहोर जिले के एक छोटे से गांव देवबड़ला में जो हुआ वो इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया। तीन साल के लंबे अंतराल के बाद यहां के परमार कालीन मंदिर परिसर में दोबारा खुदाई शुरू हुई। खुदाई में निकली एक प्राचीन देवी प्रतिमा ने पुरातत्वविदों को हैरत में डाल दिया।
यह कोई सामान्य मूर्ति नहीं है। ज्वालामुखी के काले पत्थर पर उकेरी गई यह मूर्ति करीब एक हजार साल पुरानी मानी जा रही है। पुरातत्व विशेषज्ञों का कहना है कि यह 11वीं-12वीं सदी की परमार कालीन कला का बेजोड़ नमूना है।
एक मूर्ति में दो देवताओं की शक्ति
इस प्रतिमा की सबसे खास बात यह है कि इसके एक हिस्से में भगवान शिव की शक्ति झलकती है और दूसरे हिस्से में भगवान विष्णु की। शैव परंपरा में इसे माहेश्वरी कहा जाता है और वैष्णव परंपरा में इसे वैष्णवी। इसीलिए इस मूर्ति को वैष्णवी-माहेश्वरी नाम दिया गया है।
पुरातत्व विभाग के विशेषज्ञों का कहना है कि मध्यकाल में जब शैव और वैष्णव मत अलग-अलग हो रहे थे, उस दौर में किसी अनजान कलाकार ने इन दोनों विचारधाराओं को एक पत्थर पर जोड़ दिया। यह मूर्ति उस एकता की गवाह है।
देश में ऐसी कोई दूसरी मूर्ति नहीं
विशेषज्ञों के अनुसार भारतीय मंदिर कला के पूरे इतिहास में ऐसी कोई दूसरी संयुक्त महिला देवी की प्रतिमा नहीं मिली है। यानी यह अपनी तरह की देश में इकलौती मूर्ति है।
2016 से इस साइट पर काम कर रहे वरिष्ठ पुरातत्वविद् रमेश यादव का कहना है कि यह खोज ऐतिहासिक रूप से बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण है। उनके मुताबिक यह मूर्ति केवल धार्मिक प्रतीक नहीं है, बल्कि भारतीय दर्शन के विकास को पत्थरों पर लिखा एक दस्तावेज है।
3D प्रिंटिंग से दुनिया देखेगी यह धरोहर
इस मूर्ति को लेकर एक अनोखी पहल की जा रही है। मूल प्रतिमा को पूरी तरह सुरक्षित रखते हुए भोपाल में बन रहे एडवांस सेंटर फॉर हेरिटेज 3D प्रिंटिंग के लिए इसे मुख्य चेहरा चुना गया है।
इस केंद्र के जरिए मूर्ति की प्रामाणिक 3D डिजिटल प्रतिकृतियां तैयार की जाएंगी। दुनिया भर के संग्रहालय मांग के आधार पर इन प्रतिकृतियों को हासिल कर सकेंगे।
ऑगमेंटेड और वर्चुअल रियलिटी से होगा अनुभव
आधुनिक तकनीक के जरिए लोग इस धरोहर को डिजिटल रूप से भी अनुभव कर सकेंगे। ऑगमेंटेड रियलिटी (AR – Augmented Reality) और वर्चुअल रियलिटी (VR – Virtual Reality) की मदद से यह मूर्ति आम लोगों तक पहुंचेगी। साथ ही इस पहल को मानविकी की शिक्षा के लिए एक व्यावहारिक प्रयोगशाला के रूप में भी विकसित किया जाएगा।
परमार काल और देवबड़ला की खुदाई
देवबड़ला में यह उत्खनन 2016 से चल रहा है। यह स्थल परमार काल के मंदिर परिसर के अवशेषों के लिए जाना जाता है। परमार राजवंश 9वीं से 14वीं सदी तक मध्यभारत में शासन करता रहा। इस काल में कला और स्थापत्य का जबरदस्त विकास हुआ था।
तीन साल के अंतराल के बाद जब यहां दोबारा खुदाई शुरू हुई तो यह अद्भुत प्रतिमा सामने आई। राज्य पुरातत्व निदेशालय अब इस खोज को देश और दुनिया तक पहुंचाने की तैयारी में है।
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