nepotism से कंप्रोमाइज क्यों,BJP की पहली लिस्ट में दिखा 3 बातों का डर?

बात करें सिर्फ मध्यप्रदेश की तो यहां से 29 की 29 सीटें जीतने का लक्ष्य है। जिसमें से 28 पहले ही बीजेपी के पास है। एक सीट छिंदवाड़ा की है जो बीजेपी की मुट्ठी में नहीं है। शायद इतनी मेहनत के बाद भी उसके लिए दूर की कौड़ी है।

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Jitendra Shrivastava
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न्यूज स्ट्राइक।

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BHOPAL. लोकसभा चुनाव में अपनी जीत को लेकर क्या BJP किसी संशय में है। फिलहाल जो माहौल है, वो राम मंदिर की बदौलत हो या मोदी की गारंटी का असर हो या फिर सोशल मीडिया का रचा हुआ संसार हो, हर जगह से बस एक आवाज आती सुनाई देती है कि आएगा तो मोदी ही। उसके बावजूद बीजेपी में ये इत्मीनान नजर क्यों नहीं आता। तारीखों के ऐलान से पहले बीजेपी ने 195 प्रत्याशियों की लिस्ट जारी कर दी है। इस लिस्ट में खासतौर से मध्यप्रदेश के प्रत्याशी घोषित करने में भी जीत के लिए बीजेपी की बेचैनी साफ नजर आती है।

BJP की लिस्ट में छिपा है मोहन यादव के लिए बड़ा संदेश

वैसे तो अब तक आप अलग-अलग न्यूज चैनल और सोशल मीडिया हैंडल के जरिए BJP की इस लिस्ट से जुड़ चुका हर पहलू समझ ही चुके होंगे, लेकिन मैं जो बताने जा रहा हूं वो पहलू अब तक अनछुआ है। ये पहलू है BJP का डर और बहुत सोच समझ कर पेश की गई लिस्ट के बावजूद बीजेपी को होने वाला नुकसान। इन सबसे अहम फैक्ट ये कि किस तरह ज्योतिरादित्य सिंधिया समेत सीएम मोहन यादव को भी सीमित कर दिया गया है। डॉ. मोहन यादव के लिए एक बहुत बड़ा संदेश है जो इस लिस्ट में छिपा है। 

BJP के पास नाथ के नेटवर्क की काट नहीं

चलिए एक-एक कर आपको हर उस फेक्ट से वाकिफ करवाता हूं जो अब तक अनछुए ही रह गए। सबसे पहले बात करते हैं बीजेपी के डर की। बीजेपी ने इस बार प्रण लिया है कि देशभर से सिर्फ अपने दम पर 370 सीटें जीतनी हैं। बात करें सिर्फ मध्यप्रदेश की तो यहां से 29 की 29 सीटें जीतने का लक्ष्य है। जिसमें से 28 पहले ही बीजेपी के पास है। एक सीट छिंदवाड़ा की है जो बीजेपी की मुट्ठी में नहीं है। शायद इतनी मेहनत के बाद भी उसके लिए दूर की कौड़ी है। नहीं तो फिर क्यों बीजेपी ने छिंदवाड़ा सीट पर किसी प्रत्याशी को नहीं उतारा। क्या अब भी ये भरोसा है कि छिंदवाड़ा सीट पर जीत की गारंटी में से एक नाथ परिवार का कोई सदस्य गाहे बगाहे बीजेपी में शामिल हो सकता है। या ये कि बीजेपी इतनी सशक्त होते हुए भी क्या नाथ के कसे हुए सियासी नेटवर्क की कोई काट नहीं ढूंढ पाई है। 

