इंदौर में Ubud फ्लाय डाइनिंग रेस्टोरेंट की फाइल निगम से कलेक्टोरेट तक ऐसे उड़ी

इंदौर और मध्य प्रदेश के पहले फ्लाय डाइनिंग रेस्टोरेंट को लेकर मामला हाईकोर्ट में चला गया है। इसकी मंजूरी की फाइल भी नगर निगम से कलेक्टोरेट तक अजीब तरह से 'उड़ी' है। यह है इनसाइड स्टोरी।

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Sanjay Gupta
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INDORE. इंदौर में 150 फीट की ऊंचाई पर खुले फ्लाय डाइनिंग रेस्टोरेंट उबुद को मंजूरी कैसे मिली, इसे लेकर मामला हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ में पहुंच गया है। अब केस लगने के बाद निगम ने यह कहकर हाथ खड़े कर दिए हैं कि उनके जरिए इसे मंजूरी नहीं दी गई है।

हाईकोर्ट में निगम के अधिवक्ता ने कहा कि हमने तो संचालकों को नवंबर में ही नोटिस दे दिया था। फिर सवाल यह है कि यह रेस्टोरेंट चल कैसे रहा है और इसके पास कोई वैध मंजूरी है या नहीं?

इसकी फाइल नवंबर में ऐसे चली

इसकी कहानी नवंबर 2025 के पहले सप्ताह से शुरू होती है। इसे शुरू करने के लिए नगर निगम में फाइल लगाई जाती है। इसके लिए कंपनी एक्सपेरियम एडवेंचर्स एलएलपी द्वारा मंजूरी मांगी जाती है।

  • नगर निगम के अधिकारी पहली बार सामने आई ऐसी फाइल को देखकर चौंक जाते हैं। तय किया जाता है कि पहले इसमें जिला प्रशासन से पत्र लिया जाए। इसके लिए कंपनी को कलेक्टोरेट जाकर अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) लाने के लिए कहा जाता है।

  • जबकि, इस मामले में कलेक्टोरेट से एनओसी का कोई मामला ही नहीं बनता है। इसके चलते कलेक्टोरेट से मना कर दिया जाता है।

  • फिर संबंधित कंपनी के कर्ताधर्ता प्रशासन और निगम के अधिकारियों के पास रसूखदारों से फोन करवाते हैं। इसके बाद निगम और प्रशासनिक अधिकारियों के बीच चर्चा होती है और बीच का रास्ता निकाला जाता है।

  • इसके बाद कलेक्टोरेट से 11 नवंबर 2025 को 17 बिंदुओं वाली एक अनापत्ति जारी की जाती है।

  • इसी अनापत्ति के आधार पर कंपनी पुनः निगम के पास जाती है और वहां से ट्रेड लाइसेंस जारी कर दिया जाता है। इसी आधार पर रेस्टोरेंट शुरू हो जाता है।

अनापत्ति में सभी से मंजूरी की बात थी, जो हुई नहीं

कलेक्टोरेट की अनापत्ति केवल खानापूर्ति थी। इसमें कंपनी को अपने स्तर पर कोई विशेष मंजूरी नहीं दी गई थी, क्योंकि वह उनके अधिकार क्षेत्र में था ही नहीं। इसके बिंदु क्रमांक एक में ही साफ लिखा था कि इस गतिविधि के लिए जो भी मंजूरी/अनापत्ति प्राप्त करना अनिवार्य हो, उसे प्राप्त करने की पूरी जिम्मेदारी आयोजक की होगी। इसके बाद ही वे गतिविधि शुरू कर सकेंगे।

साथ ही बिंदु क्रमांक सात में पुनः लिखा गया कि इस एक्टिविटी के लिए फायर, पुलिस, नगर निगम, एसडीएम, आबकारी, वाणिज्यिक कर आदि विभागों से आवेदक द्वारा मंजूरी/अनापत्ति ली जाएगी। साथ ही उनकी शर्तों और निर्देशों का पालन करना अनिवार्य होगा।

नवंबर में निगम ने नोटिस दिया, तो फिर कार्रवाई क्यों नहीं?

इस मामले में चौंकाने वाली बात निगम का रवैया है। निगम ने हाईकोर्ट में पहली सुनवाई के दौरान खुद स्वीकार किया कि हमने रेस्टोरेंट संचालक को नवंबर में ही नोटिस दे दिया था। इस पर हाईकोर्ट बेंच ने नाराजगी जताते हुए कहा कि फिर इसके बाद कार्रवाई क्या की? क्या आप जनहित याचिका (PIL) लगने का इंतजार कर रहे थे?

इसका जवाब निगम के पास नहीं था। उधर, निगम ने ट्रेड लाइसेंस जारी किया है, तो फिर नोटिस किस बात का दिया? और यदि नोटिस दिया, तो फिर उस पर आगे चुप्पी क्यों साधी? ऐसे में नगर निगम की कार्यशैली इस पूरे मसले पर विवादित नजर आ रही है।

क्या बोल रहे हैं रेस्टोरेंट संचालक?

रेस्टोरेंट संचालक पार्टनर और अनापत्ति लेने वाले राहुल शर्मा से द सूत्र ने सीधी बात की। इस पर उन्होंने कहा कि हम पूरे सुरक्षा मानकों के साथ इसे संचालित कर रहे हैं। निगम से ट्रेड लाइसेंस लिया है और अनापत्ति भी कलेक्टोरेट से प्राप्त है।

यदि कोई और कमी थी तो हमें कोई विभाग बताता, लेकिन हमें कभी भी किसी विभाग ने कुछ नहीं कहा। अन्य विभागों से मंजूरी के सवाल पर शर्मा ने कहा कि अनापत्ति की कॉपी ही सभी विभागों को दी गई थी। वहीं, किसी ने भी हमसे न कुछ मांगा और न ही कोई पत्र दिया।

क्या याचिका लगी है?

हाईकोर्ट में अधिवक्ता चर्चिल शास्त्री ने इस मामले में जनहित याचिका (PIL) लगाई है। इसमें उनकी ओर से अधिवक्ता मनीष यादव ने तर्क रखे। याचिका में कहा गया है कि यह रेस्टोरेंट 150 फीट की ऊंचाई पर संचालित हो रहा है और इसकी कोई विधिक मंजूरी नहीं है। इस पर सभी पक्षकारों को नोटिस जारी किए गए हैं। साथ ही, मामले में अगली सुनवाई 10 मार्च को संभावित है।

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