सीवर में मौतें : प्रशासनिक लापरवाही या सिस्टम की विफलता? जानें चमकते शहरों के पीछे छिपा कड़वा सच

Pawan Modiya | Mar 09, 2026, 23:07 IST
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Photograph: (the sootr)

भारत में विकास, स्मार्ट सिटी और स्वच्छता के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। शहरों को चमकाने और साफ-सुथरा बनाने के लिए करोड़ों खर्च किए जाते हैं। लेकिन इन चमकते शहरों के पीछे एक कड़वी सच्चाई भी छिपी हुई है—सीवर में मौतें।

मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर से हाल ही में एक दर्दनाक खबर सामने आई। देश के सबसे स्वच्छ शहर में सीवर की सफाई के दौरान दो सफाईकर्मियों की मौत हो गई। इस घटना ने न सिर्फ प्रशासनिक व्यवस्थाओं पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि उन परिवारों की जिंदगी भी अंधेरे में धकेल दी जिनके लिए ये मजदूर ही घर का एकमात्र सहारा थे।

देशभर में ऐसे अनगिनतसीवरहादसे हुए होंगे। जिसकी वजह से किसी का परिवार बिखर गया तो कोई अनाथ हो गया। सरकार बस मुआवजा देकर अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ लेती है। यदि यही पैसा सुरक्षा उपकरण और संसाधनों पर खर्च किया गया होता तो शायद ऐसे हादसे ही नहीं होते।

भारत में स्मार्ट सिटी के बड़े-बड़े दावे होते हैं। शहरों में ऊंची इमारतें और साफ सड़कों के विज्ञापन दिखते हैं। लेकिन एक सच्चाई अक्सर नजरों से दूर रहती है। कई सफाईकर्मी आज भी जहरीले सीवर में उतरते हैं। यह स्थिति केवल हादसा नहीं, गंभीर प्रशासनिक लापरवाही है। यह जानकारी अनु. जाति-जनजाति युवा छात्र संघ की रिसर्च में सामने आई। रिपोर्ट व्यवस्था की कई कमजोरियां उजागर करती है।

जमीनी हकीकत से कोसों दूर सरकारी दावे-आंकड़े

रिपोर्ट के मुताबिक सरकार ने लोकसभा में कई आंकड़े पेश किए। ये आंकड़े सामाजिक न्याय मंत्रालय ने दिए। मौतों का सालवार डेटा इस प्रकार है :

  • 2018 : 67 मौतें
  • 2019: 117 मौते
  • 2020: 22 मौतें
  • 2021: 58 मौतें
  • 2022: 66 मौतें
  • 2023: 9 मौतें

डेटा में 100 मौतों का रहस्यमय अंतर

सरकारी डेटा में बड़ा विरोधाभास दिखता है। एक रिपोर्ट कुल 339 मौतें बताती है। दूसरी अद्यतन रिपोर्ट 443 मौतें बताती है। दोनों रिपोर्ट एक ही अवधि की हैं। यह अंतर डेटा अद्यतन और रिपोर्टिंग पद्धति पर सवाल उठाता है। विशेषज्ञ इसे प्रशासनिक पारदर्शिता की कमी मानते हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार यह समस्या मुख्यतः तीन कारणों से होती है:

  • कई घटनाओं की सही रिपोर्टिंग नहीं होती
  • स्थानीय प्रशासन कई मामलों को छिपा देता है
  • ठेकेदारी प्रणाली में जिम्मेदारी तय नहीं हो पाती

30 लाख का मुआवजा, लेकिन सुरक्षा पर खर्च नहीं

मौजूदा व्यवस्था में सरकार मौत के बाद मुआवजा देती है। एक सफाईकर्मी की मौत पर 30 लाख रु. तक दिए जाते हैं। लेकिन रिपोर्ट बड़ा सवाल उठाती है। क्या यह पैसा पहले सुरक्षा पर खर्च हो सकता था? रिसर्च के अनुसार इसी बजट में कई उपाय संभव हैं, जैसे-