BJP का हारे और बागी चेहरों पर भरोसा

टिकट सिर्फ छिंदवाड़ा का ही नहीं रुका है। इंदौर में भी कोई चेहरा नहीं उतारा गया है। जाहिर सी बात है इंदौर कई मायने में असीम संभावनाओं का शहर है यहां सोच समझ कर फैसला लिया जाएगा कि किसी युवा, उद्योगपति या महिला चेहरे को यहां से टिकट दें। सीएम डॉ. मोहन यादव के गृह जिले वाली उज्जैन लोकसभा सीट पर भी फिलहाल चेहरा नहीं उतारा गया है। डर की वजह इतनी ही नहीं है। इसके अलावा भी बहुत से कारण हैं जो बीजेपी का डर जाहिर करते हैं। बीजेपी के पास चेहरों की कोई कमी नहीं है। हर सीट पर हाल ये है कि एक ढूंढों दस चेहरे टिकट की कतार में लगे मिलेंगे और वो भी दमदार। इसके बावजूद बीजेपी ने हारे हुए चेहरों और बागी चेहरों पर भरोसा किया है। बागियों के आगे बीजेपी घुटने टेक दे ये समझ से बिलकुल परे है। इसका उदाहरण हैं सीधी से डा. राजेश मिश्रा। ये वही नेता हैं जो सीधी से रीति पाठक को टिकट मिलने पर विधानसभा चुनाव के दौरान नाराज भी हो गई थे और अपने पद से इस्तीफा भी दे दिया था। अब उन्हें सांसद का टिकट दे दिया गया है। इसी तरह जबलपुर से आशीष दुबे को टिकट दिया है। जिसके लिए पार्टी के वरिष्ठ विधायक अजय विश्नोई ये ट्वीट कर चुके हैं कि उन्होंने पार्टी विरोधी काम किया था। ऐसे चेहरे को टिकट देने के पीछे बीजेपी का क्या मकसद हो सकता है। जरा सोचिए। 

मंडला से भी आदिवासी चेहरा नहीं मिल सका!

हारे हुए चेहरे भी बीजेपी की मजबूरी नजर आ रहे हैं। जिसमें पहला नाम तो फग्गन सिंह कुलस्ते का ही है। कुलस्ते को भी दूसरे सांसदों की तरह विधानसभा चुनाव में उतारा गया था, लेकिन लोकसभा चुनाव के मैदान का ये आला खिलाड़ी विधानसभा के चुनावी मैदान में नहीं टिक सका। हार के बावजूद भी बीजेपी ने फग्गन सिंह कुलस्ते को उन्हीं की सीट मंडला से टिकट दिया है। क्या बीजेपी इस क्षेत्र के लिए कोई और बड़ा आदिवासी चेहरा नहीं ढूंढ सकी। इसी तरह राहुल लोधी पर भी दांव खेला गया है। जो कांग्रेस से बीजेपी में शामिल हुए हैं। राहुल लोधी हाल ही में खरगापुर से विधानसभा चुनाव हार गए थे। उन्हें दमोह से टिकट मिला है। ज्योतिरादित्य सिंधिया के अलावा एक वही दलबदलु हैं जिन्हें पहली सूची में टिकट से नवाजा गया है। इनके अलावा आलोक शर्मा, गणेश सिंह और भारत सिंह कुशवाह का नाम भी लिस्ट में शामिल है। 

यहां से कांग्रेस ने यादव को टिकट दिया तो मुकाबला कड़ा होगा 

जिक्र ज्योतिरादित्य सिंधिया का हो ही गया है तो उन्हीं पर आगे बात भी कर लेते हैं। ज्योतिरादित्य सिंधिया को उन्हीं की पुरानी पारंपरिक सीट गुना शिवपुरी से टिकट दे दिया गया है। हालांकि, सिंधिया खुद ग्वालियर सीट से चुनाव लड़ने के ख्वाहिशमंद थे। वैसे तो सिंधिया के इस बार चुनाव हारने पर संदेह है, लेकिन जीत बहुत आसान भी नहीं है। उसकी पहली वजह है केपी यादव जिनका टिकट काट दिया गया है। इसका असर यादव मतदाताओं पर पड़ सकता है। अगर कांग्रेस ने कुछ ठीकठाक से यादव चेहरे को यहां से टिकट दे दिया तो सिंधिया को जीत के लिए ज्यादा मेहनत करनी होगी क्योंकि मुकाबला कड़ा होगा। इस टिकट के साथ सिंधिया को उनकी सीट तक सीमित कर दिया गया है। पहली सूची में तो कम से कम यही नजर आता है। ग्वालियर चंबल की मुरैना, भिंड और ग्वालियर सीट से जिन्हें टिकट मिला है वो नरेंद्र सिंह तोमर के करीबी हैं। इससे ये तो साफ है नरेंद्र सिंह तोमर भले ही विधानसभा में अध्यक्ष पद पर हों, लेकिन उनका दबदबा केंद्र में कायम है।

