इंदौर में शराब ठेकेदारों की लड़ाई में सरकार की कमाई, रजक ने जिद में लगाई सबसे महंगी बोली

इंदौर में आबकारी के ठेके के लिए इस बार शराब ठेकेदारों के बीच जोरदार मुकाबला देखने को मिल रहा है। हालत ये हो गई है कि महंगे ग्रुप्स को उनकी तय कीमत से भी ज्यादा कीमत पर खरीदा गया है।

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Sanjay Gupta
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Indore. इंदौर में आबकारी के लिए 56 ग्रुप में 173 दुकानों को रखा गया है, जिनकी बोली तीन चरणों में हुई। इनमें से 34 ग्रुप बिक गए हैं और ये काफी महंगे ग्रुप थे। इन ग्रुप की कीमत पहले ही 20 प्रतिशत ज्यादा तय की गई थी, लेकिन शराब ठेकेदारों ने इन्हें इससे भी 11 प्रतिशत ज्यादा कीमत पर खरीदा।

इसका कारण ये था कि ठेकेदार महंगे ग्रुप पर अपनी मोनोपॉली बनाए रखना चाहते थे। इन 23 महंगे ग्रुप्स के लिए कुल राजस्व लक्ष्य 1451 करोड़ रुपए था, लेकिन ठेकेदारों ने इन्हें 1612 करोड़ रुपए में खरीदा।

महंगे ग्रुप से पिटे तो रजक ने इतनी लगा दी बोली

इंदौर का ग्रुप वन स्कीम 54 सबसे महंगा था, जिसकी कीमत 134 करोड़ 95 लाख थी। इसे कैटालिस्ट बेंगलुरु ने 153 करोड़ में खरीदा। ये पहले शराब ठेकेदार सूरज रजक  के पास था। इसके बाद रजक ने दूसरे सबसे महंगे ग्रुप इंदौर टू (एमआर 9) की बोली लगाई, जिसकी कीमत 130 करोड़ थी, और इसे 150 करोड़ में खरीदा। 

इसके अलावा, रजक की फर्म ने पांचवे महंगे ग्रुप आनंद बाजार को भी 78 करोड़ की जगह 91 करोड़ 70 लाख में खरीदा।

इसी तरह देवगुराडिया के ग्रुप 26 को भी 32 करोड़ की जगह 42 करोड़ 81 लाख में उठाया। कुल मिलाकर, रजक की फर्म ने करीब 340 करोड़ के चार ठेके खरीदे।

तीसरा महंगा ग्रुप इन्होंने लिया

वहीं इंदौर का तीसरा महंगा ग्रुप चंद्रगुप्त मोर्य चौराहा जिसकी कीमत 99 करोड़ थी, उसे आनंदीलाल मालवीय ने 113 करोड़ में उठाया। चौथा महंगा ग्रुप (इंदौर न्यूज) एमआईजी जिसकी कीमत 98 करोड़ थी, उसे कैटालिस्ट बेंगलुरु ने पहले ही 111 करोड़ रुपए में उठा लिया था।

बेंगलुरु के पास सबसे महंगा ग्रुप इंदौर वन (स्कीम 54) भी 153 करोड़ में है। वहीं महंगा ग्रुप 6 द्वारिकापुरी का 72 करोड़ 55 लाख में लालू लिक्वर ने और ग्रुप 7 राऊ को 67 करोड़ में संतोष रघुवंशी ने उठाया।

बाकी बचे हुए ग्रुप की अब फिर से बोली लगेगी और एक-एक ग्रुप (शराब के ठेके) को बेचा जाएगा। इन बचे हुए ग्रुप की बेस प्राइज 651 करोड़ रुपए है।

क्या इतनी बिक्री कर पाएंगे या होंगे डिफॉल्टर

वहीं इस अधिक कीमत पर दुकान बिक्री होने से यह भी सवाल उठ गया है कि क्या यह इतनी बिक्री कर आबकारी राजस्व जमा कर पाएंगे। जैसे कि ग्रुप वन और टू जो 150 करोड़ में गए हैं। इन्हें हर दिन औसतन ढाई-ढाई करोड़ कीमत की शराब बेचनी होगी, तब जाकर वह नो प्रॉफिट नो लॉस में हो सकेंगे। ऐसा नहीं कर पाने पर इन्हें जेब से आबकारी राजस्व भरना होगा, नहीं तो डिफॉल्टर होंगे।

गुजरात लाइन बंद होने से पहले ही मुश्किलों में

उधर गुजरात लाइन ठेकेदारों की आपसी लड़ाई और एक-दूसरे को निपटाने में बंद हो चुकी है। जो भेजने की कोशिश में लगे हैं, उनमें ठेकेदार एक-दूसरे की शिकायत कर रहे हैं और गाड़ियां पकड़वा रहे हैं।

इसके चलते जो ठेकेदार ऊंचे ठेके लेकर इसकी भरपाई गुजरात (इंदौर में शराब की बिक्री) की ब्लैक लाइन से कर रहे थे, वह इस बार पहले ही तगड़े घाटे में हैं।

अभी भी करोड़ों का माल दुकानों में पड़ा हुआ है। वहीं इसके साथ आशंका यह भी है कि यह महंगे ठेके लेने के बाद फिर गुजरात लाइन की कोशिश करेंगे या फिर शराब बोतल तय कीमत से अधिक पर बेचेंगे, जिससे नए विवाद खड़े होंगे।

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