  • 2–3 आधुनिक सीवर जेटिंग मशीनें (Sewer Jetting Machines)
  • 20–25 गैस डिटेक्टर (Gas Detectors)
  • 50 पीपीई किट (PPE Kits)
  • एससीबीए सेट (Self Contained Breathing Apparatus)
  • रेस्क्यू टीम का सालभर का प्रशिक्षण
रिपोर्ट का निष्कर्ष बेहद स्पष्ट है: एक मौत का मुआवजा, कई मौतों को रोकने में सक्षम हो सकता है।

    कानून क्या कहता है?

    भारत में मैनुअल स्कैवेंजर्स एक्ट 2013 (Manual Scavengers Act 2013) लागू है। यह असुरक्षित मानव प्रवेश को अपराध मानता है। ऐसे ही एक केस में 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला दिया था। मामला था सफाई कर्मचारी आंदोलन बनाम भारत सरकार। अपने फैसले में कोर्ट ने कहा- हर मौत पर कम से कम 10 लाख मुआवजा देना होगा। इसे दंडात्मक क्षतिपूर्ति कहा गया। भारत का संविधान अनुच्छेद 21 (Article 21) जीवन का अधिकार देता है। इसमें सम्मान के साथ जीने का अधिकार शामिल है। बिना सुरक्षा सीवर में उतारना इस अधिकार का उल्लंघन है।

    मुआवजा संवेदनशीलता नहीं, विफलता है

    सफाईकर्मियों की मौत के बाद मुआवजा दिया जाता है, लेकिन इससे मूल समस्या खत्म नहीं होती। जब तक मशीनों की जगह इंसान उतरेंगे, खतरा रहेगा। इन मौतों को दुर्घटना नहीं कहा जा सकता। ये स्पष्ट रूप से निवारण योग्य मृत्यु हैं। विशेषज्ञ जवाबदेही तय करने की मांग कर रहे हैं।

    कुछ अहम तथ्य ये भी

    • 2018 से 2023 के बीच 339 से 443 मौतों का दावा।
    • सरकारी डेटा में 100 से अधिक मौतों का अंतर।
    • एक मौत पर 30 लाख मुआवजा दिया जाता है।
    • यही पैसा सुरक्षा उपकरणों पर खर्च किया जा सकता है।
    • मध्य प्रदेश में 2021 से 2026 तक कई बड़े हादसे हुए।

    मध्य प्रदेश में लगातार सामने आ रहे हादसे

    • मार्च 2026: इंदौर में बड़ा सीवर हादसाहुआ। सीवर चेंबर में जहरीली गैस भर गई थी। इस हादसे में करण और अजय की मौत हो गई। दो अन्य नगर निगमकर्मचारी बेहोश मिले। उन्हें सुरक्षित बाहर निकाला गया। रिपोर्ट के अनुसार वहां पर्याप्त सुरक्षा उपकरण नहीं थे।
    • सितंबर 2021: सिंगरौली के कचनी गांव में हादसा हुआ। तीन सफाईकर्मियों की जान गई। बाद में पुलिस ने ठेकेदार पर केस दर्ज किया।
    • जून 2023: ग्वालियर में दो सफाईकर्मी मरे। दोनों कर्मचारी अनुबंध पर काम करते थे। मामले में हाई कोर्ट ने कड़ा संज्ञान लिया।
    • जून 2024: रीवा में दो लोगों की मौत हुई। वे सेप्टिक टैंक साफ करने उतरे थे।
    • सितंबर 2025: सतना में बड़ा हादसा हुआ। एक व्यक्ति की मौत हुई। दो लोग गंभीर रूप से घायल हुए। रिपोर्ट में सुरक्षा उपकरणों की कमी बताई गई।
    • अक्टूबर 2025: जबलपुर में दो नाबालिग भाई क्रिकेट खेल रहे थे। वे खुले सेप्टिक टैंक में गिर गए। दोनों बच्चों की मौत हो गई।
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