24 में से दस ऐसे नाम हैं जो शिवराज सिंह के करीबी हैं

दबदबे के मामले में शिवराज सिंह चौहान भी पीछे नहीं है। जिनके सियासी भविष्य पर अब तक प्रश्न चिन्ह लगा हुआ था। ये मान लिया गया था कि अब शिवराज की टीम के सफाए की तैयारी है। उनकी प्रशासनिक जमावट और सियासी कसावट को बदले का काम जारी है। वही शिवराज मध्यप्रदेश की लोकसभा सीट के नामों में छाए हुए हैं। 29 में से जो 24 नाम घोषित हुए हैं उनमें से करीब दस प्रत्याशी ऐसे हैं जो शिवराज सिंह चौहान के करीबी हैं। 

रतलाम में ऐसा नाम जो परिवारवाद का प्रतीक है

एक के बाद एक नाम आप भी मेरे साथ गिनते चलिए। सागर से लता वानखड़े, रीवा से जनार्दन मिश्रा, शहडोल से हिमाद्री सिंह, होशंगाबाद से दर्शन सिंह चौधरी, भोपाल से आलोक शर्मा, राजगढ़ से रोडमल नागर, खरगोन से गजेंद्र पटेल, खंडवा से ज्ञानेश्वर पाटिल और खुद शिवराज सिंह चौहान विदिशा से चुनाव लड़ने वाले हैं। इस सीट से वो पहले भी सांसद रह चुके हैं। इस लिस्ट में एक नाम और भी है वो नाम है रतलाम से अनीता नागर सिंह चौहान का। इस नाम का जिक्र अलग से इसलिए क्योंकि ये नाम परिवारवाद का भी प्रतीक है जिसके बीजेपी सख्त खिलाफ है। खासतौर से तब जब देशभर में परिवारवाद का मुद्दा हावी है। पहले बीजेपी ने लालू परिवार पर निशाना साधा तो लालू प्रसाद यादव भी उसी तर्ज पर परिवारवाद पर बयान दे बैठे। जिसके बाद अब बीजेपी के अधिकांश नेताओं के ट्विटर बायो में जुड़ गया है मोदी का परिवार। मोदी की सरपरस्ती में जो पार्ट परिवारवाद के इस कदर खिलाफ है उसी पार्टी ने रतलाम सीट से वन मंत्री नागर सिंह चौहान की पत्नी को टिकट दिया है। क्या जीत की खातिर बीजेपी सीट के हिसाब से अपने उसूलों से समझौता कर रही है। सवाल भी गौर करने लायक है।

इधर... मोहन यादव, शिवराज युग के यादें मिटाने में लगे हैं

अब बताता हूं कि डॉ. मोहन यादव को इस लिस्ट से क्या संदेश मिल रहा है। या, वो कौन सा इशारा है जो उन्हें समझ लेना चाहिए। मुखिया की कुर्सी संभालने के बाद से मोहन यादव, शिवराज सिंह चौहान के फैसले और जमावट बदलने में लगे हुए हों। वो मंत्री और विभाग के अधिकारियों का मसला हो, निगम मंडल में नियुक्तियों का मामला हो या राज्यगान पर खड़े न होना हो। उनके हर फैसले से यही मैसेज मिलता रहा कि शिवराज सिंह चौहान के युग की यादें मिटाने की पूरी कोशिश जारी है, लेकिन इस लिस्ट से मैसेज क्लियर है कि इतनी जल्दी शिवराज सिंह चौहान को दरकिनार करना आसान नहीं है। फिलहाल तो नहीं। हां इस बात से इंकार नहीं है कि समय बीतने के साथ साथ मोहन यादव भी अपना दबदबा इसी तरह कायम कर सकेंगे। अभी तो उनकी पारी की शुरुआत भर है। पांच साल का लंबा कार्यकाल उनके सामने है।

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